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Braj Bhasha Soor-Kosh (Vol-X)

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स्रग्विणी
एक वर्णवृत्त।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्रग्‍वी
जो माला पहने हो।
वि.
(सं. स्रग्विन)

स्रज, स्रज्
फूल-माला।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. स्रक)

स्रजना, स्रजनो
रचना, बनाना।
क्रि.स.
(हिं. सृजना)

स्रजात
एक राजा जिसकी पुत्री सुकन्या का विवाह च्यवन ऋषि से हुआ था।
संज्ञा
पुं.
(सं. शर्याति)
उ.-ता आस्रम स्रजात नृप गयो।¨¨¨¨¨¨तब स्रजात रानी सौं कही। जब तै कन्या ऋषि कौं दई-९-३।

स्रद्धा
आस्था, आदरपूर्ण और पूज्य भाव।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्रद्धा)
उ.- सुमति सुरूप सँचै स्रद्धा-बिधि उर-अंबुज अनुराग -२-१२।

स्रम
शरीर को थकानेवाला काम, परिश्रम।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रम)
उ.- (क) चित चकोर गति करि अतिसय रति तजि स्रम सघन बिषय लोभा-१-६९।
मुहा.- स्रम साधना- (१) कठिन परिश्रम करना।

स्रम
निरंतर अभ्यास करना। स्रम साधै-निरंतर अभ्यास करते हैं।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रम)
उ.- मुक्ति हेत जोगी स्रम साधै असुर बिरोधैं पावै-१-१०४।

स्रम
जीविका-निर्वाह या घनोपार्जन के लिए किया जानेवाला काम।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रम)
उ.- जन जानत जदुनाथ जिते जन निज भुज-स्रम सुख पायौ-१-१५।
मुहा.- श्रम ठयना-बड़ी लगन से कठिन परिश्रम करना। श्रम ठयौ-बड़ी लगन से निरंतर परिश्रम किया। उ.- पिता सो तासु काल-बस भयौ। भ्रातनि हूँ स्रम बहु बिधि ठयौ-५-३।

स्रम
थकावट, क्‍लांति।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रम)
उ.- जिय करि कर्म जन्म बहु पावै। फिरत-फिरत बहुतै स्रम आवै-५-४।


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