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Braj Bhasha Soor-Kosh (Vol-VI)

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नैंकु
थोड़ा, जरा, तनिक,।
उ.-कोपि कौरव गहे केस जब सभा मैं, पांडु की बधू जस नैंकु गायौ। लाज के साज मैं हुती ज्यौं द्रौपदी, बढ़थौ तन-चीर नहिं अंत पायौ-१-५।
क्रि. वि.

नैंकहु
जरा भी, थोड़ी भी।
उ.-हरि, हौं महापतित, अभिमानी। परमारथ सौं बिरत, बिषय-रत, भाव-भगति नहिं नैंकहु जानी-१-१४९।
क्रि. वि.
[हिं. न + एक + हु (प्रत्य.)]

नैंसुक
छोटी, जरा सी।
उ.-स्याम, तुम्हरी मदन-मुरलिका नैंसुक-सी जग मोहथौ-६५६।
वि.
[हिं. नेकु]

नैंसुक
तनक, थोड़ा।
वि.
[हिं. नेकु]

नैंसुक
थोड़ा, जरा, तनक।
क्रि. वि.

नै
नीति।
संज्ञा
[सं. नय]

नै
नदी, सरिता।
संज्ञा
[सं. नदी प्रा. णई]

नै
भूतकालिक सकर्मक क्रिया के कर्ता की विभक्ति।
उ.-दियौ सिरपाव नृपराव नै महर कौं आपु पहिरावने सब दिखाए-५८७।
प्रत्य.
[हिं. ने]

नैक, नैकु
थोड़ा, कुछ।
वि.
[हिं. न + एक]

नैकट्य
निकट होने का भाव।
संज्ञा
[सं.]


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