तटस्थ एकतत्त्ववाद, निर्विशेष एकतत्त्ववाद
(1) वह मत कि परम सत्ता न मानसिक है, न भौतिक और जो एक है, और दोनों अर्थात् मानसिक और भौतिक से उभय है। मनस् और जड़ उस एक सत्ता के दो गुण मात्र हैं और जो स्वतंत्र एवं निरपेक्ष नहीं है। स्पिनोजा इसी मत का प्रतिपादन करता है।
(2) रसल ने अपने दर्शन में इन्द्रिय-प्रदत्त के आधार पर भौतिक एवं मानसिक पदार्थों को समझाते हुए, तटस्थ एकतत्त्ववाद की स्थापना की है। उनके अनुसार एक विशेष प्रकार के इन्द्रिय-प्रदत्तों की तार्किक संरचना (logical construction out of sense-data), मानसिक पदार्थ एवं एक विशेष प्रकार की इन्द्रिय पदार्थों की तार्किक संरचना भौतिक पदार्थ कहलाती है। भौतिक एवं मानसिक तत्त्वों के विश्लेषण में रसल ने मात्र 'इन्द्रिय-प्रदत्त' को स्वीकार किया है। अतः इस अर्थ में उनका विचार' तटस्थ एकतत्त्ववाद' कहा जाता है। इस मत को विलियम जेम्स ने भी अपने निबंध 'क्या चेतना का अस्तित्त्व है?' में स्वीकार किया है।
Neutral Stuff
तटस्थ वस्तु, उभयेतर वस्तु
अर्नस्टमाक, एबेनेरियस आदि दार्शनिकों के अनुसार, ऐसी वस्तु जो न मानसिक है और न भौतिक, किन्तु जो दोनों के मूल में है।
Neutrum
तटस्थ वस्तु, अनुभय वस्तु
देखिए `neutral stuff`।
New Realism
नव-यथार्थवाद
वह मत जिसके अनुसार ज्ञान का विषय ज्ञाता से स्वतंत्र है और इनके बीच बाह्य संबंध है। साथ ही वस्तुएँ ठीक वैसी ही हैं, जैसी प्रतीत होती हैं और जैसी प्रतीत होती हैं, ठीक वैसी ही हैं जिसका ज्ञान साक्षात होता है, इसके लिये किसी माध्यम की अपेक्षा नहीं है। इसकी दो शाखाएँ हैं : एक का विकास जी. ई. मूर के नेतृत्व में इंग्लेंड में हुआ और दूसरी का अमेरिका में, होल्ट, मार्विन, पेरी, पिटकिन आदि के द्वारा।
Nihil Est In Intellectu Quod Non Prius
नास्ति संवेदन यत्तत्, बुद्धावपि न वर्तते (संवेदना के अभाव में बुद्धि का न होना)
लैटिन भाषा का एक सूत्र जिसका अर्थ है : `कोई भी ऐसी बात बुद्धि में नहीं होती जो पहले संवेदन में न रह चुकी हो।` अर्थात् उच्चतर चिंतन-मनन की सारी सामग्री ज्ञानेन्द्रियों के व्यापार से प्राप्त होती है। इस सिद्धांत के मानने वालों में अरस्तू, संत टॉमस और लॉक प्रमुख थे।
Nihil Ex Nihilo
नासतः किंचित् (असत् से सत्)
`असत् से कुछ उत्पन्न नहीं होता`। यह सूत्र पर्याप्त-हेतु सिद्धांत का निषेधात्मक रूप है।
Nihilism
शून्यवाद
इस मत के अनुसार सत्ता चतुष्ट कोटि से परे है अर्थात् (i) न वह सत् है, (ii) न असत् है, (iii) न उभय है, (iv) न उभय से परे है, अर्थात् अनिर्वचनीय है। इस मत का प्रमुख उदाहरण नागार्जुन के बौद्ध दर्शन में द्रष्टव्य है।
Nominal Definition
नाम-विषयक परिभाषा
एक मत के अनुसार, वह परिभाषा जो वस्तु की नहीं बल्कि शब्द या नाम की होती है। इसमें कुछ तर्कशास्त्रियों को यह आपत्ति है कि परिभाषा सदैव नाम या शब्द की ही होती है, वस्तु की कदापि नहीं। अतः कोपी (Copi) इत्यादि कुछ तर्कशास्त्री इस पद को `स्वनिर्मित परिभाषा` का पर्याय मानते हैं।
देखिए `stipulative definition`।
Nominal Essence
शाब्दिक सार
जॉन लॉक के अनुसार, मन में विद्यमान कोई जटिल प्रत्यय जिसे कोई नाम दे दिया गया हो और जो उस नाम की परिभाषा का आधार बनता है। इसका `वास्तविक सार` (`real essence`) से भेद किया गया है।
Nominalism
नाममात्रवाद
वह सिद्धांत कि सामान्य कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसका कोई अस्तित्व हो जैसे : `मनुष्य` इत्यादि। ये किसी ऐसी वस्तु के अस्तित्व के सूचक नहीं होते जो उन व्यष्टियों में समान हो; व्यष्टियों में समान केवल नाम होता है।