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Braj Bhasha Soor-Kosh (Vol-X)

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सोभात
फबता या सोहता है।
क्रि.स.
(हिं. शोभाना)
उ.- (क) गत पतंग राका ससि बिष संग घटा सघन सोभात -२१८५। (ख) नैन दोऊ ब्रह्म से परम सोभात से-२६१७।

सोभाना, सोभानो
शोभा देना।
क्रि.स.
(सं. शोभन)

सोभायमान
शोभा बढ़ाने या देनेवाला, सुंदर।
वि.
(सं. शोभायमान)

सोभार
जिसमें उभार हो, उभरा हुआ, उभारदार।
वि.
(सं. स + हिं. उभार)

सोभार
उभार के साथ, उभरकर।
क्रि. वि.

सोभावै
सोहती, फबती या शोभित होती है।
क्रि.अ.
(हिं. शोभना)
उ.- कर सिर-तर करि स्याम मनोहर अलक अधिक सोभावै-१०-६५।

सोभित
सुंदर।
वि.
(सं. शोभित)

सोभित
शोभा देने या बढ़ानेवाला।
वि.
(सं. शोभित)

सोभित
फबता या सुंदर लगता हुआ।
वि.
(सं. शोभित)
उ.- (क) छाता लों छाँह किए सोभित हरि छाती-१-२३। (ख) उर सोभित भृगु रेख-१०-४। (ग) सोभित सीस लाल चौतनियाँ -१०-१०६। (घ) मानौ गज-मुक्ता मरकत पर सोभित सुभंग साँवरे गात -१०-१५९। (ङ) सोभित अति कुंडल की डोलनि-६३९।

सोम
एक लता जिसका रस पीले रंग का और मादक होता था। यह रस वदिक ऋषिपान किया करते थे।
संज्ञा
पुं.
(सं.)


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