प्राणी के कंठ से अथवा किसी पदार्थ पर आघात होने से निकलनेवाला शब्द जिसमें कोमलता, कटुता आदि गुण हों।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
स्वर
संगीत में वे सात निश्चित ध्वनियाँ जिनका स्वरूप, तीव्रता आदि निश्चित है, सुर।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.-चाँपति चरन जननि अप अपनी कछुक मधुर स्वर गाये-सारा. १९६।
मुहा.- स्वर उतारना-सुर घीमा करना। स्वर चढ़ाना-सुर तेज करना। स्वर निकालना- सुर उत्पन्न करना। स्वर भरना-अभ्यास के लिए एक ही सुर बार-बार निकालना। स्वर मिलाना-(बाद्य आदि के) सुनायी देते स्वर के अनुसार सुर निकालना)
स्वर
व्याकरण में वह वर्ण जिसका उच्चारण बिना किसी वर्ण की सहायता के हो और जो किसी व्यंजन के उच्चारण में सहायक हो।