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Rajaneetivijnan Paribhasha Kosh (English-Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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Racial groups

प्रजातीय समूह धर्म, वर्ण और मूलवंश के आधार पर अन्य प्रजातीय समूहों से अलग पहचाने जाने वाले समूह जैसे, काकेशियन, मंगोलियन आदि। इनकी प्रजातीय भावना इन्हें एकसूत्र में बांधे रखने में प्रेरक रहती है।

Racial myth

प्रजातीय मिथक जनमानस में व्याप्त किसी प्रजाति की श्रेष्ठता से संबंधित भावना जो उसके लीक साहित्य, संगीत तथा कला में प्रतिबिंबित होती है तथा जो समाज में अनेक प्रकार की मिथ्या धारणाओं तथा पूर्वाग्रहों को जन्म देती है।

Racial purity

प्रजातीय विशुद्धता किसी प्रजाती विशेष में, विशेषकर उसके नेताओं में, व्याप्त यह धारणा कि उनकी प्रजाति अपने मूल स्वरूप को बनाए हुए है और उसमें अन्य प्रजातियों का सम्मिश्रण नहीं हुआ है। वे उसके मूल विशुद्ध रूप को बनाए रखने के लिए अन्य प्रजातियों से सामाजिक संबंधों को वर्जित रखने का प्रयास करते हैं।

Racist

प्रजातिवादी वे लोग जो अपनी प्रजाति को अन्य प्रजातियों से श्रेष्ठ मानकर अन्य प्रजातियों को हीन भावना की दृष्टि से देखते है और राज्य की सब सुख-सुविधाओं से इनको वंचित करना चाहते हैं। इसके पीछे मुख्य उद्देश्य राज्य की राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्था पर अपनी प्रजाति का वर्चस्व बनाए रखना है। इसके सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं जर्मनी के हिटलर और दक्षिण अफ्रीका के बोथा।

Radical humanism

उग्र मानवतावाद इस विचारधारा के प्रणेता प्रसिद्ध भारतीय क्रांतिकारी मानवेंद्र नाथ राय थे। ये प्रारंभ में अंतर्राष्ट्रीय साम्यवादी आंदोलन से जुड़े हुए थे परंतु कालांतर में अंतर्राष्ट्रीय साम्यवादी आंदोलन से जुड़े हुए थे परंतु कालांतर में साम्यवाद की अधिनायकवादी व्यवस्था से असंतुष्ट होकर इन्होंने एक नई विचारधारा को जन्म दिया जिसका लक्ष्य समाजवाद और मानवतावाद का समन्वय करना था। मानवेंद्र नाथ राय ने इसे “उग्र मानवतावाद” का नाम दिया। इस दशक में साम्यवादी राज्यों में होने वाली उथल-पुथल श्री राय की दूरदर्शिता को प्रमाणित करती है।

Rajya Sabha

राज्य सभा भारतीय संसद का उच्च सदन जिसमें अधिक से अधिक 250 सदस्य हो सकते हैं। इनमें से 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जाते हैं और शेष राज्य की विधान सभाओं द्वारा निर्वाचित किए जाते हैं। प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल 6 वर्ष होता है। प्रत्येक दो वर्ष के पश्चात् इसके एक-तिहाई सदस्य पदनिवृत्त होते हैं और उनके स्थान पर नए सदस्य निर्वाचित किए जाते हैं। भारत का उपराष्ट्रपति राज्य सभा का पदेन सभापति होता है। विधायी और वित्तीय मामलों में यह सदन लोक सभा की अपेक्षा दुर्बल है परंतु संविधान-संशोधन में इसकी स्थिति लोक सभा के समान है। इसके सदस्य राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के निर्वाचनों में भी भाग लेते हैं। इसे कई ऐसे अधिकार प्राप्त हैं जो लोक सभा को नहीं है अतः एक दुर्बल सदन होते हुए भी यह इंग्लैंड की लार्ड सभा से कहीं अधिक शक्तिशाली है।

Realpolitic

शक्तिपरक राजनीति, यथार्थपरक राजनीति यथार्थवाद पर आधारित राजनीति। चूँकि राजनीति का केंद्र बिंदु शक्ति है अतः यह राजनीति शक्ति संचय व शक्तिप्रसार को राज्य का प्रधान लक्ष्य मानती है। इसके प्रणेता जर्मन विचारक हॉकशॉफर थे।

Real union

वास्तविक संघ ऐसी स्थिति जब दो या दो से अधिक राज्य अपनी आंतरिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए एक दूसरे से मिल जाएँ और अंतर्राष्ट्रीय मामलों में एक इकाई बन जाएँ।

Real will

आदर्श इच्छा इस पद का प्रयोग आदर्शवादी विचारकों (रूसो, बोसांके) के दर्शन में मिलता है। रूसो के अनुसार मनुष्य में दो प्रकार की इच्छाएँ होती हैं :- (1) आदर्श इच्छा, और (2) यथार्थ इच्छा। “आदर्श इच्छा” विवेकपूर्ण और निःस्वार्थ होती है। विवेक पर आधारित होने के कारण यह सभी मनुष्यों में एक समान होती है। अतः सब मनुष्यों की “आदर्श इच्छाओं” के संग्रह से पूरे समाज की सामान्य इच्छा बनती है। “आदर्श इच्छा” के विपरीत “यथार्थ इच्छा” व्यक्तिगत स्वार्थ, लोभ और वासना पर आधारित होती है अतः एक मनुष्य की यथार्थ इच्छा प्रायः दूसरे मनुष्य की यथार्थ इच्छा की प्रतिद्वंद्वी होती है।

Rebellion

विप्लव, बगावत स्थापित राजकीय व्यवस्था के विरुद्ध व्यापक, संगठित एवं सशस्त्र विद्रोह जिसका उद्देश्य वर्तमान व्यवस्था को विस्थापित करना होता है।

Recess appointments

मध्यावकाश नियुक्तियाँ यह पद अमेरिकी संवैधानिक व्यवस्था से संबंधित है। संयुक्त राज्य अमेरिका में राष्ट्रपति द्वारा सभी सर्वोच्च पदों पर नियुक्तियाँ सीनेट के दो-तिहाई बहुमत से संपुष्ट होती है। सीनेट के अधिवेशन में न होने की अवधि में राष्ट्रपति अस्थायी रूप से नियुक्तियाँ कर सकता है जो सीनेट द्वारा संपुष्ट किए जाने तक वैध रहती हैं। ऐसी नियुक्तियों को “मध्यावकाश नियुक्तियों” कहते हैं।

Recognition of absentee government

अन्यत्रवासी सरकार को मान्यता दोनों महायुद्धों में शत्रु के आक्रमण होने पर अनेक यूरोपीय देशों की सरकारें अन्य देशों में शरण लेने को विवश हुईं। स्थानीय राज्यों द्वारा इन्हें अपने-अपने देशों की वैध सरकारों के रूप में मान्यता दी गई। ऐसी सरकारों की मान्यता को “अन्यत्रवासी सरकार को मान्यता” कहा जाता है क्योंकि ये सरकारें अपने देशों की भूमि पर विद्यमान नहीं थीं और न ही अपने देशों के शासन पर इनका कोई तथ्येन नियंत्रण था।

Recongnition of belligerency

युद्धकारिता को मान्यता किसी देश की स्थापित सरकार के विरुद्ध संगठित, व्यापक एवं सशस्त्र विद्रोह होने की अवस्था में विद्रोहकारियों को निम्नालिखित दशाएँ होने पर, अन्य देशों द्वारा युद्धकारियों के रूप में मान्यता दी जा सकती है जिसके फलस्वरूप इन्हें स्वतंत्र राज्यों के समान युद्धकारी अधिकार प्राप्त हो जाते हैं। ये दशाएँ हैं :- 1. विद्रोहकारियों का देश के एक बड़े भाग पर वास्तविक नियंत्रण होना, 2. विद्रोहकारियों का एक सेनाधिपति की अधीनता में सुव्यवस्थित रूप से संगठित होना, 3. इनके द्वारा युद्ध के नियमों का पालन किया जाना, तथा 4. ऐसी दशाएँ उत्पन्न हो जाना कि विदेशों के लिए विद्रोहकारियों के प्रति अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करना आवश्यक हो जाए।

Recongnition of insurgency

विद्रोहकारिता को मान्यता लॉटर पैक्ट के अनुसार विद्रोहकारिता की मान्यता से कोई विधिक स्थिति उत्पन्न नहीं होती। गृहयुद्ध में विद्रोहकारियों को कुछ अधिकार दिए जा सकते हैं जो पूर्ण युद्धकारी अधिकारों से कम होते हैं। यह इसलिए किया जाता है कि विद्रोहकारियों को न तो युद्धकारियों वाली मान्यता दी जा सकती है और न ही उनकी पूर्णतया उपेक्षा की जा सकती है। अतः उन्हें मान्यता देनेवाला राज्य, परिस्थितियों के अनुसार, उन्हें युद्धकारियों के कुछ अधिकार देना स्वीकार कर सकता है। इस स्थिति को “विद्रोहकारियों को मान्यता” कहा जाता है। इसका उदाहरण है स्पेन के गृहयुद्ध में विद्रोहकारियों को ब्रिटेन द्वारा दी गई मान्यता। परंतु पिछले पचास वर्षों में इसका कोई उदाहरण नहीं मिलता।

Recognition of opposition

विपक्ष को मान्यता संसद में सत्तारूढ़ दल के अतिरिक्त सर्वाधिक स्थान पाने वाले दल या दलसमूह को विपक्ष के रूप में स्वीकार किया जाना। इसके नेता को विपक्ष का नेता माना जाता है और उसे मंत्री के समतुल्य दर्जा व सुविधाएँ प्राप्त होती हैं। भारतीय लोकसभा में स्पीकर श्री मावलंकर ने यह निर्णय दिया था कि विपक्ष के रूप में उसी दल या दल-समूह को मान्यता दी जाएगी जिसके सदस्यों की संख्या पूरे सदन की संख्या के कम से कम 1/10 भाग के बराबर हो।

Red Square

लाल चौक सोवियत संघ की राजधानी मास्को का प्रसिद्ध ऐतिहासिक चौक जहाँ क्रेमलिन सहित सोवियत सरकार के सभी कार्यालय स्थित है और जहाँ मृत लेनिन का शरीर ताबूत में सुरक्षित रखा गया है। इस चौक में प्रायः ऐतिहासिक अवसरों पर शीर्ष सोवियत नेताओं के सन्मुख सैनिक व असैनिक परेड और रैलियाँ आयोजित की जाती हैं जैसे कि मई दिवस तथा अक्तूबर क्रांति दिवस के समारोह।

Referendum

परिपृच्छा, मतसंग्रह किसी विधेयक अथवा संवैधानिक या सार्वजनिक महत्व के प्रश्न पर सर्वसाधारण की विधिवत् राय जानने की प्रक्रिया। कुछ देशों में संवैधानिक संशोधनों पर अनिवार्य रूप से मतसंग्रह कराना आवश्यक होता है परंतु साधारण विधेयकों पर एक निर्धारित अवधि के भीतर निर्धारित जनसंख्या की माँग पर ही मतसंग्रह कराया जाता है, अन्यथा नहीं। मतसंग्रह प्रत्यक्ष लोकतंत्र का एक अभिकरण माना जाता है।

Reform Act

सुधार क़ानून उन्नीसवीं शताब्दी में ब्रिटेन में कॉमनसभा को जनप्रतिनिधिमूलक बनाने के लिए एवं मताधिकार का प्रसार करने के लिए तीन क़ानून क्रमशः 1832, 1867 और 1884 में पारित किए गए। इनका उद्देश्य अधिकाधिक नागरिकों को मताधिकार प्रदान करना था। 1884 के क़ानून के उपरांत सभी वयस्क पुरुषों को मताधिकार प्राप्त हो गया। ये तीनों क़ानून ब्रिटिश संवैधानिक इतिहास में सुधार क़ानूनों के नाम से विख्यात हैं।

Reformation

सुधार आंदोलन, धर्म सुधार पंद्रहवीं शताब्दी में रोमन कैथोलिक चर्च में व्याप्त बुराइयों एवं अनाचार के विरुद्ध जर्मनी से प्रारंभ हुआ आंदोलन जिसका लक्ष्य ईसाई धर्म में सुधार लाना था। इसका श्रीगणेश बूर्तबर्ग के गिरजे के बाहर दीवार पर चिपकाई गई मार्टिन लूथर नामक पादरी की 22 अभिधारणाओं से हुआ। इनमें पोप, पादरियों एवं चर्च की कार्यप्रणाली में सुधार लाने की माँग प्रचारित की गई थी। लूथर द्वारा प्रारंभ किया गया यह आंदोलन पूरे यूरोप में प्रोटेस्टेन्ट आंदोलन के नाम से फैल गया। स्कॉटलैंड में काल्विन और स्विटजरलैंड में ज्विंगले ने इसका नेतृत्व किया। इस आंदोलन से कैथोलिक चर्च की नींव हिल गई और लगभग सभी यूरोपीय देशों में ईसाई धर्मावलंबियों में विभाजन हो गया। इस आंदोलन के फलस्वरूप पोप की तानाशाही समाप्त हो गई और ईसाई धर्म में फैली कुरीतियों के प्रति जनजागरण आरंभ हुआ।

Reformative theory of punishment

दंड का सुधारात्मक सिद्धांत यह दंड के तीन सिद्धांतों में से एक है। अन्य दो हैं- प्रतिशोधात्मक तथा निवारक सिद्धांत। सुधारात्मक सिद्धांत के अनुसार दंड का उद्देश्य न तो प्रतिशोध होना चाहिए और न भय उत्पन्न करना बल्कि अपराधी का सुधार करना होना चाहिए ताकि दंड की समाप्ति होने पर वह उपयोगी नागरिक बन सके। इस उद्देश्य से कारावास की अवधि में उसके मानसिक परिष्कार तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण की व्यवस्था पर ध्यान दिया जाना जाहिए। इस प्रकार के अनेक प्रयोग, यहाँ तक कि खुली जेलों का प्रयोग, भारत सहित अनेक देशों में हो रहे हैं।
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