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Braj Bhasha Soor-Kosh (Vol-VI)

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पगाह
प्रभात, तड़का।
संज्ञा
[फ़ा.]

पगि
अनुरक्त हुआ, प्रेम में डूबा, मग्न हुआ।
उ.- बिषय-भोग ही मैं पगि रह्यौ। जान्यौ मोहिं और कहुँ गयौ-४-१२।
क्रि. अ.
[हिं. पगना]

पगि
लीन हुए।
उ.- इहीं सोच सब पगि रहे, कहूँ नहीं निरबार-५८९।
क्रि. अ.
[हिं. पगना]

पगिया
पगड़ी।
उ.- (क) एते पर अँखियाँ रससानी अरू पगिया लपटानी-१६६७। (ख) सिर पगिया बीरा मुख सोहै सरस रसीले दोल-२४१४।
संज्ञा
[हिं. पगड़ी]

पगु
डग, कदम।
संज्ञा
[हिं. पग]

पगुराना
पागुर करना।
क्रि. अ.
[हिं. पागुर]

पगे
अनुरक्त हुए।
उ.- अंग अंग अवलोकन कीन्हों कौन अंग पर रहे पगे-१३१८।
क्रि. अ.
[हिं. पगना]

पघा
पशु बाँधने की रस्सी।
संज्ञा
[सं. प्रगृह]

पघिलना
पिघलना।
क्रि. अ.
[हिं. पिघलना]

पघिलाना
पिघलाना।
क्रि. स.
[हिं. पिघलना]


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