1. समीक्षा दर्शन : कांट के दर्शन को कहते हैं, जिसमें बुद्धिवाद और अनुभववाद में समन्वय स्थापित किया जाता है।
2. समीक्षात्मक : दर्शन का वह प्रकार जो संप्रत्ययों की तार्किक विवेचना को ही मुख्य कार्य मानता है जो परिकल्पनात्मक दर्शन (speculative philosophy) के विपरीत है।
Critical Realism
समीक्षात्मक यथार्थवाद
ज्ञानमीमांसा का वह सिद्धांत जिसके अनुसार विषय वस्तु का अस्तित्व ज्ञाता के अस्तित्त्व से स्वतंत्र होता है किंतु ज्ञाता को उसका ज्ञान अपरोक्ष न होकर केवल परोक्ष ही होता हैं। लॉक का दर्शन अथवा ड्रेक (Drake), लव जॉय (Love Joy) इत्यादि अमेरिकी वस्तुवादियों ने इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया है।
Criticism
समीक्षावाद
कांट की ज्ञानमीमांसा में प्रयुक्त-पद। बुद्धिवाद तथा अनुभववाद के दोषों से बचने के लिये ज्ञान के स्वरूप एवं उसकी सीमाओं का परीक्षण।
Critique
मीमांसा (समीक्षा)
आलोचनात्मक परीक्षा या जाँच-पड़ताल; विशेषतः कांट के तीन प्रसिद्ध ग्रन्थों का बोधक-शब्द।
Cross Division
संकर-विभाजन, संकर वर्गीकरण
वह दोष पूर्ण तार्किक विभाजन जिसमें एक साथ एक से अधिक विपरीत व भिन्न विभाजक सिद्धांतों को प्रयुक्त किया जाता है, जैसे उपस्थिति-अनुपस्थिति को आधार बनाकर विभाजन किया जाता है जिसके फलस्वरूप एक व्यक्ति एक ही काल में एक से अधिक उपवर्गों का सदस्य बन जाता है। उदाहरण के लिये छात्र, वैज्ञानिक, राजनीतिज्ञ इत्यादि वर्गों में मनुष्य का विभाजन करना।
Cross-Roads Hypothesis
चतुष्पथ प्राक्कल्पना
मन एवं शरीर के संबंध के विषय में एक सिद्धांत जिसके अनुसार कोई भी वस्तु एक संदर्भ में मानसिक तथा दूसरे संदर्भ में भौतिक कही जा सकती है।
Crucial Experiment
निर्णायक प्रयोग
वह प्रयोग जो किसी एक प्राक्कल्पना को अंतिम रूप से सिद्ध कर देता है और अन्य प्रतिद्वंद्वी प्राक्कल्पनाओं को असिद्ध करने के लिये पर्याप्त है।
Cybernetics
संतात्रिकी, साइबरनेटिक्स
तंत्रिका-तंत्र का कंप्यूटर इत्यादि मनुष्य-निर्मित संज्ञापन तंत्रों से तुलनात्मक अध्ययन करने वाला शास्त्र।
Cyclic Recurrence
चक्रीय-प्रत्यावृत्ति
प्राचीन यूनानी दार्शनिक अनैक्सीमैन्डर (Anaximander) के अनुसार वस्तुओं के प्रकृत (आदिम) द्रव्य से उत्पन्न होने तथा पुनः लौटकर उसी में विलीन होने की शाश्वत आवर्ती प्रक्रिया।
Cynic
सिनिक
1. ई.पू. 5वीं शताब्दी में एण्टीस्थिनीज दार्शनिक द्वारा स्थापित सम्प्रदाय का एक अनुयायी जिसने स्वतंत्रता तथा आत्म-संयम पर विशेष बल दिया।
2. मानव-द्वेषी - व्युत्पत्तिलब्ध अर्थ, इसके अनुसार मानव के सभी कर्म सदैव स्वार्थ प्रेरित होते हैं।