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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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अविद्या

भगवान् की मुख्य द्वादश शक्तियों में अन्यतम शक्ति अविद्या है। श्री, पुष्टि, गिरा, कान्ति, कीर्ति, तुष्टि, इला, ऊर्जा, विद्या, अविद्या, शक्ति और माया ये भगवान की मुख्य शक्तियाँ हैं। इनमें अविद्या शक्ति आवरण का काम करती है। माया शक्ति विक्षेप का काम करती है। अन्य शक्तियाँ भी अपने नाम के अनुरूप कार्य करती हैं। यह अविद्या शक्ति विद्या का अभाव रूप नहीं है किन्तु विद्या से विपरीत भाव रूप है (त.दी.नि.पृ. 78)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

अविद्या

द्रष्टा और दृश्य के जिस ‘संयोग’ के कारण दुःख होता है, उस संयोग का हेतु अविद्या है – यह योगसूत्र (2/24) में स्पष्टतया कहा गया है। यह अविद्या ‘विपर्ययज्ञान की वासनारूपा’ है। अविद्या अनादि है, अतः संयोग भी अनादि है – जीवभाव भी अनादि है। अनादि होने पर भी अविद्या का नाश होता है। नाश का हेतु विद्या (=विवेक) अर्थात् प्रकृति -पुरुष के भेद का ज्ञान है। विद्या द्वारा अविद्या का नाश होने पर बन्धाभाव होता है, वही कैवल्य या मुक्ति है। अविद्या का दूसरा नाम अदर्शन है (व्यासभाष्य 2/23)।
यह अविद्या मूल ‘क्लेश’ है। अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश रूप चार क्लेशों की यह प्रसवभूमि है (योग सू. 2/4)। जिस विषय में अविद्या होती है, उस वस्तु के प्रति अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश की वृत्ति उत्पन्न होती है; अविद्या न हो तो राग आदि नहीं होते हैं। अविद्या रूप मिथ्याज्ञान संसारदुःख का हेतु है, अतः वह क्लेश (क्लिश्नाति इति क्लेशः) कहलाती है। योगसूत्र में कहा गया है कि अनित्य, अशुचि, दुःख और अनात्मा नित्य, शुचि, सुख और आत्मा का बोध होना अविद्या है (2/5)। यह स्पष्टतया ज्ञातव्य है कि यह अविद्या विद्या (विवेकज्ञान) का अभावरूप नहीं है; विद्या -विरोधी ज्ञान -विशेष अविद्या है; यह भावपदार्थ है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अविनाभाव – संबंध

जगत् की सृष्‍टि के लिये परशिव में इच्छा आदि का होना आवश्यक है। परशिव में शक्‍ति के बिना इच्छा आदि का उदय नहीं हो सकता, अतः वीर शैव आचार्यो ने परशिव को शक्‍ति-विशिष्‍ट माना है। शिव और शक्‍ति दोनों के नित्य होने के कारण दोनों का संबंध भी जन्य न होकर नित्य ही होना चाहिये। इस तरह से शिव और शक्‍ति को जो अव्यभिचरित नित्य संबंध है, वही अविनाभाव संबंध कहलाता है। (सि.शि. 20/4, पृ.202; 2/12, पृ.14)।

शिव और शक्‍ति का यह संबंध भेदाടभेद – पर्यवसायी है, क्योंकि परशिव की केवलावस्था में सत्-चित्-आनंद के बोधरूप विमर्श-शक्‍ति पर-शिव के साथ तादात्म्य से रहती है और पर-शिव की लीलावस्था में (सृष्‍टि के समय में) यह शक्‍ति क्षुब्ध होकर इच्छा, ज्ञान आदि रूपों में विभक्‍त हो जाती है और विश्‍व-रचना में सहायक बनती है। अतः यह शक्‍ति परशिव के साथ सच्‍चिदानंद रूप से अभिन्‍न है और इच्छा आदि रूपों से भिन्‍न भी है। इस प्रकार शिव और शक्‍ति के इस अविनाभाव संबंध को भेदाടभेद नियामक माना जाता है (श.वि.द.पृ. 109-110; सि.शि. 1/11 पृ. 5)।

Darshana : वीरशैव दर्शन

अविभाग-परामर्श

जगत् की उत्पत्‍ति के पूर्व की विमर्श-शक्‍ति की अवस्था को अविभाग-परामर्श कहते हैं। इस अवस्था में परशिव को केवल ‘अहं’ (मैं) बोध रहता है। अभी ‘इदं’ (यह) इत्याकारक बोध विकसित नहीं हुआ होता। इस स्थिति में विमर्श-शक्‍ति में रहने वाली इच्छा, ज्ञान आदि शक्‍तियाँ परस्पर विभाग के बिना समरस भाव से रहती हैं। यह समरस भाव ‘मयूराण्डरस’ की तरह है। अर्थात् जिस प्रकार मयूराण्ड के रस में भावी पक्षी के पाद, पंख, वर्ण-वैचित्र्य आदि परस्पर विभाग के बिना एकाकार में रहते हैं, उसकी प्रकार जगत् की उत्पत्‍ति की कारणीभूत इच्छा, ज्ञान, क्रिया शक्‍तियाँ विमर्श-शक्‍ति में समरस भाव से रहती है। वस्तुत: इस अवस्था में सब कुछ एकाकार रहने के कारण इसको अविभाग-परामर्श कहते हैं। (सि.शि. 5-39. 5/39 तत्वप्रदीपिका टीकासहित देखें, पृ. 65-66)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

अविरति

योगाभ्यास के नौ अन्तरायों में यह एक है (योगसू. 1/30)। व्यासभाष्य में इसका लक्षण है – चित्त का वह गर्धतृष्णा जिसका निमित्त है – विषयसंप्रयोग, अर्थात् विषय का सन्निकर्ष होने के कारण जो विषयाभिलाषा विषयतृष्णा, या विषयासक्ति होती है, वह अविरति है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अविवेक

सांख्ययोगशास्त्र में ‘अविवेक’ का अर्थ विवेक का अभाव न होकर ‘विवेकविरोधी ज्ञान विशेष’ है। अत्यन्त भिन्न बुद्धि और पुरुष को (या गुण -पुरुष को) भिन्न न समझकर एक समझना ही अविवेक है। यह ‘अभेद-अभिमान’ भी कहलाता है। इसका नामान्तर अज्ञान है। ज्ञान जिस प्रकार बुद्धि का एक (सात्त्विक) रूप है, यह अज्ञान भी उसी प्रकार बुद्धि का एक (तामस) रूप है। यह अविवेक कई रूपों में विद्यमान है। जिस प्रकार देह, इन्द्रिय आदि को आत्मा समझना अविवेक है, उसी प्रकार आत्मा को देह आदि समझना भी अविवेक है। कोई-कोई आचार्य ‘विवेक की उत्पत्ति न होना’ ही अविवेक है, ऐसा समझते हैं। द्र. विवेक, अविद्या, अज्ञान।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अविशेष परिणाम

त्रिगुण के जो परिणाम (तात्त्विक परिणाम) होते हैं, उनके चार भेद माने जाते हैं – विशेष, अविशेष, लिंगमात्र और अलिंग। अविशेष परिणाम में पाँच तन्मात्र एवं एक अहंकार (नामान्तर, ‘अस्मिता’) – इस प्रकार छः पदार्थ गिने जाते हैं। प्रत्येक भूत में जो सुखकरत्व आदि विशेष है तथा जो स्वगतभेद हैं (जैसे तेजोभूत के लाल -नील आदि भेद) वे तन्मात्र में नहीं रहते; अतः वे अविशेष कहलाते हैं – यह व्याख्याकारों का कहना है। अहंकार (अस्मिता) इन्द्रियों की प्रकृति है। इन्द्रियों में रहने वाला स्वगत भेद इन्द्रियप्रकृतिभूत अहंकार में नहीं रहता – इस दृष्टि से अहंकार की गणना भी अविशेष में की जाती है। तन्मात्र एवं अहंकार दोनों के अविशेष होने पर भी अहंकार के तामस भाग (भूतादि नामक) से तन्मात्रों की उत्पत्ति होती है। यह उत्पत्ति कैसे होती है, इसका रहस्य योगपरम्परा से ज्ञातव्य है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अविहिता भक्ति

काम, क्रोध, भय, स्नेह, ऐक्य या सौहृद रूप उपाधि के वश से उत्पन्न भगवद्विषयक स्नेहभाव अविहिता भक्ति है। यद्यपि द्वेष रूप उपाधि में भगवान के प्रति स्नेह नहीं होता, फिर भी कामादि के समान ही शास्त्र द्वारा अविहित होने के कारण तथा भगवद् विषयक तन्मयता के कारण द्वेष भाव में भी अविहित भक्ति है, क्योंकि द्वेषभाव भी भगवान में प्रवेश का हेतु होता है।
माहात्म्य ज्ञान के साथ भगवान् के रूप में अपने प्रभु के प्रति निरुपाधिक (निर्व्याज) स्नेह विहिता भक्ति है। ऐसी भक्ति शास्त्र विहित होने से विहिता भक्ति कही जाती है (अ.भा.पृ. 1104)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

अवीत

सांख्याचार्यों ने अनुमान को वीत-अवीत-भेद से दो भागों में बाँटा था – यह प्रसिद्ध है, क्योंकि युक्तिदीपिका टीका में ‘वीतावीत -विषाणस्य सांख्यकरिणः’ (सांख्यरूप हस्ती के वीत-अवीत-रूप दो दाँत हैं) कहा गया है। वाचस्पति (सांख्यकारिक 5 की टीका में) कहते हैं कि जिसको शेषवत् अनुमान कहा जाता है, उसी का नामान्तर अवीत है। (पूर्ववत्-शेषवत्-सामान्यतोदृष्ट भेद से अनुमान का त्रिधा विभाग न्यायशास्त्र में प्रसिद्ध है; कुछ व्याख्याकार कहते हैं कि षष्टितन्त्र में भी ऐसा विभाग था; द्र. सांख्यकारिका की 5 कारिका की जयमङ्गला टीका)। द्र. अनुमान।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अव्यक्त

अव्यक्त से ही व्यक्त की उत्पत्ति होती है, अतः इस व्यक्त जगत् की पूर्वावस्था को अव्यक्त कहते हैं। अव्यक्त शब्द का अर्थ भगवत्कृपा भी है, क्योंकि भगवत्कृपा का ही परिणाम यह संपूर्ण जगत् है (अ.भा.पृ. 480)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

अव्यक्त

सत्त्व-रजः-तमः नामक तीन गुणों का वैषम्यभाव जिस अवस्था में नहीं रहता अर्थात् जिस अवस्था में ये गुण साम्यावस्था में रहते हैं, वह ‘अव्यक्त’ कहलाती है। अव्यक्तावस्था मे त्रिगुण का जो परिणाम होता है, वह दो प्रकार का है – सदृशपरिणाम और विसदृशपरिणाम। प्रथम का अर्थ है – अव्यक्त का स्वरूपमात्र में अवस्थान जिसमें किसी भी गुण का प्राधान्य न हो; गुण चलस्वभाव है, अतः इस अवस्था में भी परिणाम अवश्य होता है, पर वह महदादितत्वों को उत्पन्न नहीं करता। द्वितीय का अर्थ है – तीन गुणों में अङ्ग-अङ्गी-भाव (अर्थात् अप्राधान्य-प्राधान्य भाव) का उत्पन्न होना, जिससे महत् आदि तत्वों का उदय होता है। अव्यक्त की यह द्विविध स्थिति पंचशिख के वाक्य में (3/23 व्यासभाष्य में उद्घृत) तथा सांख्यसूत्र (6/42) में स्पष्टतया कही गई है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अव्यक्‍तलिंगी

अस्पष्‍ट चिह्नों वाला।

पाशुपत योग विधि के अनुसार पाशुपत साधक को साधना के ऊँचे स्तरों पर योग क्रियाओं की साधना अव्यक्‍त रूप से करनी होती है, अर्थात् योग साधना सबको दिखाते हुए नहीं करनी होती है। पाशुपत साधक साधना करता रहे परंतु उस साधना का कोई व्यक्‍त लिङ्ग (चिह्‍न) दूसरों को न दिखाई दे। इस तरह से पाशुपात साधक को योग साधना गुप्‍त रूप से करनी होती है। (पा. सू. सौ. भा. पृ. 78)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

अव्यक्‍तावस्था

अवस्था का दूसरा प्रकार।

पाशुपत योगी की साधना की द्‍वितीयावस्था अव्यक्‍तावस्था कहलाती है क्योंकि उस अवस्था में साधक को योग साधना के सभी चिह्‍नों का तथा विद्‍या आदि का गोपन करना होता है; अर्थात् सारी साधना गुप्‍त रूप से करनी होती है। शरीर पर ऐसा कोई चिह्न या द्रव्य धारण नहीं करना होता है जिससे उसका साधक होना व्यक्‍त या प्रकट हो जाए। अतः साधक की साधना के अप्रकट होने के कारण यह अवस्था अव्यक्‍तावस्था कहलाती है। प्रेतवत्, उन्मत्‍तवत् या मूढ़वत् जब साधक घूमता है तब भी वह अव्यक्‍तावस्था में ही होता है; क्योंकि तब भी उसका साधक होना व्यक्‍त नहीं होता है। (ग. का. पृ. 8)

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

अशरीर मुक्ति

देखिए मुक्ति (अशरीर)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अशुक्लाकृष्ण कर्म

कर्म को जिन चार भागों में बाँटा गया है, उनमें अशुक्ल-अकृष्ण कर्म चतुर्थ है (प्रथम तीन हैं – कृष्ण, शुक्लकृष्ण और शुक्ल) (द्र. योगसू. 4/7)। यह कर्म जीवन्मुक्त अवस्था में स्थित चरमदेही योगियों द्वारा निष्पादित होता है। इन अभिमानशून्य योगियों के कर्म हिंसादिशून्य होते हैं, अतः वे अकृष्ण कहलाते हैं। यमनियम-ध्यानादि जो शुक्लकर्म हैं, जिसमें हिंसादि नहीं हैं, उनको ये योगी फलकामनाशून्य होकर करते हैं; अतः इन कर्मों के संस्कार विवेकमूलक ही होते हैं – अविद्यामूलक नहीं। इस प्रकार का कर्म बन्धन का हेतु नहीं होता। अतः शरीरधारण का संस्कार नष्ट होने पर इन योगियों का चित्त शाश्वत काल के लिए निरुद्ध हो जाता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अशुद्ध अध्वन्

देखिए अध्वन्।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अशुद्ध विकल्प

देखिए विकल्प।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अशुद्ध विद्या तत्त्व

शुद्ध संवित् स्वरूप परमशिव की परिपूर्ण ज्ञानशक्ति को संकुचित अवस्था तक लाने वाला संकोचक तत्त्व। इसे विद्या तत्त्व भी कहते हैं। शिव की परिपूर्ण ज्ञान शक्ति पशु प्रमाता में इस आवरक तत्त्व के कारण संकुचित ज्ञानशक्ति का रूप धारण करती है। इसके प्रभाव से पशु प्रमाता अर्थात् जीव इच्छानुसार सभी कुछ नहीं जान सकता, अपितु उसमें किसी किसी विषय को ही जानने की सामर्थ्य रहती है। (शिवसूत्रवार्तिक (भास्कर), पृ. 44; तन्त्र सार , पृ. 81)। माया तत्त्व से विकसित होने वाले पाँच कंचुक तत्त्वों में से यह एक तत्त्व है। देखिए कंचुक तत्त्व।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अशुद्धि

अविद्या आदि के वशीभूत रहकर कर्म करने से जो संस्कार होता है, वह अशुद्धि है अथवा अविद्या आदि क्लेश की अशुद्धि है (योगसूत्र 2/28)। अशुद्धि के कारण जो कर्म किया जाता है, वह अधर्म कहलाता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अष्ट अतिग्रह

प्राण, मन और वाक् सहित चक्षुरादि पंच ज्ञानेन्द्रियाँ अष्ट अतिग्रह हैं। इन्हें ही श्रुतियों में अष्ट ग्रह भी कहा गया है। विषय का ग्रहण करने के कारण ये ग्रह कहे जाते हैं तथा विषय के ग्रहण में इनका अतिशय योग होने से ये अतिग्रह शब्द से व्यवहृत होते हैं। प्राण श्वास-प्रश्वास क्रिया द्वारा जीवन प्रदान कर हर प्रकार के विषय ग्रहण में प्रयोजक है। मन भी विषय ग्रहण में सभी इन्द्रियों का सहायक होता है। वाक् शब्द को उत्पन्न कर श्रोतेन्द्रिय को विषय प्रदान करती है। इस प्रकार प्राण, मन और वाक् की सहायता से चक्षुरादि इन्द्रियाँ रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द को ग्रहण करती हैं। इसलिए ये आठों अतिग्रह हैं। वस्तुतः प्राण ही वृत्तिभेद से उक्त आठ भेदों में विभक्त है, क्योंकि प्राण सभी में अनुस्यूत है (अ.भा.पृ. 776)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

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