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Braj Bhasha Soor-Kosh (Vol-X)

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सोइयत
सोया जाता है।
क्रि.अ.
(हिं. सोना)
उ.- नाहिंन इतौ सोइयत सुनि सुत प्रात परम सुचि काल-१०-२०७।

सोई
वही।
सर्व.
(हिं. सो + ही)
उ.- (क) सहि सन्मुख तउ सीत-उष्न कौं सोई सुफल करै-१-११७। (ख) जो मैं कहत रह्यौ भयौ सोई सपनंतर की प्रगट बताई-९३२।

सोई
निंद्रा लेने लगी।
क्रि.अ.
(हिं. सोना)
उ.- टहल करत मैं याके घर की, यह पति संग मिलि सोई-१०-३२२।

सोऊँ
निद्रा लूँ, शयन करूँ।
क्रि.अ.
(हिं. सोना)
उ.- सुख सोऊँ, सुनि बचन तुम्हारे, देहु कृपा करि बाँह-१-५१।

सोऊ
वह भी।
सर्व.
(हिं. सो + ऊ)
उ.- महादेव-हित जो तप करिहैं। सोऊ भव-जल तैं नहिं तरिहैं-४-५।

सोऊ
सोनेवाला।
वि.
(हिं. सोना)
उ.- तृष्ना हाथ पसारे निसि दिन, पेट भरे पर सोऊ-१-१८६।

सोए
निद्रा लेते रहे, सो गये, शयन किया।
क्रि.अ.
(हिं. सोना)
उ.- (क) सूर अधम की कहौ कौन गति, उदर भरे परि सोए-१-५२। (ख) सूर स्याम बिरुझाने सोए-१०-१९६। (ग) अब लौं कहा सेए मनमोहन, और बार तुम उठत सबार-४०३।

सोक
प्रिय व्यक्ति की मृत्यु से होने वाला परम कष्ट।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोक)
उ.- दरसन सुखी, दुखी अति सोचति षट-सुत सोक-सुरति उर आवति-१०-७।
मुहा.- सोक मनाना-प्रियजन की मृत्यु पर शोकचिह्न धारण करना और सामाजिक उत्सव आदि में सम्मिलित न होना।

सोक
प्रियजन के विरह से होनेवाला कष्ट।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोक)
उ.- (क) करिहैं सोक-संताप धार पितु-मातहिं देखौ-४९२। (ख) मदन गोपाल देखत ही सजनी सब दुख-सोक बिसारे-१५६९।

सोक
दुख, कष्ट।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोक)
उ.- (क) सीत-उष्न सुख-दुख नहिं मानै हर्ष-सोक नहिं खाँचै-१-८१। (ख) अंबर हरत सभा मैं कृष्ना सोक-सिंधु तैं तारी-१-२८२। (ग) गदगद कंठ सोक सौं सोवत बारि बिलोचन छाए-९-६७।


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