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Braj Bhasha Soor-Kosh (Vol-X)

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सोभन
सौंदर्य।
संज्ञा
पुं.

सोभना, सोभनो
सोहना, शोभित होना।
क्रि.अ.
(सं. शोभन)

सोभर
स्थान जहाँ स्त्रियाँ प्रसव करती है।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोभा या शुभ + गृह ?)

सोभांजन
सहिंजन' वृक्ष जिसमें लंबी फलियाँ लगती हैं।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोभांजन)

सोभा
चमक, कांति, दीप्ति।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शोभा)

सोभा
छटा, सुंदरता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शोभा)
उ.- (क) मृग मूसी नैननि की सोभा जाति न गुप्त करी-९-६३। (ख) स्याम उलटे परे देखे, बढ़ी सोभा-लहरि-१०-६७। (ग) सोभा मेरे स्यामहिं पर सोहै-१०-१५८। (घ) तदपि सूर तरि सकीं न सोभा, रहीं प्रेम पचि हारि-६२८।

सोभा
सजावट।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शोभा)
उ.- बरनौं कहा सदन की सोभा बैकुंठहूँ तैं राजै री-१०-१३९।

सोभा
किसी की सुंदरता बढ़ानेवाली कोई वस्तु, बात या विशेषता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शोभा)
उ.- कुबिजा भई स्याम-रँग राती तातैं सोभा पाई-१-६३।

सोभा
मान-सम्मान, आदर।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शोभा)
उ.- (क) गनिकासुत सोभा नहिं पावत जाके कुल कोऊ न पिता री-१-३४। (ख) पति कौं ब्रत जो धरै तिय, सो सोभा पावै-२-९।

सोभाकारि, सोभाकारी
शोभा बढ़ाने या देनेवाला, सुंदर।
वि.
(सं. शोभाकर)
उ.- (क) तिलक ललित ललाट केसरि-बिंदु सोभाकारि-१०-१६९। (ख) केहरी-नख उर पर रुरै सुठि सोभाकारि-१०-१३४।


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