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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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अ या आ अर्थात् अनुत्तरशक्ति या आनंदशक्ति के समक्ष उ या ऊ अर्थात् उन्मेष या ऊनता के आ जाने पर उनके संयोग से उत्पन्न होने वाली अवस्था को द्योतित करने वाला वर्ण। (तं.आ.वि.2, पृ. 106)। परमेश्वर अपनी उन्मेषशक्ति और ऊनता को अपने अनुत्तर या आनंदमय स्वरूप के अभिमुख लाकर जब अपना विमर्शन करता है तो उसकी परमेश्वरता के एक अतिविशेष चमत्कार की अभिव्यक्ति उसी के भीतर हो जाती है। उसी को ‘ओ’ यह वर्ण अभिव्यक्त करता है। मातृका की उपासना करने वाले साधक को भी ओकार की उपासना से परमेश्वरता के उसी चमत्कार की साक्षात् अनुभूति हो जाती है और उससे उसे शिवभाव का शाम्भव समावेश सद्यः हो जाता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

ओंकार

ईश्‍वर का नामांतर।

साधक दुःखान्त प्राप्‍ति के लिए परम-सत्‍ता का ध्यान करता है। ध्यान नामरुपात्मक होता है, उसका नाम ओंकार माना गया है। परमशिव एकमात्र स्वतंत्र तत्व है और ऊँकार के जप के साथ भगवान शिव की स्मृति का अभ्यास किया जाता है। (पा. सू. कौ. भा. पृ. 125, ज.का.टी.पृ. 11)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

ओघ

तन्त्रशास्त्र में ज्ञान की परम्परा को ओघ (प्रवाह) के नाम से जाना जाता है। दिव्यौघ, सिद्धौघ और मानवौघ के भेद से यह तीन तरह की होती है . देवताओं की परम्परा दिव्यौघ, सिद्धों की परम्परा सिद्धौघ और मानव गुरुओं की परम्परा मानवौघ के नाम से प्रसिद्ध है। तन्त्र की प्रत्येक शाखा का ज्ञान पहले देवताओं को प्राप्त हुआ। देवताओं से सिद्धों को और सिद्धों से वह मानवों को प्राप्त हुआ। यह गुरु-परम्परा शास्त्रों में क्रमोदय, गुरुमण्डल या गुरुपंक्ति के नाम से भी अभिहित हुई है। हादिविद्या के दिव्यौघ, सिद्धौघ और मानवौघ गुरुओं की नामावली ऋजुविमर्शिनी, अर्थरत्नावली, ज्ञानदीप विमर्शिनी, सौभाग्य सुधोदय प्रभृति ग्रन्थों में मिलती है। प्रत्येक सम्प्रदाय की गुरुपंक्ति का परिचय दीक्षित शिष्य को अपने गुरु से प्राप्त होता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

ओवल्लि

कौल संप्रदाय की साधना में उपास्य गुरुओं और उनकी शक्तियों तथा अन्य सभी प्रकार की उपास्य देवियों के रहस्यात्मक नामों को ओवल्लि कहते हैं। इनका विस्तारपूर्वक निरूपण कुलक्रीड़ा-अवतार आदि कौलिक आगमों में मिल सकता है। तंत्रालोक के उनत्तीसवें आह्मिक में तथा जयरथ कृत टीका में भी इनका थोड़ा सा उल्लेख आया है। तद्नुसार इल्लाई, कुल्लाई, सिल्लाई, विज्जा, एरूणा, बोधई, मेखला इत्यादि रहस्यात्मक नाम ओवल्लि शब्द से अभिप्रेत है। चक्रात्मक मंडलपूजा में इनके स्थान नियत होते हैं। (तन्त्रालोक आ. 29-29 से 39)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

ओवल्ली

तन्त्रशास्त्र में ज्ञान की परम्परा (प्रवाह) को औवल्ली के नाम से भी जाना जाता है। तन्त्रालोक (29/36) में बताया गया है कि मत्स्येन्द्रनाथ ने अपना ज्ञान छः राजपुत्रों को दिया और उनका नाम आनन्द, आवलि, बोधि, प्रभु, पाद और योगी शब्दान्त रखा, अर्थात उनको यह निर्देश दिया कि अपने शिष्यों के नामों के अन्त में इन शब्दों को जोड़ें। मत्स्येन्द्रनाथ के इन षड्विध शिष्यों की यह परपरा (प्रवाह) ही औवल्ली के नाम से अभिहित है। मत्स्येन्द्रनाथ कौल शास्त्र के आद्य प्रवर्तक माने जाते हैं। बौद्ध और जैन योग पर भी इसका प्रभाव परिलक्षित होता है। बौद्ध तन्त्रशास्त्र (वज्रयान) के अनेक प्रसिद्ध आचार्यों के नाम बोधि, प्रभु और पाद नामक ओवल्लियों से संबद्ध हैं। स्पष्ट है कि इन नामों से अंकित आचार्यगण मत्स्येन्द्रनाथ के ही ज्ञानप्रवाह से किसी न किसी प्रकार से जुड़े हुए हैं।
Darshana : शाक्त दर्शन

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