ध्रुवीय क्षेत्र
इनसे तात्पर्य है उत्तरी ध्रुवीय क्षएत्र एवं दक्षइणी ध्रुवीय क्षेत्र जिन्हें क्रमशः आर्कटिक और अंटार्कटिक महाद्वीप भी कहा जाता है । जलवायु एवं भौगोलिक दशाओं के कारम इन क्षेत्रों में स्थायी रूप से मानवीय बस्तियों की स्थापना असंभव है । अतः इन पर स्वामित्व का दावा, आधिपत्य अथवा वास्तविक सत्ता प्रदर्शन के आधार पर नही किया जा सकता । आर्कटिक क्षेत्र पर सोवियत संघ और कनाडा ने और अंटार्कटिक क्षेत्र पर सात देशों (अर्जेन्टीना, आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, चिली, फ्रांस, न्यूजीलैंड और नार्वे) ने सेक्टर सिद्धांत के आधार पर अपने राष्ट्रीय दावे किए हैं । इन देशों के राष्ट्रीय दावों का आधार यह है कि ये देश ध्रुवीय क्षेत्रों की सीमाओं से निकटतम दूरी पर और उसकी दिशा में स्थिति हैं ।
इन राष्ट्रीय दावों को अंतर्राष्ट्रीय विधि कोई मान्यता नीहं देती और इनसे स्वतंत्रि अंटार्कटिक क्षेत्र के अन्वेषण और वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय संधि पर 1 दिसंबर, 1959 को हस्ताक्षर हुए हैं । इसके पक्षकार राष्ट्रीय दावे वाले सात्रों राज्यों के अतिरिक्त बेल्जियम, जापान, दक्षिण अफ्रीका,सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका भी हैं । इस संधि से राट्रीय दावे असंगत हो गए हैं और अंटार्कटिक क्षेत्र वस्तुः अतर्राष्ट्रीय क्षेत्र बन गया है ।
political asylum
राजनीतिक शरण
अपने मत या विश्वासों के कारम अथवा राज्य विरोधी कार्य करने के कारण तथा अत्पीड़न के डर से किसी व्य्कति का किसी अन्य राज्य में भाग जाना और वहाँ की सरकार द्वारा उसे आ(य दिया जाना । ऐसा व्यक्ति कभी - कभी इस प रकार का आश्रय अपने ही देश में स्थित किसी विदेशी दूतावास में भी ले सकता है । यद्यपि अंतर्राष्ट्यविधि दूतावासों में शरण लेने के अधिकार को सामान्यतः स्वीकृत नहीं है क्योंकि सामान्यतया यह स्वीकार किया जाता है कि आ(य देने का अधइकार प्रादेशिक संप्रभुता का एक गुण है । यदि आ(य किसी दूतावास या युद्धपोत या वाणिज्य दूतावास या अंतर्राष्ट्रीय मुख्यालय में लिया गया है तो वह प्रदेश बाह्य होगा ।
positivist school
यथार्थवादी संप्रदाय
इस मत के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय विधि एक सहमतिपरक विधि है । इसका अर्थ यह है कि इस विधि के नियम राज्यों की पारस्परिक सहमति से स्वीकार किए जाते हैं और जिन नियमों को राज्यों ने स्वीकार नहीं किया है, वे उन पर बाध्यकारी नहीं हैं ।
व्यवहार में सहमति का अर्थ है राज्यों की सामान्य सहमति न कि प्रत्येक नियम के लिए प्रत्येक राज्य की हमति
इसके समर्थकों में रिचर् जाउक, बिंकर शॉक, मॉर, सैमुअल राशेल और मार्टिस आदि के नाम उल्लेखनीय हैं ।
postliminium
परावर्तन नियम, युद्ध पूर्व अव स्था का नियम
दे. Jus postliminii.
prermature recognition
समयपूर्व मान्यता
किसी ऐसी राजनीतिक इकाई अथवा शासन - संगठन को मान्यता दिया जाना जो राज्य अथा शासन के रूप में निश्चित रूप मे स्थापित न हो । प्रायः राजनीतिक कारणों से ऐसा किया जा सकता है । अंतर्राष्ट्रीय विधि की दृष्टि से ऐसी मान्यता दो कारमों से अनुचित और अवैध है :-
1. यह मान्यता देने के अधिकारि का दुरूपयोग है क्योंकि इसका अरथ है कि कसी ऐसी राजनीतिक इकाई या शासन - संगठन को मान्यता देना जिसे वैधिक दृष्टि से राज्य अथवा सरकार नहीं कहा जा सकता और
2. यह उस राज्य के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप है जो विद्रोहकारियों का दमन करने में संघर्षरत है और संघर्ष अभी निर्णयक अवस्था मे नहीं पहुँचा है ।
prescription
चिरभोग
किसी राज्य द्वारा अन्य राज्य के भू - प्रदेश पर बहुत अधइक समय से निरंतर, निर्बाध तथा प्रभावी रूप से वस्तुतः प्रभुसत्ता स्थापित और बनाए रखने के फलस्वरूप उस भू - प्रदेश पर प्रतिकूल कब्जा कायम कर लेना चाहे उसका आधिपत्य मूलरूप से अवैध रहा हो या यह ज्ञात न हो कि यह आधिपत्य कैसे प्रारंभ हुआ । वास्तव में मुख्य तथ्य यह है कि :-
1. आधिपत्य दीर्घकाल तक बना रहा हो और
2. इस अवैध आधिपत्य का वैध स्वामी या अन्य किसी राज्य ने विरोध न किया हो और न ही उक्त प्रदेश की प्राप्ति के लिए कोई प्रभावकारी उपाय किया हो ।
principle of equality of states
राज्यों की समानता का सिद्धांत
मूलरूप से अंतर्राष्ट्रीय विधि के विषय राज्य हैं । इस समय संसार में लगभग 180 स्वतंत्र और संप्रभुतासंपन्न राज्य हैं । क्षेत्रफल, जनसंख्या, प्राकृतिक संसाधनों सैनिक शक्ति और आऱ्तिक संपन्नता की दृष्टि से इन राज्यों के बीच बहुत अंतर है । प रंतु वैधिक दृष्टि से अर्थात् अंतर्राष्ट्रीय विधि के अंतर्गत प्राप्त होने वाले अधिकारों और कर्तव्यों की दृष्टि से सभी राज्य एक - दूसरे के समान माने जाते है । इस स्थित को राज्यों की समानता का सिद्धांत कहा जाता है । समानता प्रत्येक राज्य के मूल अधइकारों में से एक अधिकार है और राज्यों की समानता का सिद्धांत वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय विधि का एक मूल सिद्धांत एवं वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था का एक मूल आधार माना जा सकता है । इसका एक प्रमाण राष्ट्र संघ की सभा और संयुक्त राष्ट्रर संघ की महासभा का संगठन है । यह उल्लेखनीय है कि राष्ट्र संघ की सभा में प्रतेक राज्य को एक वोट देने का अधिकार था और संयुक्त राष्ट्र संघ की महासबा में भी यही स्थिति है ।
principle of good faith
सद्भआव नियम
राज्यों द्वारा अपने अंतर्राष्ट्रीय दायित्वों विशेषकर संधिगत दायित्वों और अंतर्राष्ट्रीय विधि और संयुक्त राष्ट्र चार्टर से उत्पन्न दायित्वों को यथासंभव सद्भावनापूर्वक पूरा करन का निश्चय । संधि के संदर्भ में इस नियम को संधि का सद्भाव भी कहते हैं ।
principle of non refoulement
अवापसी नियम
वर्तमान काल में यह धारणा प्रबल ह ई है कि कुछ दशाओं में उन शरणार्थियों को जो राजनीतिक कारणों से अपना देश छोड़ने और दसूरे देश में शरण लेने को विवश हुए हों, उन्हें यह दूसरा देश सीमा पर ही रोक कर लौटा न दे बल्कि स्थायी रूप से शरण देने के प्रश्न पर निर्णय करने तक उन्हें एक प्रकार की अस्थायी शरण प्रदान कर दे । अतः सीमा पर से ही वापस न भेज देने के दायित्व में एक स्थआयी शरणाधिकार निहित है । परंतु यह धारणा अभी तक अंतर्राष्ट्रीय विधि के किसी सुनिश्चित नियम के रूप में स्वीकृत नहीं की जा सकता ।
principle of speciality
विशिष्टता का सिद्धांत
प्रत्यर्पण की माँग करने वाले राज्य का यह कर्त्तव्य है कि वह अपराधी पर केवल उसी विशिष्ट अपराध के लिए मुकदमा चलाएगा जिस अपराध के लिए उसका प्रत्यर्पम किया गया है, किसी अन्य अपराध के लिए नहीं . प्रायः इस सिद्धांत का उल्लेख प्रत्यर्पण संधियों में कर दिया जाता है ।
कभी - कभी ऐसा भी होता है कि एक ही अपराध विभइन्न देशों में विभिन्न नामों से जाना जाता है, विशिष्टता के नियम के अनुपालन के लिए अपराध का नाम निर्णायक नहीं है बल्कि उसीक प्रकृति और उसका सार निर्णायक होता ह ।