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Braj Bhasha Soor-Kosh (Vol-X)

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स्वकीय
अपना, निज का।
वि.
(सं.)

स्वकीया
वह नीयिका जो केवल अपने ही पति से प्रेम करती हो, पर पुरुष का ध्यान तक न करती हो।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वक्ष
साफ, निर्मल।
वि.
(हिं. स्वच्छ)

स्व-ख्यापन
स्वयं ही अपनी प्रशंसा करके अपने को प्रसीद्ध करना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वगत
आप ही आप या स्वतः (कुछकहना या बोलना)।
क्रि. वि.
(सं.)

स्वगत
अपने में आया या लाया हुआ, आत्मगत।
वि.

स्वगत
मन में आया हुआ, मनोगत।
वि.

स्‍वगत कथन
नाटत में अन्य पात्रों की उपस्थिति में किसी पात्र का इस प्रकार कुछ कहना जौसे वह अपने से ही या अपने मन में कुछ कह रहा है जिसे दर्शक तो सुन लें, परंतु मंच पर उपस्थित पात्र न सुनें। इसे 'अश्राव्‍य' या 'आत्मगत' भी कहते हैं।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वच्छंद
जो किसी के नियंत्रण में न ही, स्वतंत्र, स्वाधीन।
वि.
(सं.)
उ.- यह तौ जाइ उनै उपदेसी सनकादिक स्वच्छंद-२४०२।

स्वच्छंद
मनमाना काम या आचरण करनेवाला, निरंकुश।
वि.
(सं.)


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