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Braj Bhasha Soor-Kosh (Vol-VI)

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न्हाऐं
नहाने से, स्नान करने से।
उ.- जो सुख होत गुपालहिं गाऐं। सो सुख होत न जप तप कीन्हैं, कोटिक तीरथ न्हाऐं -२-६।
क्रि. अ.
[हिं. नहाना]

न्हात
स्नान करते-करते, नहाते नहाते।
उ.- दुरबासा दुरजोधन पठयौ पांडव-अहित बीचारी। साकपत्र लै सबै अघाए, न्हात भजे कुस डारी-१-१२२।
क्रि. अ.
[हिं. नहाना]

न्हान
स्नान, नहान।
उ.- गौतम लख्यौ, प्रात है भयौ। न्हान काज सो सरिता गयौ-६-८।
संज्ञा
[हिं. नहाना]

न्हाना
स्नान, करना।
क्रि. अ.
[हिं. नहाना]

न्हावन
स्नान, नहाना।
उ.- एक बार ताके मन आई। न्हावन काज तढ़ाग सिधाई-९-१७४।
संज्ञा
[हिं. नहाना]

न्हावै
नहाता है।
उ.- मानसरो-वर छाँड़ि हंस तट काग-सरोवर न्हावै-२-१३।
क्रि. अ.
[हिं. नहाना]

न्हाहिं
नहाते हैं।
उ.- हंस उज्लज पंख निर्मल अंग मलि-मलि न्हाहिं-१-३३८।
क्रि. अ.
[हिं. न्हाना]

न्हैये
नहाइए।
उ.- चलौ सबै कुरुक्षेत्र तहाँ मिलि न्हैये जाई-१० उ.-१०५।
क्रि. अ.
[हिं. नहाना]

प वर्ग का पहला और हिंदी का इक्कीसवाँ व्यंजन; वह स्पर्श ओष्ठ्य वर्ण है।

पंक
कीच, कीचड़।
उ.- कुंभकरनतन पंक लगाई, लंक बिभीषन पाइ-९-८३।
संज्ञा
[सं.]


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