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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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अष्‍टशील

सदाचार’ के अंतर्गत देखिए।
Darshana : वीरशैव दर्शन

अष्‍टावरण

1. गुरु, 2. लिंग, 3. जंगम, 4. पादोदक, 5. प्रसाद, 6. विभूति, 7, रुद्राक्ष और 8. मंत्र – ये वीरशैव दर्शन में अष्‍टावरण कहे जाते हैं। यहाँ पर आवरण शब्द रक्षा के कवच के अर्थ में प्रयुक्‍त हुआ है। जैसे युद्‍ध-भूमि में योद्‍धा शत्रुओं के बाण से अपने शरीर की रक्षा के लिए कवच धारण करत हैं, अथवा जैसे फसल को जानवरों से सुरक्षित रखने के लिये चारों ओर घेरा लगाकर उसकी सुरक्षा की जाती है, वैसे ही दीक्षा प्राप्‍त भक्‍त की काम, क्रोध आदि वृत्‍तियों से रक्षा करने के कारण इन आठों को अष्‍टावरण कहा गया है।(चं. ज्ञा. आ. क्रियापाद. 2/2-3)। इनको इस दर्शन में लिंगांग-सामरस्य रूप मोक्ष के लिये सहकारी सामग्री के रूप में स्वीकार किया गया है। इनमें ‘गुरु’, ‘लिंग’, और ‘जंगम’ ये तीन पूजनीय है। ‘विभूति’, ‘रुद्राक्ष’ और ‘मंत्र’ ये तीन पूजा के साधन हैं। ‘पादोदक’ तथा ‘प्रसाद’ पूजा के फल कहे गये हैं (श.वि.द.पृ. 199)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

अष्‍टावरण

1. गुरु –
वीर शैव संप्रदाय में गुरु उसे कहते है, जिसका आचार्य पद पर पट्‍टाभिषेक किया जाता है और जिसकी ‘शिवाचार्य’ उपाधि होती है। प्राय: ‘वीरमाहेश्‍वर-वंश’ में उत्पन्‍न हुआ व्यक्‍ति ही गुरु-पद का अधिकारी होता है जिन्हें कि व्यवहार में ‘जंगम’ भी कहते हैं। इस गुरु परंपरा को ‘पुत्रवर्ग’ परंपरा कहते हैं। कदाचित् ‘वीर-माहेश्‍वर-वंश’ में योग्य व्यक्‍ति न मिलने पर ‘पंचम’ जिन्हें व्यवहार में ‘पंचमशाली’ कह जाता है, वंश में उत्पन्‍न योग्य व्यक्‍ति को भी ‘वीर-माहेश्‍वर-वंश’ (जंगमदीक्षा) देकर पट्‍टाधिकार दिया जाता है। इस गुरु परंपरा को ‘शिष्यवर्ग’ परंपरा कहते हैं (वी.स.सं. 14/1-16)। ये बाल्य से यावज्‍जीवन नैष्‍ठिक ब्रह्मचारी होते हैं। इन्हीं को दीक्षा एवं मंत्रोपदेश आदि धार्मिक क्रियाओं को करने का अधिकार प्राप्‍त रहता है। ये अपने-अपने ग्राम या नगर के मठों के अधिकारी होते हैं और इस संप्रदाय के धार्मिक कार्य इन्हीं के आदेश से चलते हैं (सि.शि.6/1-7 पृष्‍ठ 82, 83; क्रि. सा. भाग 3 पृष्‍ठ 133)।

एक ही गुरु, दीक्षा, शिक्षा आदि देने के कारण ‘दीक्षा-गुरु’ ‘शिक्षा-गुरु’ और ‘ज्ञान-गुरु’ के नाम से अभिहित होता है।

(क) दीक्षा-गुरु –
जो गुरु ऐसी दीक्षा प्रदान करता है, जिससे शिष्य को शिवज्ञान की प्राप्‍ति तथा उसके ‘आणव’ आदि मलत्रय का नाश होता है, उसे दीक्षा-गुरु कहते हैं (सि.शि. 15/7 पृ. 48)।

(ख) शिक्षा-गुरु –
जो दीक्षा के पश्‍चात् लिंगपूजा के नियम और इष्‍टलिंग को प्राण की तरह अत्यंत सावधानी से निरंतर शरीर पर धारण करने की शिक्षा देता है तथा इसके साथ ही मंत्र साधना, प्राणलिंगानु-संधान की पद्‍धति को सिखाता है और इसके नियम के अनुशासन पर जोर देता है, उसे ‘शिक्षा-गुरु’ कहते हैं। (सि.शि. 15/1-2 पृष्‍ठ 50-51)।

(ग) ज्ञान-गुरु –
जो वीरशैव-आगमों में प्रतिपादित विषयों को अपने अनुभव तथा अनेक युक्‍तियों द्‍वारा प्रतिपादन करके शिष्य के संशय को हटाकर जीवन्मुक्‍ति के हेतुभूत शिवाद्‍वैत-ज्ञान का उपदेश करता है, उसे ‘ज्ञान-गुरु’ कहा जाता है (सि.शि. 15/1-9 पृष्‍ठ 53-56)।

Darshana : वीरशैव दर्शन

अष्‍टावरण

2. लिंग –
प्रपंच की उत्पत्‍ति, स्थिति और लय के कारणीभूत परशिव को वीरशैव आचार्यो ने ‘लिंग’ कहा है (अनु.सू.3/3-4)। बृहत् अर्थात् व्यापक स्वरूप का होने के कारण इसे ब्रह्म भी कहा जाता है अर्थात् ‘लिंग’ और ‘ब्रह्म’ दोनों पर्याय हैं (सि.शि. 6/6-17 प.93)। इस परमतत्व को ‘लिंग’ इसलिये भी कहा जाता है, कि ‘शिवयोगी’ अविद्‍या आदि पंचक्लेश और ‘आणव’ आदि मलत्रयरूप पाश से निर्मुक्‍त होकर अंत में इसी परमतत्व में लीन हो जाते हैं। यह ‘लिंग’ शक्‍ति विशिष्‍ट शिव का द्‍योतक है। स्थूल रूप से इस लिंग में ‘बाण’ और ‘पीठ’ ये दो भाग होते हैं। ‘बाण’ शिव का और ‘पीठ’ शक्‍ति का चिह्न है। इन दोनों का संयुक्‍त स्वरूप ही ‘लिंग’ कहलाता है (सि.शि. 11/7,8 पृ. 202)।

लिंग उपासकों की दृष्‍टि से ‘स्थूल’, ‘सूक्ष्म’ और ‘परात्पर’ तीन प्रकार का है। इन्हीं को वीरशैव दर्शन में ‘इष्‍ट-लिंग’, ‘प्राणलिंग’ और ‘भावलिंग’ का नाम दिया गया है (वी.स.सं. 7/69-70; सि.शि. 6/28 पृष्‍ठ 96)।

(क) इष्‍टलिंग –
यह लिंग’ का स्थूल स्वरूप है। स्फटिक या सामान्य शिला से इसका निर्माण करते हैं। इसको ‘पंचसूत्र’ के परिमाण से बनाया जाता है (वी.स.सं. 10/39)। इस ‘पंचसूत्र-लिंग’ को क्रिया-दीक्षा के समय गुरु अभिषेक आदि संस्कार से शुद्‍ध करके प्राण-प्रतिष्‍ठा के द्‍वारा पंचाक्षरी मंत्रोपदेश के साथ जब शिष्य को देता है, तब वह ‘इष्‍टलिंग’ कहलाता है (अनु. सू.5/85-59; सि.शि. 6/1-4 पृष्‍ठ 88-89; वी.स.सं. 10-37)। यह ध्यान में रखना जरूरी है कि यदि कोई गुरु के बिना ही ‘पंचसूत्र-लिंग’ को खरीद कर स्वयं ही धारण कर लेता है, तो वह ‘इष्‍टलिंग’ नहीं कहलायेगा (पा.स. 1/75-77)। गुरु से प्राप्‍त इस लिंग को ‘इष्‍टलिंग’ कहने का तात्पर्य यह है कि यह इष्‍ट, अर्थात् अभीष्‍ट की, जो कि लिंगांग-सामरस्य रूप मुक्‍ति है, प्राप्‍ति में साधन है और अनेक जन्म के हेतुभूत संचित-कर्म रूप अनिष्‍ट की भी निवृत्‍ति इसी से होती हे। (सि.शि. 6/29 पृ. 98; अनु.सू. 3/9-10; वी.आ.चं. पृ. 456)।

यह अंगुष्‍ठ मात्र (परिमाण) का होता है और इसको चांदी, स्वर्ण अथवा अन्य उत्‍तम धातुओं से बनी सज्‍जिका में, जो कि आम या बिल्वफल के आकार का एक छोटा सा मंदिर होता है, रखकर उसको शिवसूत्र (यज्ञोपवीत) से संलग्‍न करके मस्तक, कंठ, वक्षस्थल या बाहु आदि में निरंतर धारण करते हैं। नाभि के नीचे इसका धारण निषिद्‍ध है (सि.श. 6/30-31 पृष्‍ट 97; वी.मा.सं. 6/44-50; पा.सं. 2/33-43)। जैसे कोई सुंदर स्‍त्री दर्पण को देखती हुयी अपने ही सुंदर स्वरूप का साक्षात्कार करती है, उसी प्रकार वीरशैवों का यह इष्‍टलिंग एक प्रतीक अथवा मूर्ति न होकर आत्मदर्शन का ही एक साधन है (शि.शि.23)।

ख. प्राणलिंग –
मूलाधार में स्थित अपान-वायु के साथ जब प्राण-वायु का संघर्ष हो जाता है, तब एक दिव्य ज्योति का उदय होता है। मूलाधार से उत्पन्‍न वह ज्योति सुषुम्‍ना के मार्ग से चलकर ‘कुंडलिनी’ को ऊर्ध्वमुख करती हुयी हृदय के ‘अनाहत-चक्र’ की, जिसे ‘द्‍वादश-दल-कमल’ कहा गया है, मध्य-स्थित कर्णिका में रुक जाती है। यह ज्योति अंगुष्‍ठ परिमाण और विद्रुमवर्ण (अरुणवर्ण) की होती है। इसी ज्योति को वीरशैव शिवयोगियों ने प्राण-लिंग कहा है। इसको ‘प्राण-लिंग’ इसलिए कहा गया है कि जैसे सूर्य के उदित होने पर तुहिन-कण उसके प्रकाश में विलीन हो जाते हैं, वैसे ही हृदय-स्थित इस दिव्य ज्योति में प्राणवायु का भी विलय हो जाता है। अतः प्राणशक्‍ति विशिष्‍ट इस ज्योति को ‘प्राण-लिंग’ कहते हैं। देशकाल के संबंध के बिना ही ‘चिदहंता’, अर्थात् स्वकीय चिद्रूप का ज्ञान ही ‘प्राण-लिंग’ है। इसी को ‘संवित् लिंग’ भी कहा गया है। वस्तुत: यह ‘प्राण-लिंग’ योगगम्य है। सूक्ष्म आंतरिक उपासना से इसकी अवगति हो सकती है। (सि.शि. 12/6-8 पृ. 2-3; वी.आ.चं. पृष्‍ठ 456)।

ग. भावलिंग –
शिवोടहं’ (मै शिवस्वरूप हूँ) इस प्रकार की भावना से, अर्थात् तैलधारावत् निरंतर उसी के चिंतन रूप निदिध्यासन के बल पर साधक को अपने मस्तिष्क स्थित सहस्रार कमल में जिस दिव्य ज्योतिस्वरूप परशिव का स्वात्म रूप से साक्षात्कार होता है, उसी को ‘भावलिंग’ कहते हैं। यह निराकार है, अर्थात् इसका त्रिकोण, षट्‍कोण आदि कोई आकार नहीं है, किंतु इसे परिपूर्ण रूप कहा जाता है। बाह्य प्रमाणों से अगोचर होने पर भी निर्मल और शांत बुद्‍धि के द्‍वारा इसका साक्षात्कार होता है।

इसे भावलिंग इसलिये कहा जाता है कि ‘शिवोടहं’ इस प्रकार की शुद्‍ध बुद्‍धि वृत्‍ति से इसका साक्षात्कार होता है और इसकी अर्चना भी इसी वृत्‍ति से होती है, अर्थात् भाव-लिंग की अर्चना के लिये ‘शिवोടहं’ भावना के व्यतिरिक्‍त किसी सामग्री की आवश्यकता नहीं होती तथा अंत में वह भावना भी उसी ज्योति में लीन हो जाती है। इस प्रकार भावनामय व्यापार का ही विषय होने से इसे ‘भावलिंग’ कहा जाता है। इसी को ‘तृप्‍तिलिंग’ भी कहते है (सि.शि. 15/1-3, पृ. 59; वी.आ.चं.पृ. 457; वी.आ.चं.पृ.457; श.वि.द.पृ. 162-163)।

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अष्‍टावरण

3. जगंम –
इस शब्द की दार्शनिक तथा सांप्रदायिक दो परिभाषायें हैं। दार्शनिक परिभाषा – जिसके प्रकाश से सूर्य, चंद्र सहित यह समस्त प्रपंच प्रकाशित हो रहा है, उस स्वयं-ज्योति-स्वरूप परशिव को जो अपने आत्मस्वरूप से जानता है, अर्थात् शिव के साथ जिसे अभेद-बोध उत्पन्‍न हुआ है, उस आत्मज्ञानी को वीरशैव दर्शन में जंगम कहा गया है (सि.शि. 11/2 पृ. 204)। ‘जंगम’ शब्द में ‘जं’ का अर्थ है जनन-रहित, ‘ग’ का अर्थ है गमन-रहित और ‘म’ का अर्थ मरण रहित है। इस प्रकार जनन-मरण-रूप गमनागमन-रहित जीवन् ‍मुक्त महापुरुष ही ‘जंगम’ है (वी.स.सं. 15/6-8; वी.चिं.पृ. 67)। यह नि:स्पृह और निरहंकार भाव से लोककल्याणार्थ अपने अवशिष्‍ट जीवन को व्यतीत करता है। इसको ‘शिवयोगी’ नाम से भी जाना जाता है (सि.शि. 9/4, पृ. 156)।

इसकी सांप्रदायिक परिभाषा यह है- जैसे ब्राह्मण शब्द ‘ब्रह्मजानातीति ब्राह्मण:’ इस व्युत्पत्‍ति के अनुसार दार्शनिक दृष्‍टि से ब्रह्मज्ञानी का प्रतिपादक होने पर भी वर्ण-व्यवहार में एक जाति का भी वाचक है, उसी प्रकार जंगम शब्द दार्शनिक दृष्‍टि से शिवज्ञान-संपन्‍न जीवन्मुक्‍त का प्रतिपादक होते हुये भी सांप्रदायिक दृष्‍टि से जाति का भी वाचक है, अर्थात् ‘वीर-माहेश्‍वर-वंश’ में, जिसे ‘लिंगी-ब्राह्मण’ कहा जाता है, उत्पन्‍न लोगों को भी जंगम कहते हैं। (वी.स.सं. 11/45)।

पूर्वोक्‍त शिवज्ञान-संपन्‍न जीवन्मुक्‍त ‘जंगम’ की स्वय, चर और पर नाम की तीन अवस्थायें हैं। उन अवस्थाओं से संपन्‍न जंगम को ‘स्वय-जंगम’ ‘चर-जंगम’ और ‘पर-जंगम’ कहते हैं।

क. स्वय-जंगम –
अहंकार – ममकार से शून्य और पंच – क्लेश -रहित जीवन्मुक्‍त महापुरुष ही ‘स्वय-जंगम’ कहलाता है। यह स्वतंत्र स्वभाव का होता है, अर्थात् यह किसी के अधीन नहीं रहता। यह इष्‍ट-लिंग की पूजा के साथ ही मूलाधार, हृदय और भूमध्य में प्रकाशमान ज्योतिर्लिंगों की उपासना करता रहता है (सि.शि. 15/2-3 पृ. 64)। यह किसी ग्राम या नगर के मठ में निवास करता हुआ वहाँ के सद्‍भक्‍तों के गृह से भिक्षा मांगकर, उसी से अतिथियों का सत्कार करके स्वयं भी भिक्षा ग्रहण करता है और उस ग्राम के भक्‍तों को संमार्ग का उपदेश करता है (वी.स.सं. 15/15-21)। इसको ‘स्वय-जंगम’ कहने का तात्पर्य यह है कि सर्वत्र स्वयं को ही देखता है, अर्थात् सभी प्राणियों में अपने ही स्वरूप का साक्षात्कार करता है। अतएव यह न किसी से घृणा करता है और न किसी से द्‍वेष ही। राजा-रंक, मूर्ख-विद्‍वान सबमें इनकी समत्व-दृष्‍टि रहती है।

‘स्वय-जंगम’ के चार प्रमुख कार्य बताये गये हैं। वे हैं – निरंतर शिव-ध्यान, शिव से संबंधित ज्ञान की चर्चा, एकांत में निवास और भिक्षा से प्राप्‍त अन्‍न से शरीर का निर्वाह। (सि.शि.15/4-6, पृ. 65; वे.वी.चिं, उत्‍तरखंड, 12/201-205)।

ख. चर-जंगम –
स्वस्वरूप के ज्ञान और आनंद के उन्माद में ही संचरण करने वाले जीवन्मुक्‍त जंगम को ‘चर-जंगम’ कहते हैं। यह किसी एक निश्‍चित स्थान पर निवास नहीं करता है, किंतु बड़े नगर में पाँच दिन, और छोटे ग्राम में एक दिन, निवास करता हुआ, मान और अपमान में समता-भाव से युक्‍त होकर, प्राकृतिक संपत्‍ति में निःस्पृही, शम, दम आदि सद्‍गुणों से समन्वित होकर, सदा संतुष्‍ट हृदय से संचरणशील रहता है। यह अपने संचार में दर्शन, स्पर्शन तथा शिवज्ञान के उपदेश से शिवभक्‍तों का उद्‍धार करता रहता है। इस चर-जंगम में लोक-संग्रह की वासनायें अभी रहती हैं। लोकोद्‍धार करना ही इसके संचार का प्रयोजन है। इस तरह संचरणशील इस जंगम को ‘चर-पट्‍टाधिकारी’ भी कहते हैं। यही ‘चर-स्थल’ नाम से भी जाना जाता है (सि.शि. 15/1-7, पृ. 66-68; वी.स.सं. 15/22-31; वे.वी.चिं., उत्‍तरखंड, 12/206-211)।

ग. पर-जंगम –
‘पर’ का अर्थ है श्रेष्‍ठ और ‘जंगम’ का अर्थ जीवन्मुक्‍त है। अर्थात् जीवन्मुक्‍तों में ही जो अत्यंत श्रेष्‍ठ माना जाता है उसे ‘पर-जंगम’ कहते हैं। जीवन्मुक्‍ति की यही पराकाष्‍ठा है। इसे ‘तुर्य’ या ‘परमहंस’ अवस्था भी कह सकते हैं। इस जीवन्मुक्‍त के लिये वर्णाश्रम की कोई विधि-निषेध नहीं है। यह किसी एक स्थान पर निवास कर सकता है, नहीं तो संचार ही करता रह सकता है। इसको ‘पर-जंगम’ इसलिये भी कहा जाता है कि ‘पर’ यानी ‘विश्‍वोत्‍तीर्ण परशिव’ को स्वात्मरूप से जानने वाले इस जीवन्मुक्‍त की मनोवृत्‍ति भी ‘तैलधारावत्’ निरंतर उसी शिव-स्वरूप में लीन रहती है। इसलिये ‘पर-जंगम’ को ‘पर’ अर्थात् अपने से भिन्‍न दूसरे व्यक्‍ति या पदार्थ का बोध नहीं होता, किंतु सर्वत्र अपने स्वरूप का ही बोध रहता है। व्यावहारिक भेद का भी बोध न रहने के कारण इससे लोगों को तत्वोपदेश होना असंभव है, किंतु इस महापुरुष के दर्शन तथा स्पर्शन मात्र से ही प्राणियों का उद्‍धार होता है। यह देहधारी होते हुये भी निर्देही कहलाता है। इसका तात्पर्य यह है कि इसके शारीरिक भोजन आदि व्यवहार अपने से न होकर दूसरे से कराये जाते हैं। इसके पादस्पर्श से सामान्य नदियाँ भी ‘तीर्थ’ बन जाती हैं और इसके निवास का स्थान दिव्य-क्षेत्र बन जाता है (सि.शि.15/1-8 पृ. 68-71; वी.स.सं. 15/55-69; वे.वी.चिं. उत्‍तरखंड 12/212-220)।

Darshana : वीरशैव दर्शन

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4. पादोदक –
‘परमानंदस्वरूप को ‘पाद’ कहते हैं और उस आनंद के ज्ञान को ‘उदक’ कहते हैं। अतः स्वस्वरूप के आनंद का ज्ञान ही ‘पादोदक’ कहलाता है – (सि.शि.19/8 पृ. 157)। यही इसका तात्विक अर्थ है।

वीरशैवों की पूजा-पद्‍धति के अनुसार पाद की पूजा से प्राप्‍त पवित्र चरणामृत को भी ‘पादोदक’ कहते हैं। चरणामृत को पादोदक इसलिये कहते हैं कि भक्‍ति से इसका सेवन करने से मन की मलिनता दूर हो जाती है और स्वस्वरूप के ज्ञान के उदय की योग्यता प्राप्‍त हो जाती है। चरणामृत को तैयार करने की विधि वीरशैव संप्रदाय में इस प्रकार बताई गयी है- गुरु या जंगम के पाद के अंगुष्‍ठ में रुद्र, तर्जनी में शंकर, मध्यमा में महादेव, अनामिका में त्रयंबक, कनिष्‍ठिका में ईशान; पाद के ऊपर के भाग में कपर्दि, पादतल में पंचवदन (सदाशिव), गुल्फों (टखनों) में रुद्र एवं भर्ग-इस प्रकार पाद की उंगुलियों में शिव की ही अनेक मूर्तियों की भावना करके भस्म, गंध आदि से पूजा की जाती है। तदनंतर पाद के अंगुष्‍ठ के ऊपर से शुद्‍ध जल से अभिषेक करके उस अभिषिक्‍त जल को अंगुष्‍ठ के नीचे एक पात्र में संग्रह करते हैं। इस प्रकार पाद-पूजा से प्राप्‍त चरणामृत को पादोदक कहते हैं। (पा.तं. 7/47-50)।

यह गुरु के पाद की पूजा से प्राप्‍त होने पर ‘गुरु-पादोदक’, जंगम के पाद की पूजा से प्राप्‍त होने पर ‘जंगम-पादोदक’ और इष्‍टलिंग की पूजा से प्राप्‍त होने पर ‘लिंग-पादोदक’ कहा जाता है। इन्हीं को क्रमशः ‘दीक्षा-पादोदक’, ‘शिक्षा-पादोदक’ और ‘ज्ञान-पादोदक’ भी कहते हैं। वीरशैव लोग प्रतिदिन गुरु अथवा जंगम के ‘पादोदक’ का सेवन करते हैं। कदाचित् इन दोनों के अभाव में अपने इष्‍टलिंग की पूजा से प्राप्‍त ‘लिंग-पादोदक’ का सेवन करते हैं (वी.आ.चं.पृष्‍ठ 119; चं.ज्ञा.आ. क्रियापाद. 5/4-19)।

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5. प्रसाद –
श्रद्‍धा से शिव को निवेदित वस्तुओं को प्रसाद कहते हैं। वस्तु भोग्य और धार्य के भेद से दो प्रकार की है। इनमें अन्‍न, जल आदि ‘भोग्य’ तथा वस्‍त्र, अलंकरण आदि ‘धार्य’ कहलाती हैं। वीरशैव धर्म में यह नियम है कि प्रत्येक व्यक्‍ति अपने ‘भोग्य’ और ‘धार्य’ वस्तुओं को गुरु, लिंग तथा जंगम को समर्पित करके अवशिष्‍ट भाग को ‘प्रसाद’ बुद्‍धि से स्वीकार करे। इससे मन में प्रसाद-गुण अर्थात् प्रसन्‍नता उत्पन्‍न होती है। मन की प्रसन्‍नता में निमित्‍त होने से इन शिवार्पित वस्तुओं को प्रसाद कहा गया है (च.ज्ञा.आ. क्रियापाद. 5/20-36; सि.शि. 11/6-7, पृष्‍ठ 194)।)

इस प्रसाद के सेवन से भक्‍ति का उदय होता है और भक्‍ति रहने पर ही शिवार्पित वस्तुओं में प्रसाद की बुद्‍धि होती है। इस तरह बीजाङ्. कुरवत् भक्‍ति और प्रसाद का अन्योन्य-संबंध है (सि.शि.9/11 पृष्‍ठ 140)। यह प्रसाद ‘शुद्‍ध’, ‘सिद्‍ध’ तथा ‘प्रसिद्‍ध’ के नाम से तीन प्रकार के हैं। गुरु को समर्पित किया हुआ ‘शुद्‍ध प्रसाद’, लिंग को समर्पित किया हुआ ‘सिद्‍ध प्रसाद’ और जंगम को समर्पित किया हुआ ‘प्रसिद्‍ध प्रसाद’ कहलाता है (वी.आ.चं.पृ.132)

Darshana : वीरशैव दर्शन

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6. विभूति –
गोमय से इसका निर्माण होता है। इसको तैयार करने की कल्प, अनुकल्प, उपकल्प और अकल्प ये चार प्रक्रियायें हैं। घर में गाय के गोमय को देते समय, उसके भूमि में गिरने से पहले ही सद्‍योजात मंत्रोच्‍चारणपूर्वक उसको ग्रहण करके, वामदेव मंत्र से गोला बनाकर, तत्पुरुष मंत्र से उसको सुखाना चाहिये। सूखने के बाद एक स्थंडिल पर अग्‍नि तैयार करके, अघोर मंत्र से जलाकर, ईशान मंत्र से उसका संचय करके, एक बिल्व पात्र में रखकर पूजा के समय उपयोग करना चाहिये। यही ‘कल्प’ प्रक्रिया है और यह सर्वश्रेष्‍ठ है। अरण्य में प्राप्‍त शुष्क गोमय को अघोर मंत्र से जलाकर तैयार करने की विधि को ‘अनुकल्प’ प्रक्रिया कहते हैं। दूकान में मिलने वाली भस्म को वस्‍त्र से छानकर उसमें गोमूत्र मिश्रण करके सुखाना चाहिये। पुन: अघोर मंत्र से जलाकर तैयार करने की विधि ही ‘उपकल्प’ प्रक्रिया है। इन तीनों प्रक्रियाओं से रहित यथा कथंचित् तैयार करने की विधि को ‘अकल्प’ प्रक्रिया कहते हैं (सि.शि. 7/13-18, पृ. 104,105)।

वीरशैव संप्रदाय में इष्‍टलिंग की पूजा के समय अपने शरीर के मस्तक, ललाट, दोनों कानों, कंठ, कंधे, दोनों भुजाओं, दोनों बाहुओं, मणिबंधों, वक्षस्थल, नाभि और पृष्‍ठ पर जलमिश्रित विभूति का त्रिपुंड धारण करने का विधान है (सि.श. 7/31-33, पृ. 109)। यह पाँच प्रकार के गाय के गोमय से उत्पन्‍न होने के कारण विभूति, भसित, भस्म, क्षार और रक्षा के नाम से पाँच प्रकार की है।

क. विभूति –
कपिल वर्ण की नंदा नाम की गाय के, जो कि शिव के सद्‍योजात मुख से उत्पन्‍न मानी जाती है, गोमय से तैयार की गयी भस्म को ‘विभूति’ कहते हैं। इसका उपयोग नित्य कर्मों को करते समय किया जाता है। ‘विभूतिर्भूतिहेतुत्वात्’ इस उक्‍ति के अनुसार ‘भूति’ अर्थात् आठ ऐश्‍वर्यों को देने वाला है, अतः इसे ‘विभूति’ कहते हैं। सि.शि. 7/5,7,8,10, पृष्‍ठ 102-104; बृ.जा.उ.। ब्रह्‍मण; शै.र. 7/73)।

ख. भसित –
शिव के वामदेव मुख से उत्पन्‍न मानी जाने वाली कृष्‍णवर्ण की ‘भद्रा’ नाम की गाय के गोमय से तैयार की गयी भस्म को ‘भसित’ कहते हैं। इसका उपयोग नैमित्‍तिक कर्मों को करते समय किया जाता है। ‘भसितं तत्वभासनात्’ इस वाक्य के अनुसार इसके धारण करने वाले को पर-शिव-तत्व का भासन, अर्थात् प्रकाशन होने लगता है। अतः इसको ‘भसित’ कहते हैं (सि.शि. 7/5, 7,8,10 पृष्‍ठ 102-104; बृ.जा.उ.। ब्राह्मण; शै.र. 7/74)।

ग. भस्म –
शुभ्र वर्ण की गाय को ‘सुरभि’ कहा जाता है। इसे शिव के अघोर मुख से उत्पन्‍न मानते हैं। इस ‘सुरभि’ के गोमय से तैयार की गयी विभूति को ‘भस्म’ कहते हैं। इसका उपयोग सभी प्रकार के प्रायश्‍चित्‍त-कर्मों को करते समय किया जाता है। ‘पापानां भर्त्सनात् भस्म’ इस निरुक्‍ति के अनुसार जिससे मनो-वाक्-काय-जन्य पापों को भय उत्पन्‍न होता है, अर्थात् इसके धारण से सभी प्रकार के पाप भय से भाग जाते हैं, उसे भस्म कहा गया है (सि.शि. 7/5,7/9,11 पृष्‍ठ 102-104; बृ.जा.उ.। ब्रह्मण; शै.र. 7/75)।

घ. क्षार –
धूम्र वर्ण की ‘सुशीला’ नाम की गाय के, जो कि शिव के तत्पुरुष मुख से उत्पन्‍न मानी जाती है, गोमय से तैयार की हुई भस्म को ‘क्षार’ कहते हैं। इसका उपयोग सभी प्रकार के नित्य, नैमित्‍तिक कर्मों के करते समय किया जाता है। ‘क्षरणात्क्षारमापदाम्’ इस उक्‍ति के अनुसार इसके धारण से सभी प्रकार की आपत्‍तियों का क्षय होता है, अर्थात् इससे सभी प्रकार की आपत्‍तियाँ दूर हो जाती हैं, अतः इसको ‘क्षार’ कहते हैं (सि.शि. 7/5,7,9,10, पृ. 102-104; बृ.जा.उ.। ब्राह्मण; शै.र. 7/76)।

ड. रक्षा –
शिव के ईशान मुख से उत्पन्‍न मानी जाने वाली लाल रंग की ‘सुमना’ नाम की गाय के गोमय से तैयार की गई भस्म को ‘रक्षा’ कहते हैं। इसका उपयोग मोक्ष के हेतुभूत निष्काम कर्मों के करते समय किया जाता है। ‘रक्षणात्! सर्वभूतेभ्यो रक्षेति परिगीयते’ इस उक्‍ति के अनुसार इसको धारण करने वाले की भूत, प्रेत आदि से रक्षा करने के कारण इसे ‘रक्षा’ कहा गया है। (सि.शि. 7/6,7,9,11, पृष्‍ठ 102-104; बृ.जा. उ.। ब्राह्मण शै.र. 7/77)।

Darshana : वीरशैव दर्शन

अष्‍टावरण

7. रूद्राक्ष –
रूद्राक्ष के संबंध में एक प्रसिद्‍ध कथा है कि त्रिपुरासुर-संहार के लिए निर्निमेष दृष्‍टि से बैठे हुये रुद्र के नेत्रजल से इसकी उत्पत्‍ति हुई थी (सि. शि. 7/3,4, पृष्‍ठ 113; अ.वी.सा.सं. भाग 2 पृ. 57)। उत्पत्‍ति के भेद से रुद्राक्ष के 38 भेद होते हैं। भगवान् रुद्र के सूर्यनेत्र से कपिल वर्ण के 12, चंद्रनेत्र से शुभ्र वर्ण के 16 और अग्‍नि नेत्र से कृष्ण वर्ण के 10 प्रकार के रुद्राक्ष उत्पन्‍न हुये (सि.शि. 7/5-7 प. 114)। ये रुद्राक्ष एक मुख से चौदह मुख तक के होते हैं।

वीरशैवों के लिये अपने इष्‍टलिंग की पूजा करते समय शिखा के स्थान पर एक मुख का एक रुद्राक्ष, शिर पर दो मुख, तीन मुख और बारह मुख का एक-एक और इस प्रकार तीन रुद्राक्ष, शिर के चारों ओर ग्यारह मुख के छत्‍तीस रुद्राक्ष, दोनों कानों में पाँच मुख, सात मुख और दस मुख के दो-दो और इस तरह छः छः रुद्राक्ष, कण्ठ में छः मुख के सोलह और आठ मुख के सोलह और इस तरह बत्‍तीस रुद्राक्ष, वक्षस्थल पर चार मुख के पचास रुद्राक्ष, दोनों बाहुओं में तेरह मुख के सोलह-सोलह रुद्राक्ष, दोनों मणिबंधों (कलाइयों) में नौ मुख के बारह-बारह रुद्राक्ष और चौदह मुख के एक सौ आठ रुद्राक्ष यज्ञोपवीत के रूप में धारण करने का विधान है। (सि.शि. 7/10-14 पृष्‍ठ 115, 116; शै.र. 8/1 पृष्‍ठ 86, 87)।

Darshana : वीरशैव दर्शन

अष्‍टावरण

8. मंत्र –
शिव का साक्षात्कार कराने वाला ‘ऊँ नम: शिवाय’ यह पंचाक्षर मंत्र वीरशैवों का प्रमुख मंत्र है। ऊँकार से संयुक्‍त होने के कारण वेदागमों में इसे षडक्षरमंत्र भी कहा गया है। (सि.शि. 8/7, 17, पृष्‍ठ 123, 126)। यह सप्‍तकोटि मंत्रों में श्रेष्‍ठ है। इस मंत्र के ‘मूल’, ‘विद्‍या’, ‘शिव’, ‘शैवसूत्र’ और ‘पंचाक्षर’ ये पाँच नाम है। यह सप्‍तकोटि मंत्रों का मूल कारण होने से ‘मूल’ कहलाता है। इसके मनन से शिव और जीव की एकता की बोधक शुद्‍ध विद्‍या का उदय होता है। अतः इसे ‘विद्‍या’ कहते हैं। शिव के दर्शन का निमित्‍त होने से यह ‘शिव’ कहलाता है। शिव-संबंधी सभी विषय इन्हीं पाँच अक्षरों में अत्यंत संक्षेप से प्रतिपादित हैं, अतः इसे ‘शैव सूत्र’ कहते हैं। पाँच अक्षरों से संयुक्‍त होने के कारण यह ‘पंचाक्षर’ कहलाता है (सि.शि. 8/23 पृष्‍ठ 129)।

वीरशैव धर्म के आचार्य अपने गोत्र के अनुयायी भक्‍तों को ‘मंत्र दीक्षा’ करते समय पुरुषों को ऊँकार-सहित और स्‍त्रियों को ऊँकार रहित इस मंत्र का उपदेश करते हैं। इस मंत्र के ऋषि वामदेव हैं। यह पंक्‍ति छंद का मंत्र है। शिव ही इसका अधिष्‍ठातृ-देवता है। ऊँकार ही बीज है। उमा शक्‍ति है। इस प्रकार इस मंत्र के ऋषि आदि को तथा न्यास आदि क्रम को गुरु-मुख से जानकर, तीन बार प्राणायाम करके, पूर्व या उत्‍तर दिशा की ओर बैठकर अपने इष्‍टलिंग की साक्षी में इस मंत्र का 108 या इससे अधिक यथाशक्‍ति रुद्राक्ष माला से जप करते हैं। यह जप वाचिक, उपांशु तथा मानसिक भेद से तीन प्रकार के हैं। समीपस्थ व्यक्‍ति को यदि मंत्र का उच्‍चारण सुनाई देता है तो वह वाचिक कहलाता है। यदि समीपस्थ व्यक्‍ति को सुनाई तो नहीं देता है, किंतु ओठों का चलना दिखाई देता है तो वह उपांशु कहलाता है। ओठ और चिह्वा के संचलन के बिना ही इस मंत्र के अर्थस्वरूप परशिव का मन में चिंतन करना मानसिक जप है। इन सबमें मानसिक जप ही श्रेष्‍ठ है। चं.ज्ञा.आ.क्रियापाद 8/9-12 तथा 48-74; सि.शि. 8/25-29 पृष्‍ठ 130-131)।

यह पंचाक्षर मंत्र ही भिन्‍न भिन्‍न बीजाक्षरों से संयुक्‍त होकर ‘प्रसाद-पंचाक्षरी’, ‘माया-पंचाक्षरी’, ‘सूक्ष्म-पंचाक्षरी’, ‘स्थूल-पंचाक्षरी’ और ‘मूल-पंचाक्षरी’ के नाम से पाँच प्रकार का होता है। ये क्रमशः दस, नौ, आठ, सात और छः वर्ण के होते हैं। इनका स्वरूप गोपनीय होता है। बीजाक्षरों से संयुक्‍त इन पंचाक्षरी मंत्रों का उपदेश सर्वसाधारण को नहीं किया जाता, किंतु इस धर्म के आचार्य ही इनके अधिकारी होते हैं। इनमें वीरगोत्र के आचार्यों को ‘प्रसाद-पंचाक्षरी’ का, नंदिगोत्र के आचार्यों को ‘माया पंचाक्षरी’ का, भृंगि गोत्र के आचार्यों को “सूक्ष्म-पंचाक्षरी’ का, वृषभगोत्र के आचार्यों को स्थूल-पंचाक्षरी’ का और स्कंद गोत्र के आचार्यो को ‘मूल-पंचाक्षरी’ का उपदेश दिया जाता है। यह उपदेश गुरुस्थान पर पट्‍टाभिषेक करते समय उनको दिया जाता है। (वी.सं. सं. 5-14-40)।

Darshana : वीरशैव दर्शन

असंग

संगविहीन।

पाशुपत योग के अनुसार पाशुपत साधक को विषयों से पूर्णतया निवृत्‍त हो जाना चाहिए; क्योंकि विषयों में रागमयी प्रवृत्‍ति के कारण साधक के इष्‍ट ध्यान में भंग आता है और मन में अश्रद्‍धा उत्पन्‍न होती है। समस्त भूत, वर्तमान तथा भविष्‍य संबंधी विषयों से मन को खींच लेना असंगता होती है। साधक को असंगता को प्राप्‍त करना होता है। असंगता में महेश्‍वर के साथ ऐकात्म्य होता है। (पा. सू. कौ. भा. पृ. 110); (तत्र लक्ष्यमाणस्य संगस्यात्यन्तव्यावृत्‍तिरसंगित्वम् – ग. का. टी. पृ. 16)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

असन्मान

अभिमान का परित्याग।

असन्मान पाशुपत योग की एक विधि है जो सबसे उत्‍तम विधि मानी गई है। इसमें साधक को अभिमान का पूर्णरूपेण त्याग करना होता है। अभिमान दो तरह का माना जाता है – जाति का अभिमान तथा गृहस्थ जीवन का अभिमान। अपने कुल, वर्ण आदि का अभिमान जात्याभिमान होता है और स्‍त्री, पुत्र आदि के साथ संबंध का अभिमान तथा घर, भूमि, पशुधन आदि के स्वामित्व का अभिमान गृहस्थी का अभिमान होता है। इन दोनों तरह के अभिमानों का त्याग अति उत्‍तम माना गया है – (असन्मानो हि यंत्राणां सर्वेषामुत्‍तम: स्मृत: – पा. सू. 4-9; पा. सू. कौ. भा. पृ. 100)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

असंप्रज्ञातसमाधि

असंप्रज्ञात वस्तुतः द्विविध योगों में एक है (द्वितीय है – संप्रज्ञात योग)। चित्त की निरोधभूमि में समाधि होने पर वह समाधि असंप्रज्ञातयोग कहलाती है। इस समाधि का उपाय विरामप्रत्यय (परवैराग्य) है। इस समाधि में चित्त में केवल संस्कार रहते हैं, वृत्तियों का पूर्णतः निरोध हो जाता है। इस असंप्रज्ञात के दो भेद हैं – भवप्रत्यय और उपायप्रत्यय (द्र. 1/19 का योगवार्त्तिक)। एक अन्य मत यह भी है कि निर्बीज समाधि दो प्रकार की है – असंप्रज्ञात और भवप्रत्यय। असंप्रज्ञात अवश्य ही कैवल्य का साधक है, भवप्रत्यय कैवल्यसाधक नहीं है। असंप्रज्ञातसमाधियुक्त चित्त को ‘निर्विषय’ कहा जाता है, क्योंकि कोई भी त्रैगुणिक वस्तु असंप्रज्ञात का आलम्बन नहीं होता। संप्रज्ञात का अधिगम करने के बाद ही यह असंप्रज्ञात समाधि साधनीय होती है – यह जानना चाहिए।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

असंप्रमोष

स्मृति नामक वृत्ति के लक्षण में कहा गया है कि प्रमाण आदि वृत्तियों के द्वारा जो विषय अनुभूत होता है, उसका असंप्रमोष=अनपहरण (अपहृत न होना) स्मृति है (द्र. योगसू. 1/11)। ‘असंप्रमोष’ शब्द के ‘मुष स्तेय’ से बनता है; स्तेय=चोरी करना; संप्रमोष इस स्तेय की प्रकृष्ट अवस्था है; संप्रमोष का न होना असंप्रमोष है। अनुभव द्वारा अवभासित विषय से अधिक विषय का ग्रहण संप्रमोष है; इस अधिक विषय का ग्रहण न होना ही असंप्रमोष है। पहले जो विषय ज्ञात होता है, उसका ही संस्कार होता है। इस संस्कार का ही स्थूल परिणाम स्मृति है। स्मृति में पूर्वज्ञात विषय के अतिरिक्त अन्य किसी का भी ज्ञान नहीं होता, भले ही पूर्वज्ञात विषय से कम विषय का ज्ञान स्मृति में हो (पूर्वज्ञात विषय अंशतः विस्मृत हो जाए) – इस भाव को दिखाने के लिए ही अन्य किसी शब्द का प्रयोग न करके ‘मुष’ धातु घटित असंप्रमोष शब्द का प्रयोग किया गया है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

असंव्यवहार

पाशुपत योग में यमों का एक प्रकार।

पाशुपत योगी को व्यवहार से रहित होना होता है। व्यवहार दो प्रकार का होता है – क्रय, विक्रय, व्यवसाय आदि जीवन निर्वाह का व्यवहार और राजनीति प्रशासन आदि अधिकारमय व्यवहार। इन दोनों प्रकारों के व्यवहारों से अपने को भी खेद होता रहता है और दूसरों को भी कष्‍ट दिया जाता है। पाशुपत योगी को जीवन निर्वाह आदि के समस्त व्यवहारों को छोड़कर एकमात्र साधना में लगा रहना होता है। उसकी साधना के इस अनुशासन को असंव्यवहार कहते हैं। (पा. सू. कौ. भा. पृ. 22)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

असुर

जो व्यक्ति श्रीकृष्ण को परम तत्त्व के रूप में न मान कर उनसे भिन्न किसी अन्य को ही परम तत्त्व मानता है, वह असुर है। पुराणों का वचन है – हे बुधजनों! यशोदा की गोद में लालित तत्त्व को ही परत तत्त्व समझो। उससे भिन्न को जो परम तत्त्व मानते हैं, उन्हें असुर समझो (अ.भा.पृ. 1439)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

अस्तेय

पाशुपत योग के अनुसार यमों का एक भेद।

पाशुपत योगी को उपहार के रूप में भोजन आदि के न मिलने पर किसी अन्य प्रकार से किसी अन्य वस्तु को ग्रहण करना स्तेय माना गया है। ऐसा न करना अस्तेय है। अर्थात् केवल वही वस्तु ग्रहण करनी होती है, जो उपहार के रूप में मिले, और कोई नहीं। स्तेय (चौर्य) छः प्राकर का माना गया है –

1. अदत्‍तादानम् – जो वस्तु नहीं दी गई हो फिर स्वयमेव ही उसे ले लेना।
2. अनतिसृष्‍टग्रहणम् – बालक, उन्मत्‍त (पागल) प्रमत्‍त (जो अपनी वस्तुओं को ध्यान से न रखता हो), वृद्‍ध अथवा निर्बल की वस्तु को ले लेना।
3. अनभिमतग्रहण – कीड़ों, भ्रमरों, पक्षियों आदि के काम आने वाली वस्तुओं का अपहरण।
4. अनुपालम्भ – जादू से, छल से या डांट फटकार आदि उपायों से किसी का सुवर्ण या वस्‍त्रों का हरण।
5. अनिवेदित उपयोग – गुरु को बिना अर्पण किए किसी भी भक्ष्य पदार्थ का पान या भोग।

पाशुपत शास्‍त्र में आचार्य इस छः प्रकार के स्तेय का निषेध करते है। चौर्य – पाप प्राणिवध के समान पाप होता है अतः पाशुपत धर्म के आचार में इसका सर्वथा निषेध किया गया है। (पा. सू. कौ भा. पृ. 24)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

अस्तेय

जिस द्रव्य का कोई अन्य स्वामी हो, उसे ग्रहण करना, अर्थात् उसको अपना स्व. समझना (स्वामी की अनुमति के बिना) स्तेय है। इस प्रकार किसी द्रव्य का ग्रहण न करना अस्तेय है। यह अस्तेय पंचविध यमों में से एक है (द्र. योगसू. 2/30)। हस्त आदि कर्मेन्द्रियों से ग्रहण न करना मात्र अस्तेय नहीं है। अस्तेय वस्तुतः स्पृहारूप है, अर्थात् परद्रव्य का स्वामी न होने की इच्छा ही अस्तेय है। यह ज्ञातव्य है कि धर्मशास्त्रोक्त प्रतिग्रह अस्तेय का विरोधी नहीं है, क्योंकि वह शास्त्रविहित है। जिसमें यह अस्तेय-बुद्धि सुप्रतिष्ठित हो जाती है उसके यहाँ चेतनरत्न (विचारक मनुष्य) और अचेतनरत्न स्वयं उपस्थित होते हैं (अचेतनरत्न दाताओं द्वारा उपहृत किए जाते हैं), यह योगशास्त्र का मत है (द्र. योगसू. 2/37)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अस्मिता (अविशेष)

चार ‘गुणपर्वों’ में एक ‘अविशेष’ है (द्र. योगसूत्र 2/19); अन्य तीन हैं – विशेष, लिङ्गमात्र एवं अलिङ्ग। अविशेष छः हैं – पाँच तन्मात्र तथा छठा अस्मितारूप अविशेष (षष्ठश्च अविशेषोSस्मितामात्र; व्यासभाष्य 2/19)। इस अस्मिता रूप अविशेष से बाह्य एवं आन्तर इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं। प्राचीन आचार्यों ने अस्मिता की व्याख्या ‘अस्मिभाव’ कहकर की है। यह सांख्य का अहंकार है, जो महत्तत्त्व का परिणामभूत है।
इस अस्मिता (नामान्तर अस्मितामात्र) को उपादान बनाकर योगी निर्माणचित्त का निर्माण करते हैं (आत्मज्ञान का उपदेश शिष्यों के प्रति करने के लिए) (द्र. योगसूत्र 4/4)। इस अस्मिता के साथ विशोका -जयोतिष्मती प्रवृति का अच्छेद्य सम्बन्ध है। द्र. ज्योतिष्मती शब्द।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अस्मिता (क्लेश)

पाँच प्रकार के ‘क्लेशों’ में अस्मिता एक है (अन्य चार हैं – अविद्या, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश)। अस्मिताक्लेश का नामान्तर ‘मोह’ है (द्र. सांख्यकारिका 47 की टीकाएँ)।
अस्मिता-क्लेश का स्वरूप है – अपरिणामी कूटस्थ पुरुष तथा परिणामी बुद्धि – इन दोनों को (सादृश्य के आधार पर) एक की तरह समझना। इस क्लेश के कारण चिद्रूप आत्मा (निर्गुण पुरुष) में अनात्मवस्तु के धर्म आरोपित होते हैं और यह समझा जाता है कि पुरुष वस्तुतः बुद्धिधर्म सुखदुःखादि से पीड़ित होते हैं। यह अस्मिता वस्तुतः अविद्याप्रभव है; अविद्या ही इसका उपादान है। अविद्या के कारण वस्तु-विषयक अयथार्थ ज्ञान होने पर अस्मिता आदि क्लेश उदित होते हैं जिससे प्राणी ऐसा कर्म करता है जो अन्त में दुःखदायक होता है।
इस अस्मिताक्लेश के आठ भेदों की बात सांख्याचार्यों ने विशेषतः कही है। अष्टविध ऐश्वर्य (अणिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व एवं यत्रकामावसायित्व) में आसक्ति होने के कारण योगी प्रायः मोक्षमार्ग से विमुख हो जाते हैं, अतः यह अस्मिता आत्मज्ञान -विरोधी अज्ञान ही है (द्र. सांख्यकारिका 48)। व्याख्याकारों ने कहा है कि यह अस्मिता अन्यान्य क्लेशों की तुलना में अधिक शाक्तिशाली है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

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