एक पुराकथित आचार्य का नाम, जो कौषीतकि ब्राह्मण एवं छान्दोग्य उपनिषद् में उल्लिखित है। इनको कृष्ण (देवकीपुत्र) का शिक्षक कहा गया है। यह आंशिक नाम है, क्योंकि आंगिरसों के घोरवंशज 'भिषक् अथर्वा' भी कहे गये हैं। ऋग्वेदीय सूक्तों में 'अथर्वाणो वेदाः' का सम्बन्ध 'भेषजम्' एवं 'आंगिरसो वेदाः' का 'घोरम्' के साथ है। अतएव घोर आङ्गिरस् अथर्ववेदी कर्मकाण्ड के कृष्णपक्षपाती लगते हैं। इनका उल्लेख काठक संहिता के अश्वमेधखण्ड में भी हुआ है।
घोषा
ऋग्वेद की महिला ऋषि। वहाँ दो मन्त्रों में घोषा को अश्विनों द्वारा संरक्षित कहा गया है। सायण के मतानुसार उसका पुत्र सुहस्त्य ऋग्वेद के एक अस्पष्ट मन्त्र में उद्धृत है। ओल्डेनवर्ग यहाँ घोषा का ही प्रसंग पाते हैं, किन्तु पिशेल घोषा को संज्ञा न मानकर क्रियाबोधक मानते हैं।
अश्विनों की स्तुति में कहा गया है कि उन्होंने वृद्धा कुमारी घोषा को एक पति दिया। ऋग्वेद (10.39.40) की ऋचा घोषा नाम्नी ऋषि (स्त्री) की रची कही गयी है। कथा यों है कि घोषा कक्षीवान् की कन्या थी। कुष्ठ रोग से ग्रस्त होने के कारण बहुत दिनों तक वह अविवाहित रही। अश्विनों (देवताओं के वैद्यों) ने उसको स्वास्थ्य, सौन्दर्य और यौवन प्रदान किया, जिससे वह पति प्राप्त कर सकी।
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व्यञ्जन वर्णों के कवर्ग का पञ्चम अक्षर। तान्त्रिक विनियोग के लिए कामधेनुतनत्र में इसके स्वरूप का निम्नांकित वर्णन है :
(1) विष्णु के चार आयुधों--शङ्ख चक्र, गदा और पद्म में से एक आयुध। यह उनका मुख्य अस्त्र है। इसका नाम सुदर्शन है। चक्रनेमि (पहिया का घेरा) के मूल अर्थ में यह अव गति अथवा प्रगति का प्रतीक है। दर्शन में भवचक्र अथवा जन्ममरणचक्र के प्रतीक के रूप में भी इसका प्रयोग होता है।
(2) शाक्तमत में देवी की चार प्रकार की आऱाधना होती है। प्रथम मन्दिर में देवी की जनपूजा, द्वितीय में चक्रपूजा, तृतीय में साधना एवं चतुर्थ में अभिचार (जादू) द्वारा, जैसा कि तन्त्रों में बताया गया है।
चक्रपूजा एक महत्त्वपूर्ण तान्त्रिक साधना है। इसे आजकल वामाचार कहते हैं। बराबर संख्या के पुरुष एवं स्त्रियाँ जो किसी भी जाति के हों अथवा समीपी सम्बन्धी हों, यथा पति पत्नी, माँ, बहिन, भाई-एक गुप्त स्थान में मिलते तथा वृत्ताकार बैठते हैं। देवी की प्रतिमा या यन्त्र सामने रखा जाता है एवं पञ्चमकार --मदिरा, मांस, मत्स्य, मुद्रा एवं मैथुन का सेवन होता है।
चक्रधर
(1) विष्णु का एक पर्याय है। वे चक्र धारण करते हैं, अतः उनका यह नाम पड़ा।
(2) एक सन्त का नाम। इनका जीवनकाल तेरहवीं शती का मध्य है। ये ही मानभाऊ सम्प्रदाय के संस्थापक थे। इनके अनुयायी यादवराजा रामचन्द्र (1271-1309 ई०) के समकालीन नागदेव भट्ट एवं ज्ञानेश्वरी के रचयिता ज्ञानेश्वर हुए। इनका परवर्ती इतिहास अज्ञात है। इनका वैष्णवमत बड़ा उदार था। इसमें जाति अथवा वर्णभेद नहीं माना जाता था। इसलिए रूढ़िवादियों द्वारा इस मत का तीव्र विरोध हुआ। चक्रधर करहाद ब्राह्मण थे तथा मानभाऊ (सं० महानुभाव) सम्प्रदाय वाले इन्हें अपने देवता दत्तात्रेय का अवतार मानते हैं।
चक्रधरचरित
यह मानभाऊ (सं० महानुभाव) सम्प्रदाय का एक ग्रन्थ है जो मराठी भाषा में लिखा गया है। सम्प्रदाय के संस्थापक के जीवनचरित का विवरण इसमें पाया जाता है।
चक्रपूजा
दे० 'चक्र'।
चक्रवर्ती
(1) जिस राजा का (रथ) चक्र समुद्रपर्यन्त चलता था, उसको चक्रवर्ती कहते थे। उसको अश्वमेध अथवा राजसूय यज्ञ करने का अधिकार होता था। भारत के प्राचीन साहित्य में ऐसे राजाओं की कई सूचियाँ पायी जाती हैं। मान्धाता और ययाति प्रथम चक्रवर्तियों में से थे। समस्त भारत को एक शासनसूत्र में बाँधना इनका प्रमुख आदर्श होता था।
(2) शास्त्रों में प्रकाण्ड योग्यता प्राप्त करने पर विद्वानों को भी यह उपाधि दी जाती थी।
चक्रवाक्
चकवा नामक एक पक्षी। यह नाम ध्वन्यात्मक है। इसका उल्लेख ऋग्वेद एवं यजुर्वेद में अश्वमेध के बलिपशुओं की तालिका में आता है। अथर्ववेद एवं परवर्त्ती साहित्य में सच्चे दाम्पत्य का उदाहरण इससे दिया गया है।
चक्रायुध (चक्री)
विष्णु का पर्याय। इसका अर्थ है 'चक्र है आयुध (अस्त्र) जिसका।' मूर्तिकला में विष्णु के आयुधों का आयुधपुरुष के रूप में अंकन हुआ है।