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Braj Bhasha Soor-Kosh (Vol-X)

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सोयो, सोयौ
निद्रा ली, शयन किया।
क्रि.अ.
(हिं. सोना)
उ.- (क) संकर कौ मन हरथौ कामिनी, सेज छाँड़ि भू सोयौ-१-४३। (ख) सूरदास जो चरन सरन रहथौ, सो जन निपट नींद भरि सोयौ-१-५४।

सोर
हल्ला, कोलाहल।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. शोर)
उ.- (क) होत जय-जय सोर-१-२५३। (ख) चहुँ दिसि सूर सोर करि घावै-९-१०४। (ग) कटक सोर अति घोर-९-११५। (घ) लंक मैं सोर परथौ-९-१३९।
मुहा.- सोर पारना-ललकारना। सोर पारि-ललकारकर, चुनौती देकर। उ.-सोर पारि हरि सुबलहिं धाए, गहथौ श्रीदामा जाइ-१०-२४०।

सोर
पुकार, आर्तनाद।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. शोर)
उ.- रोर कैं जोर सैं सोर घरनी कियौ, चल्यौ द्विज द्वारिका द्वार ठाढ़ौ-१-५।

सोर
घोर शब्द।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. शोर)
उ.-झहरात गहरात दवानल आयौ। घेरि चहुं ओर करि सोर अंदोर बन धरनि आकास चहुं पास छायी-५९६।

सोर
नाम, प्रसिद्धि, ख्याति।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. शोर)

सोर
जड़, मूल।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शटा, प्रा. सड़)

सोर
टेढ़ीचाल, वक्र गति।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोरटठ, सोरठ
गुजरात और दक्षिण काठियावाड़ का प्राचीन नाम।
संज्ञा
पुं.
(सं. सौराष्ट, हिं. सोरठ)

सोरटठ, सोरठ
उस देश की राजधानी सूरत।
संज्ञा
पुं.
(सं. सौराष्ट, हिं. सोरठ)

सोरटठ, सोरठ
एक राग।
संज्ञा
स्‍त्री. पुं.


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