युद्धबंदी
युद्ध की संक्रिया में शत्रु पक्ष की सेना तथा युद्ध संचालन से संबंधित अन्य व्यक्ति जो युद्धकारी द्वारा बंदी बना लिए जाए, युद्धबंदी कहलाते हैं ।
युद्धबंदियों के साथ बर्ताव किए जाने से संबंधित नियम सर्वप्रथम सन् 1899 के हेग भइसमय में अपनाए गे थे जिनका पुनरीक्षण सन् 1907 के दूसरे हेग सम्मेलन सन् 1929 के जेनेवा सम्मेलन और फिर सन् 1949 के जेनेवा सम्मेलन में किया गया था ।
सन् 1949 के जेनेवा अभइसमय में `युद्धबंदी कौन है` इसकी विस्तृत व्याख्या की गई ह । इसके अनुसार न केवल शत्रु पक्ष की सेना के सदस्य बल्कि सेना के साथ रहने वाले असैनिक कर्मी जैसे संवाददाता, ठेकेदार (मिक सेवक आदि भी शत्रु के हाथ में पड़ने पर युदधबंदी कहलाते हैं । इस अभिसमय में युद्धबंदियों के साथ व्यवहार किए जाने से संबंधित नियमों की विस्तृत व्याख्या की गई है । इन नियमों का सार यह है कि प्रत्येक दशा मे युद्धबंदियों के साथ मानवीय व्यवहार किया जाना चाहिए, उनके साथ कोई ऐसा अपचार नहीं किया जाना चाहिए जो उनके जीवन, स्वास्थ्य या सम्मान के लिए हानिकारक हो और न ही उनके विरूद्ध प्रतिशओधात्मक कार्य किए जाने चाहिए । उनके व्यक्तित्व और मान - मर्यादा का आदार किया जाना चाहिए और उनके खाने - पीने कपड़े और आवश्यक चिकित्सा का निःशुल्क प्रबंध बंदी बनाने वाले राज्य को करना चाहिए ।
privateering
जल दस्युता
दे. Piracy.
private internationa law (=conflict of laws)
वैयक्तित अंतर्राष्ट्रीय विधि, वैयक्तिक अंतर्राष्ट्रीय कानून
किसी राज्य में उत्पन्न ऐसे विवाद जिनका संबंध राज्यों से न होकर व्यक्तियों से हो और विवाद से संबंधित इन व्यक्तियों के राष्ट्रीय या राजनीतिक इकाइयों के कानूनों में भिन्नता पाई जाती हो । ऐसी स्थितियों में लागू होने वाले नियमों के समूह को `वैयक्तिक अंतर्राष्ट्रीय` विधि कहते हैं ।
prize
नौजित माल
समुद्री युद्ध में नौसैनिक बेड़े द्वारा हस्तगत की गई शत्रुसंपत्ति जैसे, जलपोत, युद्ध सामग्री तथा अन्य माल । तटस्थ जलपोतों से पकड़े गए विनिषिद्ध माल को भी नौजित माल कहते हैं । अब वायुयानों से पकड़े गए शत्रु माल को भी इसी श्रेणी में रखा जाता है ।
prize court
नौजित माल न्यायालय
ये विशेष न्यायालय होते हैं जिनकी स्थापना युद्ध - काल में की जाती है । इनका उद्देश्य नौसैनिक युदध में पकड़े गे तटस्थ जल - पोतों की गतिविधियों और उन पर लदे माल की वैधता निर्धारित करना होता है । वर्तमान काल में वायुयान और उन पर पाया जाने वाला माल भी इन न्यायालयों के क्षेत्राधिकार में माना जाता है अर्थात् नौजित माल न्यायालय जलपोतों एवं विमानों तथा इन पर लदे सामान के परिग्रहण की वैधता निर्धारित करता है ।
ये न्यायालय राष्ट्रीय न्यायालय होते हैं, परंतु निर्णय अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के अनुसार ही किए जाते हैं ।
prize law
नौजित माल विधि
युद्ध -व धि का वह भाग जिसका पालन नौजित माल न्यायालय द्वारा किया जाता है । यह कोई संहिताबद्ध विधि नहीं है यद्यपि सन् 1909 के लंदन सम्मेलन में इस दिशा में प्रयास किया गया था । सम्मेलन के अन्त में जो घोषणा - पत्र जारी किया गया वह यद्यपि राज्यों की संपुष्टि प्राप्त नहीं कर सका, किंतु फिर भी वह राज्य - व्यवहार का प्रामाणिक संकलन माना जा सकता है । वास्तव में नौजित माल विधि को विकसित करने का श्रेय अमेरिका और ब्रिटेन के न्यायाधीशों को है जिनमें लार्ड स्टोवेल तथा सर सेम्युअल इवांस के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं ।
process -v erbal
प्रामाणिक विवरण
इस पद का मूल अर्थ है किसी राजनयिक सम्मेलन की कार्यवाही और उसमें लिए गए निर्णायों का आधिकारिक संक्षिप्त विवरण । आजकल इसके अंतर्गत उन शर्तो आदि का भी उल्लेख काय जाता है जिनके आधार पर कोई भावी समझौता किया जाना है । वास्तव में यह राजनयिक वार्ताओं का लिखित विवरण होता है किंतु राज्यों द्वारा इसके अनुसमर्थन की आवश्यकता नहीं होती ।
protective principle
संरक्षण सिद्धांत
इस सिद्धांत के अनुसार क्षएत्राधिकार का दावा राज्य के मार्मिक हितों के संरक्षण के ध्येय के आधार पर किया जा सकता है अर्थात् उन स्थितियों में जहाँ राज्य के मार्मिक हित आहत होते हों परंतु अपारधी न तो राज्य का नागरिक हो और न ह राज्य के प्रादेशिक क्षेत्राधिकार में हो तो उन परिस्थितियों मे अपराधी को दंड देने के लिए इस सिदधांत का प्रयोग किया जा सकता है । उदाहरणार्थ फ्रांस की दंसंहिता विदेशियों द्वारा फ्रांसीसी प्रादेशिक सीमा के बाहर फ्रांस की सुरक्षा के विपरीत अपराध करने, जाली राजकीय मोहर बनाने अथवा जाली फ्रांसीस सिक्के अथवा नोट बनाने के लिए फअरांसीसी कानून के अनुसार दंडित करने की व्यवस्था करती है, यदि अपराधी फ्रांसीसी सरकार के हाथों में आ जाए ।
सन् 1965 मे यूरोपीय राज्यों ने एक समझौते के अंतर्गत प्रादेशिक समुद्र की सीमाओं से पर स्थित जलपोतों पर से रेडियो - प्रसारण को रोकने के लिए तटवर्ती क्षेत्राधिकार की व्यवस्था स्वीकार की थी । इसे भी संरक्षण सिद्धांत का एक व्यावहारिक उपाय माना जा सकता है क्योंकि इस प्रकार के प्रसारण प्रायः तटवर्ती राज्य में असंतोष, विप्लव और विद्रोह भड़काने का प्रायस करते ह ए पाए गए थे ।
protectorate
संरक्षित राज्य
ऐसा राज्य ज स्वयं किसी संधि के अंतर्गत किसी अन्य शक्तिशाली राज्य के संरक्षण में आ जाए । इस प्रकार की संधि के फलस्वरूप संरक्षित राज्य के अंतर्राष्ट्रीय एवं विदेशी मामलों पर संरक्षक राज्य का पूर्णाधिकार व नियंत्रण हो जाता है, परंतु आंतरिक मामलों में उसकी स्वायत्ता बनी रहती है । संरक्षक राज्य द्वारा की गई संधियाँ संरक्षित राज्य पर स्वतः लागू नहीं होती और न ही संरक्षक राज्य के युद्थ में संरक्षित राज्य स्वतः युद्धकारी बन जाता है । सके लिए विशेष रूप से व्यवस्था या घोषणा करना आवश्यक होता है ।
संरक्षित राज्य के राज्याध्यक्ष को ग्रेट - ब्रिटेन के न्यायालयों ने पूर्ण संप्रभुतासंपन्न राज्याध्यक्षों के समान स्थानीय क्षेत्राधिकार से उन्मुक्त माना है ।
protocol
उपसंधि, पूर्वसंधि
उपसंदि या पूर्वसंधि एक ऐसे विवरण - पत्र को कहा जाता है जो कि राजनयिक वार्ताओं के ब्यौरे के रूप मे रखा जाता है और जिसके आधार पर आगे चलकर कोई संधि की जा सकती है । यह संधि से कम औपचारिक हैम ता ह जिस पर साधारणतया शासनाध्यक्ष हस्ताक्षर नहीं करते । यह निम्नलिखित प्रलेखों की ओर संकेत करता है :-
1. किसी संधि का सहायक प्रपत्र जिस पर वार्ताकार ही हस्ताक्षर करते ह । इसमें साधारणतया आनुषंगिक विषयों का समावेश होता है जिसे किसी अभिसंधि की विशिष्ट धाराओं की व्याख्या, विशेष महत्व रखने वाले सहायक उपबंध, कुछ ऐसी औपचारिक धाराएँ जिनका समावेश अभिसंधि में नहीं किया जाता, हस्ताक्षरकर्त्ता राज्यों की कोई विशिष्ट शर्तों राज्यों द्वारा अभइसमय का समर्थन इसका समर्थन माना जाता है ।
2. अभिसंधि का आनुषंगिक प्रपत्र जिसका विषय अभिसंधि के विषय से पृथक और स्वतंत्र होता है और जिसका अनुसमर्थन पृथक रूप से किया जाता है ।
3. यह संधि का ही पर्यायवैची है जैसे सन् 1925 का जेनेवा प्रोटोकोल ।
4. कुछ विषयों पर हुई मौखिक सहमतियों का विवरण - पत्र ।