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Braj Bhasha Soor-Kosh (Vol-X)

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सोगी
दुखी।
वि.
पुं.
(हिं. सोग)

सोच
फिक्र, चिंता।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोच)
उ.- (क) सूरदास प्रभु रची सु ह्वैहै, को करि सोच मरै-१-२६४। (ख) कंसराय जिय सोच परी-१०-४८। (ग) सूरज सोच हरौं मन अबहीं, तौ पूतना कहाऊँ-१०-४९। (घ) सुन्यौ कंस पूतना सँहारी। सोच भयौ ताकैं जिय भारी-१०-५८। (ङ) तब तैं यो जिय सोच, जबहिं तैं बात परी सुनि-५८९।

सोच
रंज दुख।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोच)
उ.- (क) औगुन की क्रछु सोच न संका-१-१८६। (ख) कियौ न कबहुँ बिलम्ब कृपानिधि सादर सोच निवारौ-१-१५७।

सोच
पछतावा, पश्चाताप।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोच)
उ.- देखि कै उमा कोरुद्र लज्जित भए, कहथौ मैं कौन यह काम कीनौ।¨¨¨¨¨¨। चतुर्भुज रूप हरि आइ दरसन दियौ, कहथौ, सिव सोच दीजै बिहाई-८-१०।

सोचत
(किसी विषय में) विचार करता है।
क्रि.अ.
(हिं. सोचना)
उ.- (क) विदुखि सिंधु सकुचत, सिव सोचत, गरलादिक किमि जात पियौ-१०-१४३। (ख) कैसे कैं वाकौ मारैंगे, सोचत हैं पुर-नारी-सारा. ५०५।

सोचति
चिंतित होती है, चिंता करती है।
क्रि.अ.
(हिं. सोचना)
उ.- (क) दरसन सुखी, दुखी अति सोचति षट सुत-सोक सुरति उर आवति-१०-७। (ख) कैसेहुँ ये बालक दोउ उबरैं, पुनि पुनि सोचति परी खभारे-५९५।

सोचन
विचार या चिंता में।
संज्ञा
पुं. सवि
(हिं. सोच)
उ.- भवन मोहिं भाटी सों लागत मरति सोच ही सोचन-१४१७।

सोचन
लगे या लागे सोचन-सोचने, विचारने या चिंता करने लगे।
प्र.
उ.- (क) भूमि परे तैं सोचन लागे महा कठिन दुख भारे-१-३३४। (ख) अबकी बेर बहुरि फिरि आवहु कहा लगे जिय सोचन-२७०८।

सोचना, सोचनो
किसी बात, विषय या प्रसंग पर विचार करना।
क्रि.अ.
(सं. शोचन)

सोचना, सोचनो
फिक्र या चिंता करना।
क्रि.अ.
(सं. शोचन)


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