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Braj Bhasha Soor-Kosh (Vol-X)

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स्रम-बिंदु
पसीना, स्वेद।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रम + बिंदु)

स्रम-सीकर
पसीना।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रम + सीकर)

स्रमि
थककर।
क्रि.अ.
(हिं. स्रमना)
उ.- उर भयौबिबस कर्म-निरअंतर स्रमि सुख-सरनि चहथौ-१-१६२।

स्रमिक
मजदूर।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रमिक)

स्रमित
अधिक श्रम के कारण थका हुआ या शिथिल।
वि.
(सं. श्रमित)
उ.- स्रमित भयौ, जैसे मृग चितवत देखि - देखि भ्रम-पाथ-१-२०८।

स्रमिष्ठा
दानवराज बृषपर्वा की पुत्री स्रमिष्ठा जो शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी की दासी बनकर राजा ययाति के यहाँ गयी थी और उनसे प्रम पाकर पुत्रवती हुई थी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)
उ.- कह्थौ स्रमिष्ठा अवसर पाइ। रति कौ दान देह मोहिं राइ।¨¨¨¨। कहथौ, स्रमिष्ठा, सुत कहँ पाए। उनि कहथौ, रिषि किरपा तैं जाए-९-१७४।

स्रवण
बहने की क्रिया या भाव, बहाव,प्रवाह।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्त्रवण
गर्भपात।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्रवत
बहता या टपकता है।
क्रि.अ.
(हिं. स्रवना)
उ.- स्रवत स्रोनकन - १-२७३।

स्रवत
गिराता, बहाता या टपकता है।
क्रि.स.
उ.- (क) अमृत हूँ तैं अमल अति गुन स्रवत निधि आनंद -९-१०। (ख) परसत आनन मनु रवि कुंडल अंबुज स्रवत सीप-सुत-जोटी-१०-१८७।


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