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Definitional Dictionary of International Law (English-Hindi)
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revision of treaty
संधि पुनरीक्षण वास्तव में संधि पुनरीक्षण और संशोधन में भेद करना सरल नहीं है । संधि के पुनरीक्षण से अभिप्राय उसकी समग्र व्वस्था का परीक्षण करना ह ता है ताकि परिवर्तित परिस्थितियों के कारण यदि संदि में आमूल - चूल परिवर्तनों की आवश्यकता हो तो ऐसे परिवर्तन करलिए जाएँ । निश्चय ही इस कार्य मे सभी मूल हस्ताक्षरकर्त्ता राज्यों की सहमति आवश्यक है । एक बात और है कि संधि के पुनरीक्षण की अवधारणा वस्तुः एक राजनीतिक अवधारणा है जिसका उद्देश्य संधि को परिवर्तनशील परिस्थितियों में अधिक न्यायासंगत एवं तर्कसंगत बनाना होता है । संधि के पुनरीक्षण की व्यवस्था का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण संयुक्त राष्ट्र का चार्टर है । चार्टर मे यह प्रावधान किया गया है कि महासभा स्वयं 10 वर्ष बीतने पर अथवा निर्धारित संख्या मे सदस्य राज्यों की माँग पर चार्टर के पुनरीक्षण हेतु एक अंतर्राष्टीय सम्मेलन का आयोजन कर सकती है ।

right of expropriation
स्वामित्वहरण का अधिकार, विसंपत्तिकरण अधिकार राज्य का वह अधिकार जिसके अंतर्गत वह विदेशी स्वामित्व वाली संपत्ति को हस्तगत कर उसे अपने स्वामित्व में ले सकता है । ऐसा केवल राष्ट्रीय हित में ही किया जा सकता है और अंतर्राष्ट्रीय विधि के अनुसार इसके ले उसेक मूल स्वामी को उचित मुआवजा दिया जाना चाहिए ।

right of legation
दूत - प्रेषण का अधिकार, दूत - विनिमय का अधिकार राज्यों द्वारा पारस्परिक संबंध स्थापित कनरे के उद्देश्य से एक - दूसरे के यहाँ अपने राजनयिक प्रतिनिधि प्रत्यायित करना । परंपरा से यह अधिकार होली - सी को भी दिया जाता रहा है । परंतु इसकेलिए संबंधित राज्यों की पूर्व सहमति आवश्यक है । अतः राजनयिक प्रतिनिधियों का प्रेषण एक ऐसा अधिकार है जिसका प्रयोग संबंधित राज्यों की पूर्व सहमति पर आश्रित है ।

right of passage
मार्गाधिकार किसी राज्य का किसी दूसरे राज्य के भूमि - प्रदेश से होकर आवागमन का अधिकार जिसमें उसकी सेवाओं के आवागमन का अधिकार भी शामिल है । बहुधा ऐसा साम्राज्यवादकालीन द्विपक्षीय संधियों के अंतर्गत हुआ है । वस्तुतः इसे निर्बल राज्य द्वारा सशस्त राज्य को विवशतापूर्वक दिया गया सुविधा - भार माना जाना चाहिए । अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत एक मामले में यह प्रश्न उठा कि क्या भारत में स्थित अपने अंतस्थ क्षेत्रों (एनक्लेव) दादरा - नगर हवेली में विद्रोह का दमन करने के लिए पुर्तगाली सेना वहाँ तक पहुँचना के लिए भारत से मार्गाधिकार की माँग कर सकती है । न्यायालय का निर्णय था कि पुर्तगाल को भारत से होकर अपने अंतस्थ क्षओत्रों में सेनाएँ भेजने का कोई वैधिक आधार नहीं है । वर्तमान काल में परस्पर सहयोग स्वरूप दो या अधिक राज्य स्वेच्छा से परस्पर संधि करके एक - दूसरे को अपने भूमि - प्रदेश से होकर जाने की अनुमति दे सकते हैं । जैसे भारत ने नेपाल को व्यापार और नौपरिवहन की सुविधा देने के लिए आवागमन की सुविधा दी है ।

right of self defence
आत्म - रक्षा का अधिकार परंपरागत अंतर्राष्ट्रीय विधि और संयुक्त राष्ट्र संघ का चार्टर दोनों ही यह स्वीकार करते हैं कि कोई राज्य आत्म - रक्षार्त बलप्रयोग कर सकता है । यह उल्लेखनीय है कि आत्म - रक्षा का अर्त आत्म - संरक्षण नहीं है और न ही आत्म - रक्षा का अर्थ कानून अपने हाथ में लेना है । आत्म - रक्षा के अधिकार की व्याख्या अंतर्राष्ट्रीय विधि मे बहुत संकुचित अर्थों में की गई है । इसका निरूपण सन् 1837 में `केरोलीन` के मामले में अमेरिकी विदेश मंत्री डेनियल वेब्स्टर ने किया था । उनके अनुसार आत्मा - रक्षा मे की गई कार्रवाई उसी अवस्था मे वैध मानी जा सकती है जबकि उसकी अत्याधिक एवं अविलंब आवश्यकता हो, अन्य कोई उपाय उपलब्ध न हो और सोच - विचार का समय न हो । दूसरे, आत्म - रक्षा मे की गई कार्रवाई अनुचित तथा आवश्यकता से अधिक न हो । दूबसरे महायुद्ध के उपरांत न्यूरेम्बर्ग न्यायाधिकरण ने भी आत्म - रक्षा की इस व्याख्या का अनुमोदन किया था ।

right of self - determination
आत्म - निर्णय का अधिकार इसका अर्थ किसी सुनिश्चित राष्ट्रीय समूह का अपनी राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक व्यवस्था को निर्धारित करने का अधिकार है । ऐतिहासिक दृष्टि से इस अधिकार की चर्चा उपनिवेशवाद के संदर्भ में प्रारंभ हुई और विशेष रूप से उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तारार्ध मे यह माँग की जाने लगी कि विशाल साम्राज्यों (जैसे ऑस्ट्रिया - हंगरी तथा ऑटोमन साम्राज्यों) मे रहने वाले राष्ट्रीय समूहों को स्वतंत्रता अथवा स्वाधीनता का अधिकार मिलना चाहिए । प्रथम महायुद्ध के पश्चात् उपनिवेशों की स्वतंत्रता की माँग उनके आत्म - निर्णय करने के अधिकार के आधार पर की जाने लगी । संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर ने यह स्वीकार किया कि विदेशई राजनीतिक प्रभुसत्ता के अधीन रहने वाले लोगों को अपनी राजनीतिक व्यसवस्था और शासन प्रणाली का स्वतंत्र रूप से चयन करने का अधिकार है और इस प्रकार संस्रा में उपनिवेशवाद का पतन प्रारंभ हुआ । वर्तमान काल मे आत्म - निर्णय के अधिकार को लेकर एक विवाद यह उत्पन्न हुआ है कि इस अधिकार की सीमा क्या हो? यह निर्विवाद है कि प्रत्येक राष्ट्र को स्वतंत्र होने का अधिकार है परंतु प्रश्न यह उठता है कि क्या किसी राष्ट्र के विभिन्न प्रजातीय, धार्मिक अथवा क्षेत्रीय संघटकों को भी आत्म - निर्णय का अधिकार होना चाहिए ?

right of self preservation
आत्म - परिरक्षण अधिकार आत्म - परिरक्षण से तात्पर्य है कि किसी राज्य द्वारा अपने अधिकारों, हितों और उन पर आधारित नीतियों पर हुए किसी भी वास्तविक अथवा संभावित प्रहार का सामना करने के उद्देश्य से किए गए उपाय । ओपेनहायम ने आत्म - परिरक्षण और आत्म - रक्षा के अधिकार मे कोई भेद नहीं किया है । परंतु वर्तमान लेखक, जिनमें ब्रायरले प्रमुख हैं, इस बात पर ब ल देते हैं कि आत्म - परिरक्षण और आत्म - रक्षा में भेद किया जाना चाहिए । ब्रायरले ने लिखा है कि आत्म - परिरक्षण कोई अधिकार नहीं हैं । यह केवल एक भावना है । वास्तव में आत्म - परिरक्षण को वैधिक रूप से सीमित नहीं किया जा सकता । मीमित रूप में आत्म - परिरक्षण को आत्म - रक्षा का अधिकीर कहा गया है । आत्म - रक्षा के अधिकार की सीमाओं का उल्लेख केरोलीन (1837) जलपोत के विवाद के संदर्भ में अमेरिकी विदेशमंत्री नियल वेब्सटर ने किया था और इस सीमित रूप में आत्म - रक्षा के अधिकार को सर्वथा मान्यता दी जाती है । अतः यह कहा जा सकता है कि अंतर्राअट्रीय विधि आत्म - रक्षा के अधिकार क मान्यता देती है, आत्म - परिऱक्षण की भावना को नहिं ।

right of visit, search and capture
निरीक्षण, तलाशी एवं प्रग्रहण का अधिकार युद्ध के दौरान महासमुद्र में तटस्थ जलपोतों को रोक कर उनके निरीक्षण का अधिकार युदधकारियों को होता है । यदि निरीक्षण मात्र से संतुष्टि न हो तो जलपोत की तलाशी ली जा सकती है और विनिषिद्ध सामग्री पाए जाने पर उसका तुरंत प्रग्रहण करके जलपोत को अंतिम निर्णय के लिए निकटस्थ नौजित माल न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जात है । निरीक्षण तलाशी और प्रग्रहण अंतर्राष्ट्रीय विधि के अंतर्गत युद्धकारियों के सुस्थापित अधिकार हैं ।

rights and duties of states
राज्यों के अधिकार और कर्तव्य परंपरागत अंतर्राष्ट्रीय विधि में राज्यों के कुछ मूलभूत अधिकारों और कर्तव्यों को मान्यता दी गई है । कालांतर में इनको औपचारिक रूप से निरूपित करने का प्रयास किया गया । इस दिशआ मे सन् 1933 का मांटेविडो अभिसमय प्रथम प्रयास था । इसके उपरांत सन् 1949 में अंतर्राष्ट्रीय विधि आयोग ने राज्यों के अधिकार और कर्तव्यों संबंधी एक घोषणा - पत्र का प्रारूप तैयार किया । इस प्रारूप मे जिन मूल अधिकारों को शामिल किया गया है वे इस प्रकार हैं स्वतंत्रता प्रादेशिक क्षेत्राधिकार, कानूनी समानता और सशस्त्र आक्रमण के विरूद्ध आत्मरक्षा का अधिकार । कर्तव्यों में निम्न का उल्लेख किया गाय है दूसरों के राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप न करना, अन्य राज्यों के आंतरिक संघर्ष को प्रोत्साहित न करना, मानव अधिकारों का पालन करना, विवोदों के शांतिपूर्ण समादान के लिए तत्पर रहना, राष्ट्रीय नीति के अबिकरण के रूप में युद्ध का आश्रय न लेना और अनपे संधिगत दायित्वों का निष्ठापूर्वक पालन करना ।

right to equality
समानता का अधिकार यह राज्य के मूल अधिकारों मे से एक है । सन् 1933 के मांटेविडो अभइसमय र सन् 1949 के संयुक्त राष्टर संघ के एक घोषणा - पत्र मे भी समानता के अधिकार को राज्यों का एक मूल अधिकार माना गया है । अंतर्राष्ट्रीय विधि में समानता का अर्थ है कानूनी समानता या क़ानून के समक्ष समानता । इसका आधार संप्रभुता है । चूँकि संप्रभुता राज्य का सामान्य, गुण है, अतः प्रत्येक राज्य को एक - दूसरे के समान समझा जाता है । समानता का एक प्रमाण यह है कि सभी देशों के राज्याध्यक्ष एक - दूसरे के यहाँ जाने पर समान रूप से स्थानीय क्षेत्राधिकार से उन्मुक्त माने जाते हैं - चाहे वे अन्य किसी भी दृष्टि से समान न हों । समानता के अधिकार का सम्मान करते हुए सभी छोटे - बड़े, शक्तिशाली शक्तिहीन, धनी - निर्धान राज्यों को राष्ट्र संघ की सभा में और संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा मे समान प्रतिनिधित्व देना स्वीकार काय गया था ।


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