ड्रेगो सिद्धांत
इस सिद्धांत का प्रतिपादन सर्वप्रथम 1902 मे अर्जेन्टीना के विदेश मंत्री ड्रेगो द्वारा काय गया था । उन्होंने इस बात पर बल दिया कि राज्यों का यह कर्तव्य है कि वे अपने नागरिकों के ऋणों की वसूली के लिए किसी दूसरे राज्य के विरूद्ध सशस्त्र बल प्रयोग न केरं । आगे चलकर 1907 के अभिसमय में भी इस सिद्धांत को दोहराया गया था । इस अभिसमय को पोर्टर अभिसमय भी कहा जाता है ।
dualistic theory (=school of dualism)
द्वैतवादी सिद्धांत
द्वैतवादी संप्रदाय
अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय कानूनों के पारस्परिक संबंध के बारे मे इस सिद्धांत अथवा संप्रदाय के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय कानून दो सर्वथा पृथक और स्वतंत्र पद्धतियाँ हैं क्योंकि इनके स्रोत इनके विषय और लागू होने के क्षेत्र बिल्कुल भिन्न हैं ।
इस मत के समर्थकों के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय कानून राष्ट्रों के परिवार मे विकसित हुई प्रथाओं और विभिन्न राज्यों द्वारा आपस में की गी संधियों से जन्म लेता है जबकि राष्ट्रीय कानून राज्यकी सीमाओं के अंदर विकसित हुई प्रथाओं और राज्य की विधायिका द्वारा निर्मित कानूनों से उत्पन्न होता है । अंतर्राष्ट्रीय कानून राज्यों के पारस्परिक संबंधों का नियमन करता है तो राष्ट्रीय कानून राज्य के नागरिकों के आपसी संबंधो तथा उनके और र्जाय के बच संबंधों का नियामक है । राष्ट्रीय कानून, प्रभुसत्ता संपन्न विधायिका द्वारा निर्मित होकर राज्य के नागरिकों पर सर्वोच्च सत्ता रखता है जबकि अंतर्राष्ट्रीय कानून पूर्ण प्रभुता संपन्न राज्यों के पारस्परिक समझौतों, संधियों का परिणाम होता है इसलिए उसके पीछे कोई बाध्यकारी शक्ति नही होती ।
इन पारस्परिक भिन्नताओं के फलस्वरूप द्वैतवादी यह मानते हैं कि राष्ट्रीय कानून में विधिवत रूप से समाविष्ट किए बिना अंतर्राष्ट्रीय कानून के नियम राष्ट्री क्षेत्राधिकार मे लागू नहीं हो सकते और राष्ट्रीय कानून के भाग भी नहीं माने जा सकते । इस सिद्धांत के मुख्य समर्थकों में ओपेनहायम ट्रिपल आंजेलोटी आदि के नाम उल्लेखनीय हैं ।
dual nationality
दोहरी राष्ट्रिकता
दे. double nationality
dwarf state
लघु राज्य
दे. dminitive state.
Economic and Social Council
आर्थिक तथा सामाजिक परिषद्
यह संयुक्त राषट्र के छह प्रधान अंगों में से एक है । इसका उद्देश्य सामाजिक तता आर्थिक उत्थान, मानवीय कल्याण की अभिवृद्धि तथा मानव अधिकार एवं स्वतंत्रताओं को लागू कराना है । प्रारंभ में इसके 18 सदस्य थे जो 1973 तक बढ़कर 54 हो गए थे । इनका चुनाव सं. रा. महासभा द्वारा तीन वर्ष के लिए होतै है और इसके एक तिहाई सदस्य प्रतिवर्ष सेवानिवृत्त हो जाते हैं । लेकिन सुरक्षा परिषद् के पाँचों स्थायी सदस्य इसके लगातार निर्वाचित सदस्य रहते हैं ।
economic sanctions
आर्थिक प्रतिबंध,
आर्थिक शास्तियाँ
चार्टर के अनुच्छेद 41 के अंतर्गत संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद द्वारा अपने निर्णयों को बाध्यकारी बनाने के उद्देश्य से अपनाए जाने वाले उपायों में से एक उपाय जिनका लक्ष्य अपचारी राज्य के विरूद्ध आर्थिक दबाव डालना होता है । इन प्रतिबंधों में राज्य के आयात - निर्यात पर प्रतिबंध लगाया जाना मुख्य रूप से महत्वपूर्ण है । इसका उद्देश्य राज्य के आयात - निर्यात व्यापार पर प्रतिबंध लगाकर उसे सुरक्षा परिषद् के निर्णयों को मानने के लिए विवश करना है । अगस्त, 1990 में सुरक्षा परिषद् के निर्देश पर हराक के विरूद्ध आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए थे जिनका लक्ष्य इराक को कुवैत से अपनी सेनाओं को हटा लेने के लइ विवश करना था । मई. 1992 में लीबिया के विरूद्ध भी आंशिक रूप से आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए । यह व्यवस्था कोई नई व्यवस्था नहीं है । राष्ट्र संघ () के काल में भी राष्ट्र संघ की परिषद् द्वारा राज्यों के विरूद्ध इस प्रकार के आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए थे ।
effective nationality
प्रभावी राष्ट्रिकता
दोहरी राष्ट्रीयता वाले व्यक्त्यों के संबंध में 1930 के हेग सम्मेलन में अपनाए गए एक अभिसमय का वह नियम जिसके अनुसार ऐसे व्यक्ति को केवल उस देश का नागरिक माना जाएगा जहां वह स्वभावतः और मुख्यतः निवासि करता हो अथवा उसकी परिस्थितियों को देखते हुए जिस देश से वह घनिष्ठतम रूप से जुड़ा हो । ऐसे देश की नागरिकता ही उसकी प्रभावी नागरिकता समझी जाएगी ।
effective occupation
प्रभावी कब्जा,
प्रभावी आधिपत्य
किसी स्वामित्वहीन प्रदेश किसी राज्य के स्वामित्व का दावा उसी दशा में वैध माना जा सकता है जब उसका उस प्रदेश पर प्रभावकारी आधीपत्य हो जिसका अर्थ है उस प्रदेश में उसकी सत्ता का निर्बाध - निर्वारोध और निरंतर प्रदर्शन । दूसरे शब्दों में केवल शाब्दिक अथवा कागजी दावे से आधिपत्य प्रभावकारी नहीं माना जा सकता । आधिपत्य को प्रभावकारी बनाने के लिए उस प रदेश में आधिपत्यकर्ता राज्य द्वारा किसी न किसी मात्र मे शासन कार्यों का संपादन (जैसे कर - वसूली, पुलिस व्यवस्था ) भी आवश्यक है । अंतर्राष्ट्रीय विधि के अनुसार केवल प्रभावनी आधिपत्य ही वैध माना जाता है ।
embargo
घाटबंदी, व्यापार प्रतिषेध
अंतर्राष्ट्रीय विधि में एक विशिष्ट प्रकार का प्रत्याघात जिसका तात्पर्य है पीड़ित राज्य द्वारा थथाकथित अपराधी राज्य के जहाज़ों को अपने बंदरगाहों में न तो प्रवेश करने देना और न ही वहाँ से प्रस्थान करने की अनुमति देना है । मूल रूप में इस प्रकार के प्रतिबंध केवल जलपोतों पर ही लगाए जाते थे किंतु वर्तमान में इसका विषयक्षेत्र विस्तृत हो गाय है और आयात -न र्यात पर लगाए जाने वाले प्रतिबंध भी इसकी परिसीमा में माने जाते हैं जैसे शस्त्रों की बिक्री कर प्रतिबंध ।