महासभा (संयुक्त राष्ट्र)
यह संयुक्त राष्ट्र के 6 प्रमुक अंगों में से एक है । संयुक्त राष्ट्र संघ के सभी सदस्य - राज्य इसके सदस्य ह ते हैं और प्रत्येक राज्य के प्रतिनिधिमंजल को एक मत प्राप्त होता है । इसके अधिवेश साधारणतया प्रतिवर्ष होते हैं, परंतु इसका विशेष अधिवेशन भी बुलाया जा सकता है । इसे महत्वपूर्ण - पदों एवं समितियों के निर्वाचन का अधिकार है जिनमें महासचिव, अंतर्राष्ट्रीय - न्यायालय के सदस्य, सामाजिक और आर्थिक परिषद् के सदस्य, सुरक्षा - परिषद् के अस्थायी सदस्य शामिल हैं । यह विश्व की उन सबी समस्याओं एवं परिस्थितियों पर विचार - विमर्श कर सकत है जिनका संबंद विश्व में शांति बनाए रखने से हो । यद्यपि इसके प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं होते, परंतु सभी राज्यों का प्रतिनिधित्व करने के कारण संयुक्त राष्ट्र की महासभा विश्व जनमत का दर्पण मानी जाती है और इसे विश्व की संसद भी कहा जाता है ।
general disarmament
सामान्य निरस्त्रीकरण,
सामान्य निःशस्त्रीकरण
दे. Disarmament.
general international law
सामान्य अंतर्राष्ट्रीय विधि
राज्यों के मध्य पारस्परिक व्यवाहर को नियमित करने वाले नियमों व सिद्धांतों का समूह जो सामान्यतः सभी राज्यों के लिए बाध्यकारी माने जाते हैं ।
इस प्रकार के सामान्य रूप से लागू होने वाले अंतर्राष्ट्रीय नियम उन नियमों से भिन्न होते हैं जो संसार के कुछ विशेष - क्षेत्रों में विकसित हुए हैं (जैसे लातीनी अमेरिका में) और जिन्हें क्षेत्रीय या विशिष्ट अंतर्राष्ट्रीय विधि कहा जाता है ।
general principle of law
विधि के सामान्य सिद्धांत
सन् 1945 के अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय की संविधि ने सभ्य राज्यों द्वारा मान्यताप्राप्त विधि के सामान्य सिद्धांतों को भी संधियों और प्रथाओं के साथ - साथ अंतर्राष्ट्रीय विधि का एक मूल स्रोत माना है । फ्रीडमैन आदि लेखकों का मत है कि यह एक ऐसा स्रोत है जिसके भविष्य में अधिकाधिक उपयोग होने की संभावनाएँ हैं । ओपेनहायम ने भी अंतर्राष्ट्रीय विदि के लि इसेके महत्व को स्वीकार किया है ।
विधि के सामान्य सिद्धांतों से तात्पर्य है वे सिद्धांत जो संसार की प्राधन विधि प्रणलियों में समान रूप से पाए जाते हैं और जो सारमूलक और प्रक्रियात्मक दोनों प्रकार के हो सकते हैं । जैसे एक सारमूलक सिद्धांत यह है कि संधि की किसी व्यवस्था का पालन न करने पर क्षतिपूर्ति की जानी चाहिए । इसी प्रकार एक प्रक्रियात्मक सिद्धांत यह है कि किसी न्यायिक निकाय द्वारा दिया गया निर्णय दोनों पक्षकारों के लिए बाध्यकारी है ।
Geneva Conventions
जेनेवा अभिसमय
यूँ तो अंतर्राष्ट्रीय विधि के अनेकानेक अभिसमयों के साथ जेनेवा का नाम जुड़ा हुआ है, परंतु 12 अगस्त, 1949 को अंगीकार किए गए चार अभिसमय विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं क्योंकि इन अभिसमयों में अतंर्राष्ट्रीय विधि के उस पक्ष के विकास की परिणति प्रायः हो जाती है जिसे मानवतावादी या मानवीय अंतर्राष्ट्रीय विधि कहा जाता है ।
12 अगस्त 1949 को जेनेवा में हुए सम्मलेन में निम्नलिखित चार अभिसमयों पर हस्ताक्षर हुए
1. स्थल - युद्ध में बीमार और घायलों का उपचार संबंधी अभिसमय
2. समुद्री - युद्ध में बीमार और घायलों का उपचार संबंधी अभिसमय
3. युद्धबंदियों के संग व्यावहार संबंधी अभिसमय और
4. युद्ध - काल में गैर सैनिक जनता के साथ व्यवहारि संबंधी अभिसमय ।
इस अभिसमयों के विषय र उद्देश्य इनके नाम् से ही स्पष्ट हो जातै हं । यह उल्लेखनीय है कि इनके द्वारा प्रतिपादित कानून सथिर नही रहा है बल्कि वह निरंतर विकासोन्मुख है । परंतु इसका केंद्र - बिंदु जेनेवा के ये चार अभिसमय ही हैं ।
Geneva Protocol
जेनेवा उपसंधि, जेनेवा प्रोटोकोल
सन् 1925 मे स्वीकृत यह उपसंधि युद्ध - संचालन में जनसंहार के शस्त्रों पर प्रतिबंध लगाने में एक महत्वपूर्ण प्रयास था । इसके अनुसार युद्ध में श्वासावरोधक गैसयुक्त शस्त्रों और घातक कीटाणुओं से युक्त अस्त्रों के प्रयोग को वर्जित किया गया था ।
16 दिसंबर, 1969 को जेनेवा उपसंधि में आस्था प्रकट करते हुँ संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने यह घोषित किया कि किसी सशस्त्र अंतर्राष्ट्रीय संघर्ष में निम्नलिखित अस्त्र - शस्त्रों का प्रयोग अंतर्राष्ट्रीय विधि विरोधी माना जाएगा :-
1. ऐसे रासायनिक पदार्थ वाले शस्त्र जिनका मनुष्यों, पशुओं और वनस्पतियों पर प्रत्यक्ष रूप से विषाक्त प्रभाव होता हो ।
2. जैविक अस्त्र - शस्त्र जिनका उद्द्शेय मनुष्यों, पशुओं और वनस्पतियों में बीमारी फैलाना या इन्हें नष्ट करना हो और जो इस संक्रीय में स्वयं बढ़ जाने की क्षमता रखते हों ।
इसी उद्देश्य को और अधिक सुदृढ़ बनाने के लिए 1972 में एक अभिसमय पर हिस्ताक्षर हुए जिसका लक्ष्य जैविकीय एवं विषाक्त शस्त्रों के विकास, उत्पादन और हस्ताक्षर हुए जिसका लक्ष्य जैविकीय एवं विषाक्त शस्त्रों के विकास, उत्पादन और भंडारण को वर्जित करना और उनके नष्ट किए जाने की व्यवस्था करना है ।
genocide
जाति - संहार, जनसंहार
कीस राज्य में किसी वर्ग विशेष या जाति को समूल नष्ट करने के उद्देश्य से उसको व्यवस्थित ढंग से समाप्त करने की नीति अथवा कार्यक्रम । नाज़ी जर्मनी में यहूदियों का संहार इस नीति अथवा कार्यक्रम का एक उदाहरण है । युद्धोपरांत संयुक्त राष्ट्र ने 1948 में एक संविदा के अंतर्गत जनसंहार के अपराध की रोकथाम और उसके लिए दंड की व्यवस्था की है ।
Genocide Convention (=Convention on Genocide)
जनसंहार अभिसमय
यह अभिसमय संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा सन् 1948 में अपनाया गया था । इसका पूरा नाम नरसंहार या जनसंहार के अपराध की रोकथाम एवं उसके लिए दंड की व्यवस्था विषयक अभिसमय है । इसमें जनसंहार को अंतर्राष्ट्रीय विधि विरोधी दंडनीय अपराध घोषित किया गया है । इसके लिए उत्तरदायी व्यक्तियों को चाहे वे राज्य के अधिकारी हों या शासक, दंडित किया जा सकता है । इस प्राकर इस अभिसमय से न्यूरोम्बर्ग निर्णय से उत्पन्न इस निद्धांत को बल मिला कि अपराध व्यक्तियों द्वरा किए जाते हैं , राज्य द्वावा नहीं राज्य तो केवल एक अमूर्त इकाई है, राज्य का कवच पहन कर कोई यक्ति अपने व्यक्तिगत दायित्व से नहीं बच सकता ।
geographically disadvantaged states
भौगोलिक सुविधा वंचित राज्य
इस वर्ग में वे तटीय राज्य, तथा वे राज्य, जो पूर्ण या अद्र्ध रूप से बंद समुद्र के तटों पर स्तित हैं और जिन्हें अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण अन्यि राज्यों के अनन्य आर्थिक क्षेत्र के अतिरिक्त जैविक संसाधनों पर निर्भर रहना पड़ता है, शामिल होते हैं ।
अंतर्राष्ट्रीय विधि में ऐसे राज्यों की स्थिति पर सन् 1974 के कराकस सम्मेलन में विशेष रूप से विचार काय गया । इस वर्ग के राज्यों का यह आग्रह रहा कि अनन्य आर्थिक क्षेत्रों की सार्वभौमिकता से संबंधित प्रश्नों से अलग हटकर इन राज्यों के आर्थिक हितों को संरक्षण दिया जाए क्योंकि इन राज्यों की अर्थव्यवस्था अन्य तटीय राज्यों पर निर्भर रहती है । तृतीय समुद्री विधि अभिसमय, 1982 के 70 वें अनुच्छेद के अनुसार यह व्यवस्था की गई कि इस प्रकार के राज्यों को समानता और औचित्य के आधार पर उस क्षेत्र अथवा उपक्षेत्र के तटवर्ती राज्यों के नन्य आर्थिक क्षेत्रों के अतिरिक्त जैविक संसाधनों के दोहन में भाग लेने का अधिकार होगा । इस भागीदारी की शर्ते और तरीके सभी राज्यों की आर्थिक एवं भौगोलिक परिस्थियों को ध्यान में रखते हुए द्विपक्षीय, उपक्षेत्रीय तथा क्षएत्रीय समझौतों के द्वारा निरूपित कि जाएँगे ।
good offices
सत्प्रयास, सत्सेवा
युद्धकारी या परस्पर विवादी राज्यों के बीच मतभेद का समाधान करने के प्रयोजन से किसी तीसरे राज्य द्वारा किया गया प्रयत्न जो इन युद्धरत अथवा विवादग्रस्त साज्यों को वार्तालाप करने के लिए सहमत करने तक सीमित हो । यह तीसरा राज्य स्वयं वार्ता में प्रत्यक्ष भाग नहीं लेता । जब यह तीसरा राज्य प्रारंभ से या बाद में वार्तालाप में सक्रिय भाग लेने लगे तो इसे सत्सेवा न कहकर मध्यस्थता कहा जाएगा । 1966 में ताशकंद समझौता कराने में सोवियत संघ की भूमिका केवल सत्सेवा की थी ।