उ.- सूरदास सोने कैं पानी मढ़ै चोंच अरु पाँखि-९-१६४।
सोने
सोने या स्वर्ण से।
संज्ञा
पुं.
सवि,(हिं. सोना)
सोने
ताँबे रुपे सोने सजि राखीं वै बनाइ कै-२६२८।
प्र.
मुहा.- सोने का घर मिटटी करना- बहुत अधिक धन-सम्पत्ति नष्ट कर देना। सोने का घर मिटटी होना- अत्यन्त धन-धान्य पूर्ण घर या परिवार का वैभव नष्ट हो जाना।सोने में घुन लगना-अनहोनी या असंभव बात होना। सोने में सुगंध (होना)-किसी बहुत अच्छी चीज में (कारण-विशेष से ) और भी गुण या विशेषता आ जाना।
सोने
वह चीज जो देखने में तो बहुत सुन्दर और आकर्षक हो, परन्तु वस्तुतः हानिकारिणी और घातक हो।