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Braj Bhasha Soor-Kosh (Vol-VI)

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न्यवछावार, न्यवछावरि, न्यवछावरी
न्यवछावर करति- उत्सर्ग करती हैं, वारती हैं। उ.- सूरदास प्रभु की छबि ब्रज ललना निरखि थकित तन-मन न्यवछावरि करति आनंद बर ते -२३५३।
मु.

न्यवछावार, न्यवछावरि, न्यवछावरी
निछावर या वाराफेरा की वस्तु।
उ.-मुक्ति-भुक्ति न्यवछावरी पाई सूर सुजान- उ. १० उ.-८।
संज्ञा
[हिं. निछावर]

न्यवछावार, न्यवछावरि, न्यवछावरी
इनाम, नेग।
संज्ञा
[हिं. निछावर]

न्यस्त
रखा हुआ।
वि.
[सं.]

न्यस्त
छोड़ा-त्यागा हुआ।
वि.
[सं.]

न्यस्त
धरोहर या अमानत रूप में रखा हुआ।
संज्ञा

न्याइ, न्याउ
उचित या नियमानुकूल बात, नीति।
उ.- सूरदास वह न्याउ निवेरहु हम तुम दोऊ साहु-३३६८।
संज्ञा
[सं. न्याय]

न्याइ, न्याउ
दो पक्षों के बीच निर्णय, निष्पक्ष निश्चय।
उ.- कौन करनी घाटि मोसौं, सो करौं फिरि काँधि। न्याय कै नहिं खुनुस कीजै, चूक पल्लै बाँधि-१-१९९।
संज्ञा
[सं. न्याय]

न्याति
रीति, प्रणाली, ढंग।
उ.- बैठे नंद करत हरि पूजा, बिधिवत् औ बहु भाँति। सूर स्याम खेलत तैं आए, देखत पूजा न्याति-१०-२६०।
संज्ञा
[सं. ज्ञाति, प्रा. णाति]

न्याति
जाति।
उ.- मधुकर कहा कारे की न्याति। ज्यौं जलमीन कमल मधुपन कौ छिन नहिं प्रीति खटाति-३१६८।
संज्ञा
[सं. ज्ञाति, प्रा. णाति]


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