प्राकृतिक-दास-सिद्धांत
अरस्तू का वह सिद्धांत कि व्यक्तियों की कार्य-क्षमता में भिन्नता होने के कारण समाज में दास और स्वामी के वर्ग नैसर्गिक रूप से बन जाते हैं।
Natural Theology
प्राकृतिक ईश्वर मीमांसा, प्राकृतिक धर्मशास्त्र
वह ईश्वर-मीमांसा जो यह मानती है कि प्राकृतिक तत्त्व एवं घटनाएँ ईश्वरीय ज्ञान का आधार हैं तथा मनुष्य की तर्कबुद्धि, जो प्रकृतिप्रदत्त है, उस ज्ञान का साधन है।
Natura Naturans
कारण-प्रकृति, कारण मूलक
यह पद इस अर्थ में प्रयुक्त होता है कि ईश्वर समस्त व्यावहारिक जगत् का कारण अथवा उसका अधिष्ठान है, और ईश्वर जगत् से अभिन्न है। इस पद का प्रयोग इब्न रूश्द (Ibn-Rushd), निकॉलस कूसेनस (Nicholas Cusanus), ब्रूनो आदि मध्ययुगीन दार्शनिकों ने किया है। आधुनिक युग में इस मत का प्रयोग स्पिनोजा ने अपने दर्शन में किया है।
Natura Naturata
कार्य-प्रकृति, कार्यमूलक (स्पिनोजा)
यह पद इस अर्थ में प्रयुक्त होता है कि ईश्वर ही जगत् के समस्त पदार्थों में कार्यरूपेण विद्यमान है। कार्य-कारण से अभिन्न है, ईश्वर कारण भी है और कार्य भी है। दोनों में अभेद है। इस पद का प्रयोग मध्ययुगीन दार्शनिकों ने किया। आधुनिक युग में स्पिनोजा ने भी इस पद का प्रयोग किया है।
Nature Philosophers
प्रकृति-दार्शनिक
भौतिक विद्याविदों तथा यूरोपीय पुनर्जागरण युग में टेलेसिओ, ब्रूनों एवं काम्पानेला जैसे उन दार्शनिकों को दिया गया नाम जिन्होंने भौतिक अध्ययन में रूचि को पुनः जाग्रत किया।
Nature-Religion
प्रकृति-प्रधान धर्म
एक वर्गीकरण के अनुसार, नीतिप्रधान धर्म (morality religion) से भिन्न वह धर्म जिसमें प्राकृतिक शक्तियों की उपासना और उससे संबंधित कर्मकांड को प्रधानता दी जाती है।
Nature Worship
प्रकृति-पूजा
मूलतः सभ्यता के प्रारंभिक काल में समुचित ज्ञान के अभाव में मानव के द्वारा प्रकृति की उपकारक शक्तियों की कृतज्ञता-प्रकाशन तथा अधिक अनुग्रह के लिए देवता मानकर की जाने वाली उपासना और दुष्ट शक्तियों की उनके कोप की शांति के लिए उपासना।
Naturism
1. प्रकृति-पूजा : प्राकृतिक शक्तियों के प्रकोप के भय से उनकी पूजा।
2. प्रकृतिदेववाद : वह सिद्धांत कि आदिम धर्म प्रकृति या प्राकृतिक शक्तियों को देवता मानकर चलने वाला और उनकी उपासना का ही एक रूप था।
Necessary Condition
अनिवार्य उपाधि (कारक)
कारण की व्याख्या में वह घटक या शर्त जिसकी उपस्थिति घटना के लिये आवश्यक है अर्थात् वह कारक जिसकी अनुपस्थिति में घटना/कार्य घटित न हो सके।
Necessary Proposition
अनिवार्य प्रतिज्ञप्ति, निश्चयात्मक प्रतिज्ञप्ति
पारम्परिक तर्कशास्त्र में विधि (निश्चयमात्र) के अनुसार दिये गये प्रकारों में से प्रतिज्ञप्ति का एक प्रकार। इस प्रकार की प्रतिज्ञप्ति में उद्देश्य और विधेय में ऐसा अनिवार्य संबंध होता है जो भूत, वर्तमान तथा भविष्य सभी कालों के लिये सत्य होता है और इसके विपरीत कभी सत्य नहीं हो सकता।
उदाहरणार्थ : त्रिभुज के तीनों अन्तः कोणों का योग दो समकोणों के योग के बराबर होता है। 2 + 2 = 4 अवश्य होते हैं। इसका प्रारूप है S must be P अर्थात् S अवश्य ही P है।