अपाकर्षी कल्पितार्थ
हान्स फाइइंगर (Hans Vaihinger) के अनुसार, वह कल्पितार्थ यानी अवास्तविक परन्तु व्यवहारोपयोगी संप्रत्यय जिसमें विचार की सरलता के लिए जटिल तथ्यों में से कुछ बातों को निकालकर आवश्यक तत्त्वों को रख लिया जाता है।
Neo-Criticism
नव्य समालोचनावाद, नव्य समीक्षावाद
रिनुविए (Renouvier) द्वारा प्रतिपादित मत, जिसके अन्तर्गत उन्होनें कांट की समीक्षात्मक पद्धति को स्वीकार करते हुए भी कांट द्वारा प्राप्त निष्कर्षों की आलोचना की।
Neo-Idealism
नव्य-प्रत्ययवाद
हेगेल के मूलभूत सिद्धांतों से प्रभावित किन्तु स्वतंत्र रूप से विकसित प्रत्ययवाद जिसका प्रतिपादन इटली के प्रसिद्ध दार्शनिक क्रोचे (Croce) एवं जेन्टाइल (Gentile) ने किया है। इन्होंने हेगेल के सर्वबुद्धिवाद को अस्वीकृत करते हुए दर्शन की ऐतिहासिक व्याख्या की और कहा कि यद्यपि निरपेक्ष सत् एक है किन्तु वह कोई स्थिर सत्ता नहीं है, अपितु ऐसी प्रगतिशील सत्ता है जो स्वरूपतः परिवर्तनशील तथा निरन्तर विकसनशील है।
Neo-Intuitionism
नव्य-अन्तःप्रज्ञावाद
रॉस (Ross), प्रिचर्ड (Prichard), कैरिट (Carritt) आदि समसामयिक दार्शनिकों द्वारा प्रतिपादित मत। इनके अनुसार उचित एवं अनुचित का निर्णय कर्त्ता के द्वारा परिस्थितियों के चयन में होता है किन्तु इसका आधार साधारण बुद्धि न होकर व्यक्ति की अन्तःप्रज्ञा होती है, अतः यह परिणामनिरपेक्ष होता है, परिणामसापेक्ष नहीं।
Neo-Kantianism
नव्य कांटवाद
जर्मनी में 1870 और 1920 के बीच में होने वाले अनेक दार्शनिक आंदोलनों के लिए प्रयुक्त पद। इन आंदोलनों ने कांट की भावना, समीक्षात्मक विधि और कृतित्व से प्रेरणा ली। कांट की कृति के विभिन्न पक्षों पर बल देने पर मतभेद रखते हुए वे सभी परिकल्पनात्मक तत्वमीमांसा के विरोधी थे और कांट के अनुभववाद और बुद्धि के समन्वय के मन्तव्य की ओर प्रवृत हुए।
Neology
नव्य-प्रयोग
सामान्यतः नए शब्द का प्रयोग अथवा पुराने शब्द का परंपरा से भिन्न किसी नए अर्थ में प्रयोग।
Neo-Platonism
नव्य-प्लेटोवाद
ऐमोनियस सेकस के शिष्य प्लाटिनस द्वारा स्थापित मत, जो प्लेटो के प्रत्ययवाद का पुनरूद्धार था और जिसमें प्लेटो के विचारों और पूर्वी रहस्यवाद का मिश्रण था।
Neo-Thomism
नव्य-टॉमसवाद
संत टॉमस एक्विनस के विचारों का परिष्कृत रूप। इसके अनुसार 'दर्शन ईश्वरमीमांसा का सेवक है'। यह समसामायिक वस्तुगत प्रत्ययवाद का धर्मशास्त्रीय रूप है जो 'विशुद्ध स्वत्व' को उच्चतम यथार्थ मानता है जिसे आत्मिक, दिव्य मूल-तत्व समझा जाता है। इस वाद को मानने वाले रूप तथा भूतद्रव्य, अन्तर्निहित क्षमता तथा संक्रिया (संभावना और यथार्थ) के मिथ्याकृत अरस्तूवादी प्रवर्गों एवं साथ ही अस्तित्व तथा सार के प्रवर्गों का धार्मिक जड़सूत्रों के प्रमाण के रूप में व्यापक उपयोग करते हैं। वे परिकल्पनात्मक विन्यासों के परिणामस्वरूप ईश्वर को स्वत्व का मूल कारण तथा समस्त दार्शनिक प्रवर्गों का मूल आधार मानते हैं।
Nescience
अविद्या, अज्ञान
विशेष रूप से, ईश्वर, आत्मा और पुद्गल के अज्ञान की अवस्था; परमार्थ-तत्व के ज्ञान का अभाव।
Neuter Proposition
अनुभय प्रतिज्ञप्ति, तटस्थ प्रतिज्ञप्ति
वह प्रतिज्ञप्ति जो न सत्य हो और न असत्य, जैसे `आज से पाँच वर्ष पश्चात् तीसरा महायुद्ध होगा`। इस तरह की प्रतिज्ञप्तियों की सत्यता-असत्यता को अरस्तू ने संदिग्ध माना था और मध्ययुगीन तर्कशास्त्रियों ने इन्हें अनुभय माना।