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Braj Bhasha Soor-Kosh (Vol-VI)

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पंगा
बेकाम।
वि.
[हिं. पंग]

पंगु, पंगुल
जो पैर से चल न सकता हो, लँगड़ा।
उ.- जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै-१-१।
वि.
[सं.]

पंगु, पंगुल
शनिदेव।
संज्ञा
[सं.]

पंच
पाँच, चार और एक।
वि.
[सं.]

पंच
पाँच या अधिक व्यक्तियों का समाज जनता।
संज्ञा

पंच
पंच की भीख- सर्वसाधारण का आशीर्वाद, जनता की कृपा। उ.-(क) मैं- मेरी कबहूँ नहिं कीजै, कीजै पंच-सुहातौ-१-३०२। (ख) राज करैं वे धेनु तुम्हारी, नेतहिं कहति सुनाई। पंच की भीख सूर बलि मोहन कहति जसोदा माई-४५५। पंच की दुहाई- समाज से धर्म या न्याय करने की पुकार। पंच-परमेश्वर- समाज का मत ईश्वर का वाक्य है।
मु.

पंच
किसी बात का न्याय करने के लिए चुने गये पाँच या अधिक आदमी।
संज्ञा

पंचक
पाँच का समूह।
संज्ञा
[सं.]

पंचक
पाँच नक्षत्र जिनमें नये कार्य का करना मना है।
संज्ञा
[सं.]

पंचकन्या
पाँच नारियाँ जो विवाहादि होने पर भी कन्यावत् मान्य हैं-अहल्या, द्रौपदी, कुंती, तारा और मंदोदरी।
संज्ञा
[सं.]


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