समयपूर्व मान्यता
किसी ऐसी राजनीतिक इकाई अथवा शासन - संगठन को मान्यता दिया जाना जो राज्य अथा शासन के रूप में निश्चित रूप मे स्थापित न हो । प्रायः राजनीतिक कारणों से ऐसा किया जा सकता है । अंतर्राष्ट्रीय विधि की दृष्टि से ऐसी मान्यता दो कारमों से अनुचित और अवैध है :-
1. यह मान्यता देने के अधिकारि का दुरूपयोग है क्योंकि इसका अरथ है कि कसी ऐसी राजनीतिक इकाई या शासन - संगठन को मान्यता देना जिसे वैधिक दृष्टि से राज्य अथवा सरकार नहीं कहा जा सकता और
2. यह उस राज्य के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप है जो विद्रोहकारियों का दमन करने में संघर्षरत है और संघर्ष अभी निर्णयक अवस्था मे नहीं पहुँचा है ।
prescription
चिरभोग
किसी राज्य द्वारा अन्य राज्य के भू - प्रदेश पर बहुत अधइक समय से निरंतर, निर्बाध तथा प्रभावी रूप से वस्तुतः प्रभुसत्ता स्थापित और बनाए रखने के फलस्वरूप उस भू - प्रदेश पर प्रतिकूल कब्जा कायम कर लेना चाहे उसका आधिपत्य मूलरूप से अवैध रहा हो या यह ज्ञात न हो कि यह आधिपत्य कैसे प्रारंभ हुआ । वास्तव में मुख्य तथ्य यह है कि :-
1. आधिपत्य दीर्घकाल तक बना रहा हो और
2. इस अवैध आधिपत्य का वैध स्वामी या अन्य किसी राज्य ने विरोध न किया हो और न ही उक्त प्रदेश की प्राप्ति के लिए कोई प्रभावकारी उपाय किया हो ।
principle of equality of states
राज्यों की समानता का सिद्धांत
मूलरूप से अंतर्राष्ट्रीय विधि के विषय राज्य हैं । इस समय संसार में लगभग 180 स्वतंत्र और संप्रभुतासंपन्न राज्य हैं । क्षेत्रफल, जनसंख्या, प्राकृतिक संसाधनों सैनिक शक्ति और आऱ्तिक संपन्नता की दृष्टि से इन राज्यों के बीच बहुत अंतर है । प रंतु वैधिक दृष्टि से अर्थात् अंतर्राष्ट्रीय विधि के अंतर्गत प्राप्त होने वाले अधिकारों और कर्तव्यों की दृष्टि से सभी राज्य एक - दूसरे के समान माने जाते है । इस स्थित को राज्यों की समानता का सिद्धांत कहा जाता है । समानता प्रत्येक राज्य के मूल अधइकारों में से एक अधिकार है और राज्यों की समानता का सिद्धांत वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय विधि का एक मूल सिद्धांत एवं वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था का एक मूल आधार माना जा सकता है । इसका एक प्रमाण राष्ट्र संघ की सभा और संयुक्त राष्ट्रर संघ की महासभा का संगठन है । यह उल्लेखनीय है कि राष्ट्र संघ की सभा में प्रतेक राज्य को एक वोट देने का अधिकार था और संयुक्त राष्ट्र संघ की महासबा में भी यही स्थिति है ।
principle of good faith
सद्भआव नियम
राज्यों द्वारा अपने अंतर्राष्ट्रीय दायित्वों विशेषकर संधिगत दायित्वों और अंतर्राष्ट्रीय विधि और संयुक्त राष्ट्र चार्टर से उत्पन्न दायित्वों को यथासंभव सद्भावनापूर्वक पूरा करन का निश्चय । संधि के संदर्भ में इस नियम को संधि का सद्भाव भी कहते हैं ।
principle of non refoulement
अवापसी नियम
वर्तमान काल में यह धारणा प्रबल ह ई है कि कुछ दशाओं में उन शरणार्थियों को जो राजनीतिक कारणों से अपना देश छोड़ने और दसूरे देश में शरण लेने को विवश हुए हों, उन्हें यह दूसरा देश सीमा पर ही रोक कर लौटा न दे बल्कि स्थायी रूप से शरण देने के प्रश्न पर निर्णय करने तक उन्हें एक प्रकार की अस्थायी शरण प्रदान कर दे । अतः सीमा पर से ही वापस न भेज देने के दायित्व में एक स्थआयी शरणाधिकार निहित है । परंतु यह धारणा अभी तक अंतर्राष्ट्रीय विधि के किसी सुनिश्चित नियम के रूप में स्वीकृत नहीं की जा सकता ।
principle of speciality
विशिष्टता का सिद्धांत
प्रत्यर्पण की माँग करने वाले राज्य का यह कर्त्तव्य है कि वह अपराधी पर केवल उसी विशिष्ट अपराध के लिए मुकदमा चलाएगा जिस अपराध के लिए उसका प्रत्यर्पम किया गया है, किसी अन्य अपराध के लिए नहीं . प्रायः इस सिद्धांत का उल्लेख प्रत्यर्पण संधियों में कर दिया जाता है ।
कभी - कभी ऐसा भी होता है कि एक ही अपराध विभइन्न देशों में विभिन्न नामों से जाना जाता है, विशिष्टता के नियम के अनुपालन के लिए अपराध का नाम निर्णायक नहीं है बल्कि उसीक प्रकृति और उसका सार निर्णायक होता ह ।
prisoners of war
युद्धबंदी
युद्ध की संक्रिया में शत्रु पक्ष की सेना तथा युद्ध संचालन से संबंधित अन्य व्यक्ति जो युद्धकारी द्वारा बंदी बना लिए जाए, युद्धबंदी कहलाते हैं ।
युद्धबंदियों के साथ बर्ताव किए जाने से संबंधित नियम सर्वप्रथम सन् 1899 के हेग भइसमय में अपनाए गे थे जिनका पुनरीक्षण सन् 1907 के दूसरे हेग सम्मेलन सन् 1929 के जेनेवा सम्मेलन और फिर सन् 1949 के जेनेवा सम्मेलन में किया गया था ।
सन् 1949 के जेनेवा अभइसमय में `युद्धबंदी कौन है` इसकी विस्तृत व्याख्या की गई ह । इसके अनुसार न केवल शत्रु पक्ष की सेना के सदस्य बल्कि सेना के साथ रहने वाले असैनिक कर्मी जैसे संवाददाता, ठेकेदार (मिक सेवक आदि भी शत्रु के हाथ में पड़ने पर युदधबंदी कहलाते हैं । इस अभिसमय में युद्धबंदियों के साथ व्यवहार किए जाने से संबंधित नियमों की विस्तृत व्याख्या की गई है । इन नियमों का सार यह है कि प्रत्येक दशा मे युद्धबंदियों के साथ मानवीय व्यवहार किया जाना चाहिए, उनके साथ कोई ऐसा अपचार नहीं किया जाना चाहिए जो उनके जीवन, स्वास्थ्य या सम्मान के लिए हानिकारक हो और न ही उनके विरूद्ध प्रतिशओधात्मक कार्य किए जाने चाहिए । उनके व्यक्तित्व और मान - मर्यादा का आदार किया जाना चाहिए और उनके खाने - पीने कपड़े और आवश्यक चिकित्सा का निःशुल्क प्रबंध बंदी बनाने वाले राज्य को करना चाहिए ।
privateering
जल दस्युता
दे. Piracy.
private internationa law (=conflict of laws)
वैयक्तित अंतर्राष्ट्रीय विधि, वैयक्तिक अंतर्राष्ट्रीय कानून
किसी राज्य में उत्पन्न ऐसे विवाद जिनका संबंध राज्यों से न होकर व्यक्तियों से हो और विवाद से संबंधित इन व्यक्तियों के राष्ट्रीय या राजनीतिक इकाइयों के कानूनों में भिन्नता पाई जाती हो । ऐसी स्थितियों में लागू होने वाले नियमों के समूह को `वैयक्तिक अंतर्राष्ट्रीय` विधि कहते हैं ।
prize
नौजित माल
समुद्री युद्ध में नौसैनिक बेड़े द्वारा हस्तगत की गई शत्रुसंपत्ति जैसे, जलपोत, युद्ध सामग्री तथा अन्य माल । तटस्थ जलपोतों से पकड़े गए विनिषिद्ध माल को भी नौजित माल कहते हैं । अब वायुयानों से पकड़े गए शत्रु माल को भी इसी श्रेणी में रखा जाता है ।