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Braj Bhasha Soor-Kosh (Vol-VI)

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पघिलि
पिघलकर।
उ.- धोए छूटत नहीं यह कैसेहु मिलैं पघिलि ह्वै मैन- पृ. ३२३ (११)।
क्रि. अ.
[हिं. पघलना]

पचएँ
पाँचवें, पाँचवें स्थान पर।
उ.- पचएँ बुध कन्या कौ जौ है, पुत्रनि बहुत बढ़ै हैं-१०-८६।
वि.
[हिं. पाँचवाँ]

पचगुना
पाँच बार अधिक।
वि.
[सं. पंचगुण]

पचड़ा
झंझट, बखेड़ा, प्रपंच।
संज्ञा
[हिं. प्रपंच + ड़ा]

पचड़ा
एक तरह का गीत।
संज्ञा
[हिं. प्रपंच + ड़ा]

पचत
दुखी होता है, हैरान होता है।
उ.- अपनौ मुख मसि-मलिन मंदमति, देखत दर्पन माहीं। ता कालिमा मेटिबे कारन, पचत पखारत छाहीं-२-२५।
क्रि. अ.
[हिं. पचना]

पचतूरा
एक तरह का बाजा।
संज्ञा
[देश.]

पचतोलिया
पाँच तोले का।
वि.
[हिं. पाँच + तोला]

पचन
पकने या पकाने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[सं.]

पचन
अग्नि।
संज्ञा
[सं.]


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