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Braj Bhasha Soor-Kosh (Vol-VI)

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नैको, नैकौ
जरा भी, थोड़ा, कुछ।
उ.-कहा मल्ल चाणूर कुबलिया अब जिय त्रास नहीं तिन नैको-२५५८।
वि.
[हिं. नैक]

नैतिक
नीति-संबंधी, नीतियुक्त।
वि.
[सं.]

नैतिक
आचरण-संबंधी, चारित्रिक।
वि.
[सं.]

नैत्यिक
नित्य का।
वि.
[सं.]

नैत्रिक
नेत्रों का, नेत्र-संबंधी।
वि.
[सं.]

नैन
नेत्र।
उ.-सबनि मूँदे नैन, ताहि चितये सैन, तृषा ज्यौं नीर दव अँचै लीन्हौ-५९७।
संज्ञा
[सं. नयन]

नैन
मतवाले नैन- मद भरे नैन। रस भरे या रसीले नैन- नैन जिनमें रसिकता का भाव हो।
यौ.

नैन
नैन उठाना- (१) निगाह सामने करना। (२) बुरा व्यवहार करना। नैन न उघारना- लज्जा या संकोच से आँख न खोलना। नैन न जात उघारे- लज्जा या संकोच के कारण आँख खोलकर सामने न कर पाना। उ.- दुरलभ भयौ दरस दसरथ कौ सो अपराध हमारे। सूरदास स्वामी करुनामय नैन न जात उघारे-९-५२। नैन चढ़ाना- झुँझलाहट, अनख या क्रोध से देखना। नैन चढ़ाए डोलत- अनख या क्रोध से देखती घूमती है। उ.- कापर नैन चढ़ाए डोलत ब्रज में तिनुका तोर-१०-३१०। नैन चलाना- (१) आँख मटकाकर संकेत करना। (२) अनख या क्रोध से देखना। नैन चलावै- आँख चमकाकर या मटकाकर संकेत करती है। उ.-सखियनि बीच भरथौ घट सिर पर तापर नैन चलावै-८७५। नैन चलावति- अनख या क्रोध से देखती हुई। उ.-कापर नैन चलावति आवति जाति न तिनका तोर-१०-३२०। नैन जुड़ाना- आँखें शीतल होना, तृप्ति होना। नैन जुड़ाने- नेत्रशीलत हुए, तृप्ति हुई। उ.-अँचवत तब नैन जुड़ाने-१०-१८३। नैन भर आना- आँख में आँसू आना। नैन भरि आए- नेत्रों में आँसू आ गये। उ.-देखत गमन नैन भरि आए गात गह्यौ ज्यौं केत-९-३९। नैन भरि जोवना- खूब अच्छी तरह तृप्त होकर देखना। नैन भरि जोवना- खूब अच्छी तरह देखले। उ.-चाहति नैंकु नैन भरि जोवै-१०-३। नैन लगाना- टकटकी बांधकर देखना। नैन रहे लगाइ- टकटकी बांधकर देखते रह गये। उ.-मथति ग्वालि हरि देखी जाइ। गए हुते माखन की चोरी, देखत छबि रहे नैन लगाइ-१०-२९८। नैन सिराना- नेत्रों को परम तृप्ति मिलना। नैन सिराए- आँखें ठंडी हुईं, बहुत सुख मिला। उ.-सिया-राम-लछिमन मुख निरखत सूरदास के नैन सिराए-९-१६८।
मु.

नैन
अनीति, अन्याय।
संज्ञा
[सं. नय + न]

नैन
माखन।
संज्ञा
[सं. नवनीत]


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