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Braj Bhasha Soor-Kosh (Vol-VI)

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पकरी
धारण की, अपनायी, पकड़ी।
उ.-अधम समूह-उधारन-कारन तुम जिय जक पकरी-१-१३०।
क्रि. स.
[हिं. पकड़ना]

पकरी
इस तरह पकड़ी कि छूट न सके।
उ.-(क) दुस्सासन अति दारुन रिस करि, केसनि करि पकरी-१-२५४। (ख) मन-क्रम बचन नंदनंदन उर यह द्दढ़ करि पकरी-३३६०।
क्रि. स.
[हिं. पकड़ना]

पकरै
पकड़ता है, (हाथ में ) लेता है, ग्रहण करता है।
उ.-जद्यपि मलय-बृक्ष जड़ काटै, कर कुठाक पकरै। तऊ सुभाव न सीतल छाँड़ै, रिपु-तन-ताप हरै-१-१-११७।
क्रि. स.
[हिं. पकड़ना]

पकरैगौ
पकड़ेगा, थामेगा, कहेगा।
उ.-जो हरि-ब्रत निज उर न धरैगौ। तो को अस माता जु अपुन करि करे कुठाँव पकरैगौ-१-७५।
क्रि. स.
[हिं. पकड़ना]

पकरयौ
पकड़ लिया, अधिकार में किया, बंदी बनाया।
उ.-रिस भरि गए परम किंकर तब, पकरयौ छूटि न सकौं-१-१५१।
क्रि. स.
[हिं. पकड़ना]

पकवान
घी में तलकर बनाये गये खाद्य पदार्थ जो कई दिन तक खाये जा सकते हैं।
संज्ञा
[सं. पक्कान्न]

पकवाना
पकानें का काम कराना, पकाने को प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. पकाना]

पकवान्ह
पकवान।
उ.-अन्नकूट बिधि करत लोग सब नेम सहित करि पकवान्ह-९१०।
संज्ञा
[हिं. पकवान]

पकाई
पकाने की क्रिया, भाव या वेतन।
संज्ञा
[हिं. पकाना]

पकाए
आँच से तपा कर पका दिये।
उ.-बिधि-कुलाल कीने काचे घट ते तुम आनि पकाए-३१९१।
क्रि. स.
[हिं. पकाना]


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