युद्ध - स्थिति, युद्ध - अवस्था
राज्यों द्वारा एक दूसरे के विरूद्ध सशस्त्र सैनिक बल प्रयोग की स्थिति । यह आवश्यक नहीं है कि युद्धरत राज्य वास्तव में एक दूसेर के विरूद्ध सशस्त्र कार्रवाई में भाग लें । युद्धावस्था का यह अनिवार्य तत्व है कि संबंधित राज्यों के पारस्परिक संबंधों में शांतिकालीन अंतर्राष्ट्रीय विधि के नियम निलंबित हो जाते हैं और उनका स्थान युद्ध विधि के नियम ले लेते हैं । इसके अतिरिक्त युद्धरत राज्यों और अन्य राज्यों के पारस्परिक संबंधों मे तटस्थता के नियम लागू होने लागते हं । संक्षेप में, कहा जा सकता है कि युद्धावस्था वह स्थिति है जिसमें युद्धकारियों के परस्पर संबंधों मे युद्धविधि के नियम और युद्धकारियों तथा ग़ैर - युद्धकारियों के परस्पर संबंधो में तटस्थता के नियम लागू होने लगते हैं ।
state responsibility
राज्य उत्तरदायित्व
परंपरागत अंतर्राष्ट्रीय विधि की यह मान्यता है कि किसी राज्य मे रहने वाले विदेशियों की जान और माल की सुरक्ष का दयित्व स्थानीय राज्य का है । उनको राज्य में रहने की अनुमति देने मे ही यह दायित्व निहित है । दूसरी ओर इन विदेशियों के मूल राज्य का दायित्व है इनके नागरिकों के सात न्याय वंचन होने की दशा मे इनको संरक्षण प्रदान करना । यह दायित्व इन नागरिकों की राज्य के प्रति निष्ठा से उत्पन्न होता है ।
राज्य में शांति और व्यवस्था बनाए रखना स्थानीय राज्य का परम कर्तव्य है । किसी स्थिति में व्यवस्था बनाए रखने में असफल होने के कारण यदि स्थानीय नागरिकों के साथ - साथ विदेशियों के जीवन और संपत्ति को हानि पहुँचती है तो राज्य का कोई उत्तरदायित्व नहीं बनता । राज्य का उत्तरदायित्व उस समय उत्पन्न होता है जब कोई खतरे की निश्चित आशंका विदेशियों के विषय मे हो और राज्य उनके रक्षार्थ आवश्यक और उचित उपाय न करे, अथवा आवश्यक उपाय करने के बावजूद विदेशियों के क्षतिग्रस्त होने पर अपराधियों को पकड़ने अथवा उनको दंड देने में आवश्यक तत्परता न दिखाए अथवा उनके साथ की गई न्यायिक कार्यवाही मात्र औपचारिकता हो और जिसमें न्याय मिलने की संभावना न हो आदि ।
उपर्युक्त परिस्थितियों में राज्य त्तरदयित्व उत्पन्न होता है . विदेशी नागरिक को संतोषजनक क्षतिपूर्ति अथवा तुष्टि न मिलने पर वह अपने राज्य से अपनी र से हस्तक्षेप करने का अनुरोध कर सकता है । अपने नागरिक की ओर से विदेशी राज्य द्वारा किए गए हस्तक्षेप को अंतर्राष्ट्रीय दावा कहते हैं । इस प्रकार राज्य उत्त्रदायित्व से अंतर्राष्ट्रीय दावे उत्पन्न होते हैं ।
state seccession
राज्य - उत्तराधिकार
जब किसी राज्य में प्रभुसत्ता का किसी कारणवश हस्तांतरण होता है तब उस स्थिति को राज्य - उत्ताराधिकार की स्थिति कहा जाता है । इससे तात्पर्य यह है कि पूर्वगामी राज्य का वैधिक व्यक्तित्व समाप्त हो जाता है और उसके अंतर्राष्ट्रीय अधिकार और कर्तव्य नवीन राजनीतिक इकाई, जिसे उत्राधिकारी राज्य कहा जाता है, को प्राप्त हो जाते हैं । मूलतः इन अधिकारों और कर्तव्यों के विष्य निम्मलिखित हैं :
अंतर्राष्ट्य संधियाँ और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की सदस्यता, ऋण, सार्वजनिक संपत्ति, वैयक्तिक अधिकार, ठेके, रियायतें, दुष्कर्म आदि ।
state territory
राज्य - प्रदेश
राज्य के चार तत्वों में से एक तत्व प्रदेश है । राज्य एक प्रादेशिक इकाई है । राज्य के प्रदेश के तीन संघटक होते हैं: 1. भूमि - प्रदेश, 2. समुद्री - प्रदेश, 3. वायु - प्रदेश ।
राज्य की संप्रभुता इन तीनों प्रदेशों में एख समान लागू होती है । अंतर केवल इतना है कि राज्य के भूभागीय समुद्र से विदेशी जहाजों को निर्दोष गमन का अधइकारि होता है , परंतु वायु और भू - प्रदेश से विदेशियों को पारगमन का अधिकार नहीं होता ।
statue
संविधि
इस शब्द का तीन अर्थों मे प्रयोग होता हैछ :-
1. अंतर्राष्ट्रीय विधि की शब्दावली में संविधि पद का प्रयोग संधि के पर्यायवाची के रूप में का जा सकता है ।
2. किसी अंतर्राष्ट्रीय संगठन की संरचना तथा उसके कार्य संचालन के आधारभूत नियमों का संग्रह जैसे अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय की संविधि (1945) ।
3. किसी भी संधि अथवा अभइसमय के कार्य संपादन ह तु संलग्न नियमों और विनियमों का संग्रह ।
statue of westminster
वेस्टमिंस्टर संविधि
नवंबर 1931 में पारित इस विधि के अंतर्गत ब्रिटिश साम्राज्य के उन राज्यों को जो अधिक विकसित थे (कनाडा, आस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैड, दक्षिण अफ्रीका), पूर्ण स्वायत्तता देने का प्रावधान किया गया जिसका परिणाम यह हुआ कि ये राज्य, जिन्हें अब डोमीनियन कहा जाने लगा, अलग अंतर्राष्ट्र्य व्यक्ति हो गए और इन्हें अन्य राज्यों से संधियाँ करने और उनके साथ दौत्य संबंध स्थापित करने के स्वतंत्र अधिकार प्राप्त हो गए । इस प्रकार ब्रिटिश साम्राज्य मे ब्रिटिश सम्राट को अपना संवैधानिक प्रमुख मानते हे भी डोमीनियन स्थिति प्राप्त राज्यों की वैधिक स्थिति स्वतंत्र राज्यों के समान हो गई ।
इस प्रकार ब्रिटिश राष्ट्रमंडल का उदय हुआ ।
Stimson doctrine of nonrecognition
अमान्यता विषयक स्टिमसन सिद्धांत
संयुक्त राज्य अमेरिका के विदेश मंत्री श्री स्टिमसन के मतानुसार ऐसी किसी स्थिति,संधि या प्रदेश प्राप्ति को मान्यता न दी जाए जो बल प्रयोग का परिणाम हो । यह सिद्धांत उन्होंने तब प्रतिपादित किया जब जापान ने जून 1931 में चीन के प्रांत मंचूरिया पर आक्रमण किया । उन्होंने कहा कि अमेरका पेरिस संधि (1928) का उल्लंघन करने वाले किसी समझौते,संधि अथवा स्थिति को मान्यता प्रदान नहीं करेगा क्योंकि उक्त संधि पर सं. रा. अमेरिका, चीन और जापान के हस्ताक्षर हैं । लीग ऑफ नेशन्स ने एक प्रस्ताव में स्टिमसन सिद्धांत को स्वीकार करते हुए काह कि लीग के सदस्यों का यह कर्तव्य है कि वे किसी ऐसी स्थिति, संधि या समझौते को मान्यता न दें जो लीग के अथवा पेरिससंधि के खिलाफ हो । आज भी महाशक्तियाँ यह स्वीकार करती हैं कि संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर को भंग करने वाली किसी व्यवस्था को मान्यता प्रदान न की जैँ ।
straits
जलडमरूमध्य
दे. International straits.
structure of treaty
संधि संरचना
आधुनिक संधियों की बनावट इस प्रकार की होती है :-
(1) प्रस्तावना - इसमें संधिकर्ता राज्यों के अध्यक्षों या सरकारों का नामोल्लेख, संधि के प्रयोजन और पक्षकारों द्वारा संधि संपन्न करने के संकल्प का वर्न होता है ।
(2) संधि की मुख्य धाराएँ या व्यवस्थाएँ ।
(3) औपचारिक या प्रक्रियात्मक धाराएँ - जिनमें संधि के लागू होने की तिथि, उसकी संपुष्टि की प्रक्रिया, उसकी अवधि, उसकी भाषा, रजिस्ट्री विवादों का निपटान, संशोधन तथा समीक्षा आदि औपचारिक विषयों का वर्णन होता है ।
(4) पूर्णाधिकारियों के हस्ताक्षर, हस्ताक्षर की तारीख तथा स्थान का उल्लेख ।
subjective territoriality principle
कर्मगत प्रादेशीयता सिद्धांत
इस सिद्धांत के अनुसार जब कोई अपराध करने वाला व्यक्ति एक राज्य में हो और सके कर्म का प्रभाव दूसरे राज्य में पड़ता हो तो दूसरे राज्य को पहले राज्य के अपराध करने वाले व्यक्त को देंडित करने का अधिकार है । उदाहरणतः दो राज्यों के सीमांत भूभाग में एक व्यक्ति एक राज्य की सीमा के भीतर से दूसरे राज्य की सीमा के अंदर खड़े व्यक्ति को गोली का निशआना बनाता है तो गोली के अपराध का प्रभाव पड़ने वाले राज्य को (दूसरे राज्य को) पहले राज्य वाले अपराधी को दंड देने का अधिकार है । इस अधिकार (क्षेत्राधिकार) का आधार अपराध से उत्पन्न परिणाम है । जाली सिक्के बनाने तथा मादक द्रव्यों के निर्माण एवं यापार मे लगे अपराधियों को उस स्थिति में जबकि अपराध विदेशी स्थल से हो रहा हो दंडित करने के लिए प्रायः क्षेत्राधिकार के इसी सिद्धांत का सहारा लिया जाता है ।