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Braj Bhasha Soor-Kosh (Vol-VI)

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नैऋर्त
पश्चिम-दक्षिण-कोण का स्वामी।
संज्ञा

नैऋर्ति
पश्चिम और दक्षिण दिशाओं के दीच का कोण।
संज्ञा
[सं.]

नैवेद्य
देव-अर्पित भोग।
उ.-धूप-दीप-नैवेद्य साजि कै मंगल करै बिचारी-२५८७।
संज्ञा
[सं.]

नैष्ठिक
निष्ठावान।
वि.
[सं.]

नैसर्गिक
प्राकृतिक, स्वाभाविक।
वि.
[सं.]

नैसा
बुरा, खराब।
वि.
[सं. अनिष्ट]

नैसिक, नैसुक
थोड़ा, जरा सा।
वि.
[हिं. नेक]

नैसे
अनैसा, बुरा, खराब।
उ.-(क) जो जिहिं भाव भजै, प्रभु तैसे। प्रेम बस्य दुष्टनि कौं नैसे-१०-३९१। (ख) कहु राधा हरि कैंसे हैं ? तेरे मन भाए की नाहीं, की सुंदर की नैंसे हैं-१३०७।
वि.
[सं. अनिष्ट]

नैहर
माता-पिता का घर, मायका, पीहर।
संज्ञा
[सं. ज्ञाति, प्रा. णाति णाई=पिता + घर]]

नैहौं
डालना, छोड़ना।
क्रि. स.
[हिं. नाना]


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