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Braj Bhasha Soor-Kosh (Vol-X)

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सोऽहम, सोऽहम्
वह (अर्थात् ब्रह्म) मैं ही हूँ।
पद.
(सं. सः + अहम्)

सोऽहमस्मि
वही (अर्थात् ब्रह्म) मैं ही हूँ।
पद.
(सं. सः + अहम् + अस्मि)

सोअना, सोअनो
नींद लेना।
क्रि.अ.
(हिं. सेना)

सोआ
एक तरह का साग।
संज्ञा
पुं.
(सं. मिश्रेया)

सोआए
सुला दिये।
क्रि.स.
(हिं. सोआना)
उ.- छोरे निगड़, सोआए पहरू, द्वारे कौ कपाट उघरथो-१०-८।

सोआना, सोआनो
सुलाना, सोने को प्रवृत्त करना।
क्रि.स.
(हिं. सोआना)

सोइ
वही।
सर्व.
(हिं. सो + ही)
उ.- (क) सोइ सगुन ह्वै नंद की दाँवरी बँधावै-१-४। (ख) सोइ प्रसाद सूरहिं अबं दीजै-१-२०४। (ग) ज्ञान बिराग तुरत तिहिं होइ। सूर बिष्नु पद पावै सोइ-६-४। (घ) पाप उजीर कह्यौ सोइ मान्यौ-१-६४।

सोइ
सोकर, सोने (पर)।
क्रि.अ.
(हिं. सोना)
उ.- जैसै सुपने सोइ देखियत तैसे यह संसार-१-३१।

सोइ
सोइ रहौ-सो रहो।
प्र.
उ.- सूर स्याम तुम सोइ रहौ अब प्रात जान मैं दैहौं-४२०।

सोइ
इसलिए, अतः।
अव्य.
(हिं. सो)


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