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Braj Bhasha Soor-Kosh (Vol-X)

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सोनी
सुनार, स्वर्णकार।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोना)

सोनी
एक वृक्ष।
संज्ञा
पुं.
(देश.)

सोने
स्वर्ण के।
संज्ञा
पुं.
सवि,(हिं. सोना)
उ.- सूरदास सोने कैं पानी मढ़ै चोंच अरु पाँखि-९-१६४।

सोने
सोने या स्वर्ण से।
संज्ञा
पुं.
सवि,(हिं. सोना)

सोने
ताँबे रुपे सोने सजि राखीं वै बनाइ कै-२६२८।
प्र.
मुहा.- सोने का घर मिटटी करना- बहुत अधिक धन-सम्पत्ति नष्ट कर देना। सोने का घर मिटटी होना- अत्यन्त धन-धान्य पूर्ण घर या परिवार का वैभव नष्ट हो जाना।सोने में घुन लगना-अनहोनी या असंभव बात होना। सोने में सुगंध (होना)-किसी बहुत अच्छी चीज में (कारण-विशेष से ) और भी गुण या विशेषता आ जाना।

सोने
वह चीज जो देखने में तो बहुत सुन्दर और आकर्षक हो, परन्तु वस्‍तुतः हानिकारिणी और घातक हो।
पद.

सोनैं
सोने य़ा स्वर्ण से।
संज्ञा
पुं.
सवि (हिं. सोना)
उ.- खुर ताँबैं, रूपैं पीठि, सोनैं सींग मढ़ी-१०-२४।

सोनो
सोना, स्वर्ण।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोना)

सोपत
सुबीता, सुपास।
संज्ञा
पुं.
(सं. सूपपत्ति)

सोपान
जीना, सीढ़ी।
संज्ञा
पुं.
(सं.)


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