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Definitional Dictionary of International Law (English-Hindi)
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reprisals
प्रत्याघात, प्रतिशोध इस अंतर्राष्ट्रीय विवादों के समाधान के बलकारी उपायों में से एक उपाय माना जाता है । प्रतिशोध का अर्थ है ऐसे हानिकारक अथवा अवैध कार्य जो एक राज्य द्वारा दूसरे राज्य के इन्हीं अथा इसी प्रकार के कार्यों के प्रत्युत्त्र में उस राज्य के विरूद्ध किए जाएँ । ये क र्य अंतर्राष्ट्रीय विधि के विरूद्ध होते हुए भी निम्न दशआओं में वैध माने जाते हैं :- 1. यदि ये किसी राज्य द्वारा अपने प्रति किसी दूसरे राज्य द्वारा किए ए अवेध कार्यों के लिए क्षतिपूर्ति की माँग की गई हो जो निष्फल रही हो 3. यह कार्रवी मानवता और सद्भाव के नियमों की परिधि में रह कर ही की जानी चाहिए और 4. प्रतिशोध मे की गई कार्रवाई अपचार के अनुपात में होनी चाहिए और उपचार माप्त होते और क्षतिपूर्ति मिलते ही इसे समाप्त कर दिया जाना चाहिए । चूँकि वर्तमान काल मे बल - प्रयोग और उसकी धमकी दोनों वर्जित ह अतः प्रतिशोध की वैधता वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय विधि के संदर्भ में संदेहजनक है ।

res communis
सामुदायिक संपदा वह संपत्ति, संपदा अथवा संसाधन जिस पर किसी एक राष्ट्र का अधइकार न हो और न ही कोई एक राष्ट्र अपनी संप्रभुता अथवा अधइकार का प्रसार उस पर कर सके क्योंकि वे प रे विशअव समुदाय की संपदा अथवा धरोहर माने जाते हैं । इसका उपयोग सभी राष्ट्र समान आधार पर कर सकते हैं तथा कोई एक राष्ट्र उसका स्वामित्वहरण नहीं कर सकता । सामुदायिक संपदा के उदाहरम हैं राष्ट्रीय क्षेत्राधिकार से परे महासमुद्र, अंतरिक्ष, चंद्रमा आदि ।

reservations to treaties
संधियों के अपवाद इसका अर्थ है किसी राज्य द्वारा संधि से बाध्य होने से पूर्ण यह स्पष्ट कर देना कि वह संधि की किसी विशिष्ट धारा को अपने लिए बाध्यकारी नहीं मानेगा अथवा वह संधि के किसी वाक्य या वाक्यांश अथवा प्रयुक्त शब्द को किसी विशिष्ट अर्थ में ही स्वीकार करेगा । ऐसी दशआ में उस राज्य के लिए संधि उसके द्वारा निर्दिष्ट अपवादों सहित ही लागू होगी । परंतु यह आवश्यक है कि संधि के अन्य हस्ताक्षरकर्ता राज्य किसी हस्ताक्षरकर्ता राज्य द्वारा प्रसुत्त अपवादों को स्वीकार करें । अपवादों की सूचना संधि के लिए वार्तालाप के दौरान अथा उस पर हस्ताक्षर करते समय अथवा उसकी संपुष्टि करते समय किसी भी अवस्था में दी जा सकत है । परंतु प्रत्येक दशा में यह आवश्यक है कि अन्य हस्ताक्षरकर्ता राज्य इन अपवादों से सहमत हों । बहुधा पारस्परिकता के आधार पर अन्य हस्ताक्षरकर्ता राज्य इन अपवादों को मानने के लिए सहमत हो जाते हैं । अपवाद ऐसे होने चाहिए जो संधि के मूल सिद्धआंत अथवा लक्ष्य के प्रतिकूल न हों । वर्तमान काल में की गई अनेक संधियों में संधि में ही उन धाराओं का उल्लेख कर दिए जाने का दृष्टांत पाया जाता है जिनके विरूद्ध कोई हस्ताक्षरकर्ता राज्य अपवाद प्रेषित नहीं कर सकता । द्विपक्षीय संधीयों में अपवादों से कोई विशेष समस्या उत्पन्न नहीं होती परंतु बहुपक्षीय संधियों में कुछ राज्यों के अपवादों से जिन्हें अन्य राज्यों में से कुछ स्वीकार करते हों और कुछ नहीं तो संधि के प्रभावक्षेत्र के विषय में अनेक विवादि उत्पन्न हो सकते हैं ।

res extra commercium
स्वामित्व बाह्य वस्तु किसी व्यक्ति अथवा राज्य को उन वस्तुओं पर स्वामित्व का अधइकार प्रधान नीहं किया जा सकता जिनेहं प्रकृति ने सबके उपयोग के लिए प्रदान किया है । अंतराष्ट्रीय कानून भी इस स्थिति को स्वीकार करता है और इसलिए खुले समुद्र तथा बाह्य अंतरिक्ष पर वह किसी राज्य विशेष का स्वामित्व स्वीकार नही करता और उन्हें स्वामित्व की परिधि से बाहर रखता ह ।

res nullius
स्वामीहीन वस्तु, स्वामीहीन प्रदेश ऐसी वस्तु अथवा प्रदेश जिस पर पहले से किसी अन्य व्यक्ति अथवा राज्य का स्वामित्व अथवा अधfकार न हो । दीवानी कानून मेंलावारिस माल की जो स्थिति है अंतर्राषअटरीय कानून में स्वामीहीन प्रदेश की भी वही स्थिति होती है, इसलिए ऐसे प्रदेश की खोज करने वाले राज्य को उसमें प्रवेश कर अपनी सत्ता स्थापित करने का अधिकार होता है ।

responsibility of state
राज्य का दायित्व अंतर्राष्ट्रीय विधि के अनुसार किसी राज्य में रहने वाले विदेशी नागरिकों की जान - माल की सुरक्षा का दायित्व स्थानीय राज्य पर होता है । कीस विदेशी को शरीरिक क्षति पहुँचाए जाने पर या स्थानीय राज्य द्वारा उसके प्रति अन्याया किए जाने पर अथवा उसकी संपत्ति को हानि पहुँचने पर अथा उसके साथ न्याय न होने पर स्थानीय राज्य का कर्त्ताव्य है कि उसकी क्षतिपूर्ति करे । क्षतिपूर्ति न होने या न्याय न मिलने पर उस विदेशी को अपने राज्य से हस्तक्षेप की माँग करने का अधइकार है । ऐसी स्थिति में यह विवाद अंतर्राष्ट्रीय विवाद बन जाता है । इस विवाद का आधार है राज्य का अंतर्राष्ट्रीय दायित्व ।

restitution
प्रत्यास्थापन दे. Compensation.

restrictive theory of state immunity
सीमित राज्य उन्मुक्ति सिद्धांत अंतर्राष्ट्रीय विधि के अनुसार प्रत्येक र्जाय को विदेशी राज्य में स्थानीय क्षेत्राधिकार से उन्मुक्त माना जाता है । यह उन्मुक्ति राज्याध्याक्ष, राजदूत, सार्वजनिक जलपोत, युद्धपोत और राज्य की सेना को दी जाती है । वर्तमान काल में व्यापार और अनेक आर्तिक क्रियाओं पर राज्य का प्रत्यक्ष नियंत्रण हो जाने के कारम यह विवाद उत्पन्न हुआ है कि क्या राज्य की आर्थिक क्रियाओं और उनमें लगे निकायों जैसे जलपोतों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों को भी विदेशी राज्य में स्थआनीय क्षेत्राधिकार से उन्मुक्ति दी जाए यह अनुभव में आया है कि ऐसा करना स्थानीय व्यापार अथवा नागरिकों के साथ अन्यायपूर्ण है । अतः यह सिद्धआंत प्रतिपादित हुआ कि आर्थिक क्रियाओं के लिए राज्य को सार्वबौमिक उन्मुक्ति के निद्धांत की परिधि से बाहर समझा जाए । इसी सिद्धांत को सीमित राज्य उन्मुक्ति सिद्धआंत कहा जाता है ।

retorsion
प्रतिकर्म, प्रतिकार जब कोई राज्य कीस अन्य राज्य के विरूद्ध उसके अनुचित, हानिकारक अथा मनमाने परंतु अंतर्राष्ट्रीय विधि की दृष्टि से वैध कार्य के बदले उसी प्रकार की कार्यवाही करता है तो उसे प्रतिकार या प्रतिकर्म की संज्ञा दी जाती है । जिन कार्यों के लिए इस प्रकार के कार्य किए जा सकते हैं वे अंतर्राष्ट्रीय विधि की दृष्टि से अवैध नहीं होते परंतु दूसरे राज्य के लिए हानिकारक अवश्य होते हैं और वह उन्हें अपने विरूद्ध द्वेषपूर्म कार्य मानकर उसी प्रकार के कार्य कर सकता है । प्रताकर अथवा प्रतिक्रम में मुख्य बात यह है कि मूलरूप से किया गाय अपचार और उसके प्रतिकार स्वरूप किया गया कर्म दोनों विधि की परिधि में रहते हैं और यह गुण प्रतिकर्म और प्रतिशोध के मध्य मुक्य विभाजक रेखा कहा जा सकता है क्योंकि प्रतिशोध के रूप में किया गया कर्म और उसके प्रत्युत्तर मे की गई कार्वाई दोनों विधि -विरोधी होती हैं । प्रतिकर्म के कुछ उदाहरण इस प्रकार है । राजनयिक संबंध - विच्छेद कर देना, यापार और शुल्क संबंधी दी गई रियायतें निस्त करदेना, अपने आकाशवर्ती क्षेत्र से उसके वायुयानों की उड़ानों पर प्रतिबंध लगा देना आदि । चूँकि संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर के अंतर्गत बल - प्रयोग अथवा बल - प्रयोग की धमकी देना वर्जित है, अतः यह कहा जा सकता है कि दोनों ओर से प्रतिकर्मस्वरूप की गई कार्रवाई में बल - प्रपयोग अथा बल - प्रयोग की धमकी नहीं होनी चाहिए ।

retroactive recognition
पूर्व प्रभआवी मान्यता. पूर्वव्यापी मान्यता साधारणतया मान्यिता, विधिवत मान्यता, दिए जाने की तिथि से प्रभावी होती ह । परंतु कुछ परिस्थितियों में इसे भूत प्रभावी माना जा सकता है, अर्थात् यह उस दिन से प्रभावी मानी जाती है जिस दिन से कोई इकाई सरकार या राज्य के रूप में प्रतिष्ठित हुई है । जैसे भारत सरकार ने बंगलादेश को 3 दिसंबर 1971 को मान्यता देने की घोषणा की जो 10 अप्रैल 1971 से प्रबावी मानी गी जब स्वतंत्र बंगला देश की घोषणा की गई थी ।


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