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Definitional Dictionary of International Law (English-Hindi)
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security pact
सुरक्षा अनुबंद दो या अधिक राज्यों के बीच ऐसी अंतर्राष्ट्रीय संधि (या समझौता) जो उन राज्यों पर किसी शुत्रु राज्य द्वारा सशस्त्र आक्रमण किए जाने की स्थिति में, उन राज्यों को एक - दूसरे की सैनिक अन्यि प्रकार की सहायता प्रदान करने के लिए वचनब्दध करती है । बहुधा ऐसे अनेक समझौते क्षेत्रीय स्त्र पर हुए हैं जैसे नाटो, सीटो, वारसा संधि आदि । अंतर्राष्ट्रीय विधि की दृष्टि से ये सामूहिक (आत्म) रक्षा के संगठनात्मक स्वरूप हैं ।

servitude
सुविधाभार यह व्यवस्था मूलतः एक साम्राज्यवादी व्यवस्था थी जिसके अनुसार यूरोपीय साम्राज्यावादी राज्य एशियाई - अफ्रीका राज्यों में स्थानीय शसकों से संधियों अथवा समझौतों के द्वारा अपने नागरिकों तथा व्यापारियों के लिए विशेष सुविधाएँ या रियायतें प्राप्त कर लेते थे । इस प्रकार की सुविधाओं या रियायतों को सुविधाभार कहा जाता था । ये सुविधाएँ या रियायतें प्रायः स्थानीय स्वतंत्रता और क्षेत्राधिकार का खंडन करती थीं जैसे विदेशी नागरिकों का स्थआनीय नायायलय के क्षेत्राधिकार से उन्मुक्त होना अथवा स्थानीय जल क्षेत्रों और भूभागीय समुद्र में विदेशियों को मछली पकड़ने का अधिकार दिया जाना अथवा विदेशी सेनाओं को पारगमन का अधिकार दिया जाना अथवा स्थानीय प्रदेश के किसी भाग के किलेबंदी करने पर प्रतिबंध लगाना आदि । यह उलेलेखनीय है कि अपनिवेशवाद के पतन के साथ इस प्रकार के संधि - मसझौते समाप्त हो गए हैं ।

sources of international law
अंतर्राष्ट्रीय विधि के स्रोत अंतर्राष्ट्रीय विधि के स्त्रोत से तात्पर्य है वे पद्धतियाँ और प्रक्रियाएँ जिनके द्वारा अंतर्राष्ट्रीय व्यवहार के नियम निरूपित होते हैं और क़ानूनी बल प्राप्त करते हैं । ओपेनहायम के मतानुसार अंतर्राष्ट्रीय विधि का एकमात्र स्रोत है राज्यों की पारस्परिक सहमति । साम्यवादी लेखक भी राज्यों की पारस्परिक सहमति को अंतर्राष्ट्रीय विधि का अनन्य स्रोत मानते आए हैं । ओपेनहायम के मतानुसार, चूँकि राज्यों की सहमति दो प्रकार से व्यक्त की जा सकती है, अतः अंतर्राष्ट्रीय विधि के दो स्रोत हैं । 1. संधइयाँ जो राज्यों की स्पष्ट सहमति को प्रत्यक्ष और स्पष्ट लिखित रूप से व्यक्त करती हैं और 2. प्रथाएँ जो राज्यों की सहमति के अलिखित, परोक्ष एवं अव्यक्त स्वरूप हैं । सन्म 1945 के अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय की संविधि के अनुच्छेद 38 के अंतर्गत अंतर्राष्ट्रीय विधि के स्रोतों को दो भागों में विभक्त किया गया है । (1) प्रधान स्रोत और (2) सहायक स्रोत । प्रधान स्रोतों में संधियां, प्रथाएं और सभ्य राजयों द्वारा मान्यता प्राप्त विधि के सामान्य नियम सम्मिलित किए गए हैं । सहायक स्रोतों में न्यायिक निर्णय और विधिवेत्ताओं की रचनाएँ रखी गई हैं ।

South - East Asia Treatuy Organisation (SEATO)
दक्षिण - पूर्व एशिया संधि संगठन (सीटो) सन् 1954 में एक संधि पर हस्ताक्षर हुए जिसका लक्ष्य सदस्य - राज्यों में से किसी एक पर आक्रमण होने की दशा में सामूहिक रूप से उस आक्रमण का सामना करने के लिए इन राज्यों के वचनबद्ध करन था । इस संधि पर आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, फ्रांस, न्यूजीलैंड, पाकिस्तान, फिलीपाइन्स, थाईलैंड और संयुक्त राज्य अमेरिका ने हस्ताक्षर किए थे । इस संधि की व्यवस्था को प्रभावकारी बनाने के लिए सन् 1955 मे एक संगठन की स्थापना की गई जिसे दक्षिण - पूर्व एशिया संधि संगठन कहते हैं । संधि का उद्देश्य दक्षिण - पूर्वी एशिया और दक्षिण - पश्चिमी प्रशांत महासागर के पूरे क्षेत्र में बाह्य आक्रमण अथवा आंतरिक विध्वंस की स्थिति मे सामूहिक रूप से रक्षात्मक कार्रवाई करना था । क विशेष प्रोटोकोल के अंतर्गत संधिगत क्षेत्र में कम्बोडिया लाओस और दक्षिणी वियतनाम की सुरक्षा को भी शामिल कर लिया गया । इस संगठन का मुख्यालय बैंकाक में था । परंतु अब यह संगठन वस्तुतः मृतप्राय है ।

South - South Dialogue
दक्षिण - दक्षिण संवाद ब्रांट प्रतिवेदन से उत्साहित होकर और उत्तर - दक्षिण वार्ता में कोई प्रगति न देखकर, सन् 1982 में भारत क तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने विकासशील देशों में से कुछ चुने हुए देशों की एक बैठक बुलाने का निश्चय किया । इस बैठक के दो उद्देश्य थे :- 1.तेल के मूल्यों में लगातार वृद्धि के कारण आयात की गई वस्तुओं, विशएषकर मशीनों के मूल्य में वृद्धि और इसके परिणामस्वरूप विकासशील देशों के विदेशी मुद्रा भंडार का बराबर घटते जाना उनके व्यापारिक असंतुलन का लगातार बढ़ते जाना, विकासार्थ विदेशी सहायता का घटते जाना, श्रृणों का भार लगातार बढ़ते जाना, खाद्यान्नों में कमी आदि - इन सब प्रवृत्तियों के संदर्भ में उत्तर दक्षिण वार्ता से हटकर और उससे स्वतंत्र इन समस्याओं के समाधान के विष्य में विचार - विमर्श करना; और 2. उत्त्र - दक्षिण वार्ता विकसित और विकासशील राज्यों के पारस्परिक आर्थिक संबंधों अर्थात व्यापार, मुद्र, प्रौद्योगिकी स्थानांतरण, विकास - सहायता, की संभावनाओं और मुद्दों पर विचार करना । भारत का विचार केवल 27 देशों को इस सम्मेलन में आमंत्रित कनरे का था, किंतु यह संख्या बढ़कर 43 की हो गई । यह बैठक नई दिल्ली में 22- 25 फरवरी, 1982 तक चली । इस प्रकार विश्वव्यापी आर्थिक समस्याओं पर उस वार्ताक्रम का प्रारंभ हुआ जिसे प्रायः दक्षिण - दक्षिण संवाद कहा जाता हैं । इस घटना का एक परिणाम उस क्षेत्रीय संगठन की स्थापना है जिसे दक्षेस या सार्क काहा जाता है । परंतु दक्षिण - दक्षिण संवाद के फलस्वरूप विकासशील देशों के विकास के लिए पारस्परिक सहयोग एवं व्यापार की कोई व्यापक योजना प्रस्तुत नहीं हो सकी है । केवल द्विपक्षीय संभंधों में अधिक सहयोग और गतिविधियों प्रोत्साहन मिला है ।

sovereignty
संप्रभुता राजनीति शास्त्र में संप्रभुता से तात्पर्य सर्वौच्च शक्ति से है । यह राज्य का अनिवार्य तत्व है और इसी कारण राज्यों को आपस में समान माना जाता है । संप्रभुता के दो पक्ष हैं - आंतरिक और बाह्य । अंतर्राष्ट्रीय विधि का संबंध संप्रभुता के बाह्य पक्ष से है जिसका अर्थ है कि राज्य अपने अंतर्राष्ट्री संबंधों के संचालन में पूर्ण रूप से शक्ति संपन्न और संवतंत्र है । किसी राज्य को कीस दूसरे राज्य के बाह्य संबंधों के संचालन में हस्त्क्षेप का अधिकार नही है । एक विवाचन के मामले मे स्विट्रज़रलैंड के न्यायाधीश मैक्स हयूबर ने लिखा था कि राष्टरों के पारस्परिक संबंधों में संप्रभुता का अर्थ है स्वतंत्रता अर्थात अपने बाह्य संबंधों के संचालन की स्वतंत्रता ।

space law
अंतरिक्ष विधि, अंतरिक्ष, क़ानून 1957 में सोवियत यान स्पूतनीक के अंतरिक्ष मे भेजे जाने से मानव प्रयास के एक नए क्षएत्र का द्वारा खुल गया जिसे बाह्य अंतरिक्ष कहा जाता है । तुरंत ही राज्यों के मध्य इस भावना ने जन्म लिया कि अंतरिक्ष के अंवेषण के लिए सभी राज्यों को समान अधइकार होना चाहिए और अंतरिक्ष अधाःस्थित राज्य के प्रादेशिक क्षेत्राधिकार में नहीं होना चाहिए । इस भावना कोमूर्त रूप देने के लिए संयुक्त राष्ट्र की माहासबा ने एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें अंतरिक्ष को महा समुद्रों के समान सामुदायिक प्रदेश घोषित किया गया और अंतरिक्ष की व्यवस्था संबंधी सिद्धांतों का भी निरूपण किया गया । 1967 में इन सिद्धांतों को वैधानिक रूप देने के उद्देश्य से एक संधि हुई जिसे संक्षेप मे अंतरिक्ष संधि कहते हैं । इस संधि से उस नियमावली का प्रारंभ होता है जिसे अंतरिक्ष विधि कहा जाता है । अगले वर्ष अर्तात 1968 में अंतरिक्ष यात्रियों की सहायता, उनकी वापसी तथा अंतरिक्ष में प्रक्षेपित वस्तुओं के संबंध में एक समझौते पर हस्ताक्षर हुए । इस समझौते में यह काह गया कि अंतरिक्ष यात्रियों को तरिक्ष में मानव जाति के दूत समझा जाना चाहिए और उनके विपदाग्रस्त होने की दशा मे सभी राज्यों को उनकी सहायता करने के लिए तत्पर रहना चाहिए । फिर 1972 में एक अन्य अनुबंध पर हस्ताक्षर हुए जिसमें अंतरिक्ष में प्रक्षेपित वस्तुओं से हुई हानि के लिए प्रक्षेपक राज्य के अंतर्राष्ट्रीय दायित्व की व्यवस्था की गई । इस संधि व समझौतों और ग घोषणापत्रों के समूह को अंतरिक्ष विधि कहा जा सकता है । यह7 विधि पिछले 35 वर्षों के विकास का प्रतिफल है और यह अभी भी वाकसमान है ।

space treaty
अन्तरिक्ष संधि दे. Space law.

specific adoption theory
विशिष्ट अंगीकरण सिद्धांत स्टार्क आदि लेकखों का मत है कि अंतर्राष्ट्रीय विधि के नियमों को निर्धारित राष्टरीय प्रक्रिया के द्वारा अंगीकार करके अर्थात् इनको राष्ट्रीय विधि में विधिवत् अंगीकार करके ही इन्हें राष्ट्रीय विधि का भाग बनाया जा सकता है ।

sphere of influence
प्रभाव - क्षेत्र उन्नीसवीं शताब्दी मे जब यूरोप के अनेक देश अपने साम्राज्य का प्रसार करने और नए - नए उपनिवेशों की खोज करने में संलग्न थे तब उनके मध्य इस भावना ने जन्म लिया कि इस प्रक्रिया में अनावश्यक प्रतिद्वांद्विता और संघर्ष से बचा जाए और संसार के अनेक क्षेत्रों को निर्धारित कर दिया जाए जहाँ प्रभुत्व प्रस्थापित करने का निर्धारित राज्य को वरीयता के आधार पर अधिकार हो । इस तरह से विभिन्न राज्यों के कुछ क्षेत्र निर्धारित हो गए जिन्हें उनका प्रभाव - क्षेत्र कहा जाने लगा और जिसमें किसी अन्य राज्य का हस्तक्षेप राजनीतिक दृष्टि से अनुचित समझा जाने लगा । दूसेर महायुद्ध में इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ते हुए सोवियत संघ और पश्चिमी राष्ट्रों के पारस्परिक प्रबाव - क्षेत्र भी वस्तुतः निर्धारित हो गए जिन्हें माल्टा समझौते (1944) ने भी मान्यता दी ।


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