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Braj Bhasha Soor-Kosh (Vol-VI)

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न्यारी
अलग, पृथक।
उ.- एक ही संग हम तुम सदा रहति, आजु ही चटकि त भई न्यारी -१२००।
वि.
[हिं. न्यारा]

न्यारे
दूर, अलग।
उ.- क्यौं दासी सुत कैं पग धारे ? ¨¨¨¨¨। सुनियत हीन, दीन, बृषली-सुत, जाति-पाँति तैं न्यारे-१-२४२।
क्रि. वि.
[हिं. न्यारा]

न्यारे
और ही, अलग-अलग, भिन्न-भिन्न।
उ.- (क) बहुत भाँति मेवा सब मेरे षटरस व्यंजन न्यारे-४९४। (ख) मथुरा के द्रुम देखियत न्यारे-२७८१।
क्रि. वि.
[हिं. न्यारा]

न्यारो, न्यारौ
दूर, पास नहीं।
उ.- न्यारो करि गयंद तू अजहूँ-२५८९।
क्रि. वि.
[हिं. न्यारा]

न्यारो, न्यारौ
अलग, पृथक।
उ.- पतित समूह सबै तुम तारे, हुतौ जु लोक भरथौ। हौं उनतैं न्यारौ करि डारथौ, इहिं दुख जात मरथौ-१-१५।
क्रि. वि.
[हिं. न्यारा]

न्यारो, न्यारौ
साथ में नहीं।
उ.- जाति-पाँति कुलहू तैं न्यारौ, है दासी कौ जायौ-२१-२४४।
क्रि. वि.
[हिं. न्यारा]

न्यारो, न्यारौ
निराला, अनोखा।
उ.- कमल नैन काँधे पर न्यारो पीत बसन फहरात-२५३९।
क्रि. वि.
[हिं. न्यारा]

न्याव
आचरण नीति।
उ.- ऊधो, ताको न्याव है जाहि न सूझे नैन।
संज्ञा
[सं. न्याय]

न्याव
उचित बात।
संज्ञा
[सं. न्याय]

न्याव
सत्-असत् बुद्धि।
संज्ञा
[सं. न्याय]


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