दोहरी आपराधिकता
प्रत्यर्पण के समय अधिकतर राज्य यह शर्त लगाते हैं कि प्रत्यर्पित व्यक्ति का अपराध ऐसा हो जो शरण देने वाले राज्य तथा प्रत्यर्पण माँगने वाले राज् दोनों के कानूनों के अनुसार दंडनीय हो ऐसे ना होने पर प्रत्यर्पण नहीं किया जाता ।
double nationality
दोहरी राष्ट्रिकता
ज्ञानवश अथवा अज्ञानवश, जानबूझकर अथवा बिना किसी प्रयोजन के कोई व्यक्ति एक राज्य का राष्ट्रिक होते हुए भी दूसरे राज्य की राष्ट्रीयता प्राप्त कर ले तो उसे दोहरी राष्ट्रीयता प्राप्त हो जाती है । ब्रिटेन में जर्मन माता - पिता की संतान वहां पर जन्म लेने के कारण जन्ममूलक तथा जर्मनी में जर्मन पिता होने के कारण पितृ मूलक राष्ट्रीयता प्राप्त कर लेती है । इसी प्रकार इंग्लैंड में जर्मन पिता तथा ब्रिटिश माता की अवैध संतान ब्रिटिश है किंतु (संतान हो जाने के बाद ) दोनों मेंविवाह हो जाने पर संतान वैध हो जाएगी और ऐसी संतान को जर्मन कानून के अनुसार जर्मन नागरिकता भी मिल जाएगी
ऐसे द्विराष्ट्रिकता वाले व्यक्तियों को राजनयिक भाषा में मिश्रित्र प्रजाजन (subjects mixtes) कहा जाता है । द्विराष्ट्रिकता वाले व्यक्ति के साथ तीसरा राज्य उनकी 'प्रभावी राष्ट्रीयता' effective nationality) के आधार पर व्यवहार करेगा अर्थात् वह उसे उसी राज्य का राष्ट्रिक समझोगा जिसमें वह स्वाभावक और मुख्य रूप से रहता है तथा जिसके साथ उसका घनिष्ठ संबंध है ।
इसी तरह जब कोई महिला किसी वेदेशी पुरूष से विवाह कर लेती है तो वह अपने राज्य की विधि के अनुसार अपने राज्य की राष्ट्रिक बनी रह सकती है और अपने पति के राज्य की विधि के अनुसार अपने पति के राज्य की भी राष्ट्रिक बन जाती है ।
Drago doctrine
ड्रेगो सिद्धांत
इस सिद्धांत का प्रतिपादन सर्वप्रथम 1902 मे अर्जेन्टीना के विदेश मंत्री ड्रेगो द्वारा काय गया था । उन्होंने इस बात पर बल दिया कि राज्यों का यह कर्तव्य है कि वे अपने नागरिकों के ऋणों की वसूली के लिए किसी दूसरे राज्य के विरूद्ध सशस्त्र बल प्रयोग न केरं । आगे चलकर 1907 के अभिसमय में भी इस सिद्धांत को दोहराया गया था । इस अभिसमय को पोर्टर अभिसमय भी कहा जाता है ।
dualistic theory (=school of dualism)
द्वैतवादी सिद्धांत
द्वैतवादी संप्रदाय
अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय कानूनों के पारस्परिक संबंध के बारे मे इस सिद्धांत अथवा संप्रदाय के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय कानून दो सर्वथा पृथक और स्वतंत्र पद्धतियाँ हैं क्योंकि इनके स्रोत इनके विषय और लागू होने के क्षेत्र बिल्कुल भिन्न हैं ।
इस मत के समर्थकों के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय कानून राष्ट्रों के परिवार मे विकसित हुई प्रथाओं और विभिन्न राज्यों द्वारा आपस में की गी संधियों से जन्म लेता है जबकि राष्ट्रीय कानून राज्यकी सीमाओं के अंदर विकसित हुई प्रथाओं और राज्य की विधायिका द्वारा निर्मित कानूनों से उत्पन्न होता है । अंतर्राष्ट्रीय कानून राज्यों के पारस्परिक संबंधों का नियमन करता है तो राष्ट्रीय कानून राज्य के नागरिकों के आपसी संबंधो तथा उनके और र्जाय के बच संबंधों का नियामक है । राष्ट्रीय कानून, प्रभुसत्ता संपन्न विधायिका द्वारा निर्मित होकर राज्य के नागरिकों पर सर्वोच्च सत्ता रखता है जबकि अंतर्राष्ट्रीय कानून पूर्ण प्रभुता संपन्न राज्यों के पारस्परिक समझौतों, संधियों का परिणाम होता है इसलिए उसके पीछे कोई बाध्यकारी शक्ति नही होती ।
इन पारस्परिक भिन्नताओं के फलस्वरूप द्वैतवादी यह मानते हैं कि राष्ट्रीय कानून में विधिवत रूप से समाविष्ट किए बिना अंतर्राष्ट्रीय कानून के नियम राष्ट्री क्षेत्राधिकार मे लागू नहीं हो सकते और राष्ट्रीय कानून के भाग भी नहीं माने जा सकते । इस सिद्धांत के मुख्य समर्थकों में ओपेनहायम ट्रिपल आंजेलोटी आदि के नाम उल्लेखनीय हैं ।