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Definitional Dictionary of International Law (English-Hindi)
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jusbeli
युद्ध विधि दे. Laws of war.

jus cogens
अनुल्लंघनीय नियम अंतर्राष्ट्रीय विधि के वे अपरिहार्थ नियम, सिद्धांत या मूल्य जिनका किसी दशा में किसी प्रकार से भी अतिलंघन नीहं किया जा सकता । यद्यपि ऐसे नियमों अथवा सिद्धांतों की कोई सूची बनाना कठिन है परंतु कुछ नियम अवश्य ऐसे है जिन्हें इस श्रेणी मे रखा जा सकता है जैसे अपने अंतर्राष्ट्रीय दायित्वों का सद्भावनापूर्वक पालन करना, अग्र आक्रमण न करना आदि ।

jus gentium
1. वैदेशिक कानून, विदेशियों का कानून 2. अंतर्राष्टरीय विधि, जस जैंशियम 1. रोमन नागरिकों के विदेशियों के साथ और विदेशियों के आपसी संसर्ग से संबंधित नियम । 2. स्वतंत्र राज्यों के आपसी व्यवहार अथवा संसर्ग को नियमित करन वाली नियमावली, विस्तार के लिए देखिए international law.

jus naturale
नैसर्गिक विधि, प्राकृतिक विधि मानव विवेक से उद्भूत नियम या विधि जो संस्थापित विधि के अभाव में या उसके अलावा मानव आचरण और समाज पर स्वभावतः ही लागू होते हैं । इसका कारण यह है कि ये मानव प्रकृति के अनुरूप होते हैं । एक मत यह है कि अंतर्राष्ट्रीय विधि का आधार यह प्राकृतिक अथवा नैसर्गिक विधि ही है । इस मत के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय विधि राज्यों द्वारा स्थापित न होकर प्राकृतित विधि का वह भाग है जो राज्यों के पारस्परिक संबंधों मे लागू होता है ।

jus postililminii
परावर्तन नियम, युद्ध - पूर्व अवस्था का नियम इस सिद्धांत का संबंध युद्ध -विधि के आधिपत्य के नियम से है । नियम यह है कि सैनिक आधिपत्य की समाप्ति पर आधिपत्य की समाप्ति पर धिपत्य - अधीन प्रदेश से संबंधित समग्र कानूनी व्यवस्था युद्ध - पूर्व स्थिति को लौट जाती है । अर्थात् युद्ध - पूर्व अवस्था की पुनः स्थापना हो जाती है । ओपेनहायम ने अंतर्राष्ट्रीय विधि की दृष्टि से युद्ध - पूर्व अवस्था के तीन परिणामों का उल्लेख किया है :- 1. भूतपूर्व राजनीतिक अवस्था की आवृत्ति 2. आधिपत्य - काल के वैध कार्यों की स्वीकृति और 3. आधिपत्य - काल के अवैध कार्यों की अस्वीकृति । जूलियस स्टोन, श्वारजनबारगर आदि लेखकों का मत है कि यह सिद्धांत पूर्णतया निरर्थक है क्योंकि यथापूर्वन - स्थिति की पुनः स्थापना संभव नही है ।

just war
न्याय्य युद्ध यह अवधारणा मध्ययुगीन धर्म - युद्ध (Holy war ) का रूपांतरण है और सत्रहवीं - अठारहवीं शताब्दी मे इसका प्रचलन रहा । इससे तात्पर्य यह था कि युद्ध के पक्षकारों में एक पक्ष न्यायसंगत है और दूसरा नहीं । यद्यपि यह भेद करने के कोई निश्चित नियम नहीं थे कि कौन न्यायासंगत है और कौन नहीं । उन्नीसवीं शताब्दी में राष्ट्रीय राज्यों और संप्रभुता के सिद्धांत के सुदृढ़ हो जाने के साथ - साथ यह भावना बी प्रबल होती गई कि युद्ध राज्य का एक संप्रभु अधिकार है । यह उसकी संप्रभुता का एक अंग है और इस परिप्रेक्ष्य मे नन्यायसंगत और न्याय - असंगत का जो भेद चला आ रहा था,व ह समाप्त हो गाय । प्रथम महायुद्ध के उपरांत राष्ट्र संघ की स्थापना से और सन् 1928 में पेरिस समझौते के अंतर्गत युद्ध के अधिकार के परित्याग से पुनः इस विचार का नवीनीकरण हुआ कि युद्ध में एक पक्ष को न्याससंगत माना जाए और दूसरे को नहीं । इस विभाजन का मानदंड यह हो गया कि जो पक्ष राष्ट्र संग की प्रसंविदा अथा पेरिस समझौते का उल्लंघन करके युद्ध प्रारंभ करता है उसे न्याय - असंगत और उसके आक्रमण से आत्म - रक्षा करने वाले को न्याय - संगत पक्ष माना जाए । संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के उपरांत यह भेद और भी मुखर हो गया । अब यह कहा जा सकता है कि जो राज्य सुरक्षा - परिषद् के निर्देस पर शांति बनाए रखने की किसी कार्रवाई में बाग लेते हैं वे न्यायसंगत युद्धकारी है और जिनके विरूद्ध यह कार्रवाई की जा रही है, वे न्यायसंगत नहीं है । इस प्रकार बीसवीं शताब्दी में पुनः न्यायासंत युद्ध की अवधारणा का प्रादुर्भाव हुआ ।

Kellogg - Briand Pact
केलॉग - ब्रियाँ समझौता 27 अगस्त, 1928 को पेरिस मे फ्रांस तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के विदेश मंत्रियों ने एक संधि पर हस्ताक्षर किए जो इन दोनों विदेश मंत्रियों - केलॉग और ब्रियाँ समझौते के नाम से प्रसिद्ध है । इसे पेरिस समझौता अथवा युद्ध परित्याग की सामान्य संधि भी कहा जाता है । इसके अंतर्गत इन राज्यों ने राष्ट्रीय नीति के उपकरण के रूप में युद्ध का परित्याग करने की घोषणा की और अपने पारस्परिक विवादों को शांतिपूर्ण उपायों से तय करने का निश्चय किया । कालांतर मे इस समझौते ने एक सर्वदेशीय संधि का रूप धारण कर लिया जो विश्व के सबी देशों के लिए बाध्यकारी मानी जाती है, चाहे उन्होंने इस पर हस्ताक्षर किए हों या न किए हो । वर्तमान काल में इसे विशअव की वैधिक व्यवस्था का एक अंग माना जाता है ।

kiel canal
कील नहर स्वेज और पनामा नहर की भाँति कील नहर भी एक अंतर्राष्ट्रीय नहर मानी जाती है । यद्यपि यह जर्मन प्रदेश का भाग है परंतु सन् 1919 की वार्साई संधि के अंतर्गत इसका अंतर्राष्ट्रीयकरण कर दिया गया । इसके अंतर्गत यह व्यवस्था की गई कि कील नहर युद्ध और शांति काल में सब देशों के वणिक पोतों और युद्ध पोतों के लिए समान और निर्बाध रूप से खुली रहेगी ।

laissez - passer
निःशुल्क सीमा - प्रवेश पत्र किसी देश के राजनयिक अधिकारियों तथा कर्मचारियों को दी जाने वाली एक ऐसी सुविधा जिसके आधार पर वे अपनी नियुक्ति वाले देश में बिना की प्रवेश शुल्क दिए प्रवेश पाने के अधिकारी होते हैं । यह सुविधा सामान्य नागरिकों को प्रायः उपलब्ध नहीं होती ।

land - locked states
भूबद्ध राज्य ये वे राज्य हं जो चारों ओर से किसी न किसी देश की भूभागीय सीमा से घिरे हुए हैं अर्थात् जिनका अपना कोई समुद्र तट नहीं है, जैसे नेपाल, अफगानिस्तान, स्विट़ज़रलैंड, आस्ट्रिया आदि । ऐसे राज्यों की कुल संख्या इस समय 31 है । इन देशओं की सदैव ह माँग रही ह कि महासमुद्र में परिवहन एवं व्यापार का उन्हें भी अधिकार होना चाहिए और इस हेतु संलग्न तटवर्ती राज्य अथवा राज्यों को इन्हें आवश्यक पारगमन - सुविधा प्रदान करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय - विधि द्वारा बाध्य किया जाना चाहिए । इस हेतु सन् 1965 में न्यूयार्क में एक संयुक्त राष्ट्र संघ सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें 58 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया । इस सम्मेलन में भूबद्ध राज्यों के परिवहन - व्यापार पर एक अभिसमय ग्रहण किया गया । इस अभिसमय की व्यवस्था 10 दिसंबर, 1982 की समुद्र - विधि पर संयक्त राष्ट्र संघ अभिसमय के भाग 10 में रूपांतरित हुई । इसके अनुसारि भूबदध राज्यों को समुद्र तक जाने और वहाँ से आने का अधिकार होगा जिसके लिए संबंधित राज्य अथवा राज्यों को इन्हें आवागमन का विशेष अधिकार देना होगा । परंतु आवागमन अधिकार की शर्तें और इससे इससे संबंधित विस्त व्यवस्था पारस्परिक समझौते से तय करनी होगी ।


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