logo
भारतवाणी
bharatavani  
logo
Knowledge through Indian Languages
Bharatavani

Braj Bhasha Soor-Kosh (Vol-X)

Please click here to read PDF file Braj Bhasha Soor-Kosh (Vol-X)

स्वयमेव
आप ही, स्वयं ही।
क्रि. वि.
(सं.)

स्वर
प्राणी के कंठ से अथवा किसी पदार्थ पर आघात होने से निकलनेवाला शब्द जिसमें कोमलता, कटुता आदि गुण हों।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वर
संगीत में वे सात निश्चित ध्वनियाँ जिनका स्वरूप, तीव्रता आदि निश्चित है, सुर।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.-चाँपति चरन जननि अप अपनी कछुक मधुर स्वर गाये-सारा. १९६।
मुहा.- स्वर उतारना-सुर घीमा करना। स्वर चढ़ाना-सुर तेज करना। स्वर निकालना- सुर उत्पन्न करना। स्वर भरना-अभ्यास के लिए एक ही सुर बार-बार निकालना। स्वर मिलाना-(बाद्य आदि के) सुनायी देते स्वर के अनुसार सुर निकालना)

स्वर
व्याकरण में वह वर्ण जिसका उच्चारण बिना किसी वर्ण की सहायता के हो और जो किसी व्यंजन के उच्चारण में सहायक हो।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वर
आकाश।
संज्ञा
पुं.
(सं.स्वर)

स्वर
स्वर्ग़।
संज्ञा
पुं.
(सं.स्वर)

स्वरग
स्वर्ग़।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वर्ग)

स्वर-ग्राम
संगीत के सातों स्वरों का समूह, सप्तक।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वरता
स्वर का भाव या धर्म।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वर-पात
उच्चारण करते समय शब्द के किसी वर्ण पर रुकना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)


logo