यज्ञीय पात्र, जो एक तरह की बटलोई जैसा होता था। ऋग्वेद तथा वाज० सं०, ऐ० ब्रा० इत्यादि में 'धर्म' से उस पात्र का बोध होता है जिसमें दूध किया जाता था, विशेषकर अश्विनौ को देने के लिए। अतएव इस शब्द से गर्म दूध एवं किसी गर्म पेय का भी अर्थ प्रायः लगाया जाने लगा।
घृत
यज्ञ की सामग्री में से एक मुख्य पदार्थ। अग्नि में इसकी स्वतन्त्र आहुति दी जाती है। हवन कर्म में सर्वप्रथम 'आधार' एवं 'आज्यभाग' आहुतियों के नाम से अग्नि में घृत टपकाने का विधान है। साफ किये हुए मक्खन का उल्लेख ऋग्वेद में यज्ञ-उपादन घृत के अर्थ में हुआ है। ऐतरेय ब्राह्मण के भाष्य में सायण ने घृत एवं सर्पि का अन्तर करते हुए कहा है कि सर्पि पिघलाया हुआ मक्खन है, और घृत जमा हुआ (घनीभूत) मक्खन है। किन्तु यह अन्तर उचित नहिं जान पड़ता, क्योंकि मक्खन अग्नि में डाला जाता था। अग्नि को 'घृतप्रतीक', 'घृतपृष्ठ', 'घृतप्रसह' एवं 'घृतप्री' कहा गया है। जल का व्यवहार मक्खन को शुद्ध करने के लिए होता था, एतदर्थ उसे 'घृतपू' कहा जाता था। ऐतरेय ब्राह्मण में आज्य, घृत आयुत तथा नवनीत को क्रमशः देवता, मानव, पितृ एवं शिशु का प्रतीक माना गया है। श्रौतसूत्रों, गृह्यसूत्र, स्मृतियों तथा पद्धतियों में घृत के उपयोग का विस्तृत वर्णन पाया जाता है।
घृतकन्दल
माघ शुक्ल चतुर्दशी को इस व्रत का अनुष्ठान होता है। इसमें उपवास करने का विधान है। प्रर्णिमा को एक स्थूल कम्बल के समान जमा हुआ वृत शिव मूर्ति पर वेदी पर्यन्त लपेटा जाना चाहिए। तदनन्तर कृष्ण वर्ण वाले साँड़ों का जोड़ा दान करना चाहिए। इसके परिणाम स्वरूप व्रती असंख्य वर्षों तक शिवलोक में वास करता है। यह शान्तिकर्म भी है। इसके अनुसार व्रती को एक वस्त्र उढ़ाकर उसका घी से अभिषिञ्चन करना चाहिए। दे० आथर्वण परिशिष्ट, अड़तीसवाँ भाग, 204-212; राजनीतिप्रकाश (वीरमित्रोदय), पृष्ठ 459-464।
घृतभाजनव्रत
पूर्णिमा के दिन इस व्रत का अनुष्ठान होता है। शिवजी की पूजा इस व्रत में की जाती है। ब्राह्मण को घृत तथा मधु का भोजन, एक प्रस्थ तिल (आठक का चौथाई) तथा दो प्रस्थ धान का दान करना चाहिए।
घृतस्नापगायिधि
इस व्रत में ग्रहण के दिन अथवा पौष में किसी भी पवित्र दिन शिवपूजा का विधान है। एक रात तथा एक दिन शिवमूर्ति के ऊपर घृत की अनवरत धारा पड़नी चाहिए। रात्रि को नृत्य-गान करते हुए जागरण रखना चाहिए।
घृताची
सरस्वती का एक पर्याय। एक अप्सरा का भी यह नाम है। इन्द्रसभा की अप्सराओं में इसकी गणना है। इसने कई ऋषियों तथा राजाओं को पथभ्रष्ट किया। पौर वंश के कुशनाभ अथवा रौद्राश्व के द्वारा इसके दस पुत्र हुए। ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार कई वर्णसंकर जातियों के पूर्वज इससे विश्वकर्मा के द्वारा उत्पन्न हुए थे। हरिवंश के अनुसार कुशनाभ से इसके दस पुत्र तथा दस कन्याएँ उत्पन्न हुई थीं।
दूसरी कथा के अनुसार कुशनाभ से इसकी एक सौ कन्याएँ उत्पन्न हुईं। वायु उनकों स्वर्ग में ले जाना चाहते थे, परन्तु उन्होंने जाना अस्वीकार कर दिया। वायु के शाप से उनका रूप विकृत (कुबड़ा) हो गया। परन्तु पुनः उन्होंने अपना स्वाभाविक रूप प्राप्त करके काम्पिल के राजा ब्रह्मदत्त से विवाह किया। कुबड़ी कन्याओं के नाम पर ही उस देश का नाम 'कन्याकुब्ज' कान्यकुब्ज हो गया।
घंटाकर्ण
पाशुपत सम्प्रदाय के एक आचार्य। शैव परम्परा के पौराणिक साहित्य से पता लगता है कि अगस्त्य, दधीचि, विश्वामित्र, शतानन्द, दुर्वासा, गौतम, ऋष्यश्रृंङ्ग, उपमन्यु एवं व्यास आदि महर्षि शैव थे। व्यासजी के लिए कहा जाता है कि उन्होंने केदारक्षेत्र में 'घण्टाकर्ण' से पाशुपत दीक्षा ली थी, जिनके साथ बाद में वे काशी में रहने लगे। व्यासकाशी में घंटाकर्ण तालाब वर्तमान है। वहीं घंटाकर्ण की मूर्ति भी हाथ में शिवलिङ्ग धारण किये विराजमान है। वर्तमान काशी के नीचीबाग मुहल्ले में घंटाकर्ण (कर्णघण्टा) का तालाब है और उसके तट पर व्यासजी का मन्दिर है। मुहल्ले का नाम भी 'कर्णघंटा' है।
कहा गया है कि घंटाकर्ण इतने कट्टर शिवभक्त थे कि शंकर के नाम के अतिरिक्त कान में दूसरा शब्द पड़ते ही सिर हिला देते थे जहाँ कानों के पास दो घण्टे लटके रहते थे। घण्टों की ध्वनि में दूसरा शब्द विलीन हो जाता था।
घरेण्ड ऋषि
घेरण्ड ऋषि की लिखी 'घेरण्डसिंहता' प्राचीन ग्रन्थ है। यह हठयोग पर लिखा गया है तथा परम्परा से इसकी शिक्षा बराबर होती आयी है। नाथ पंथियों ने उसी प्राचीन सात्विक योग प्रणाली का प्रचार किया है, जिसका विवेचन 'घेरण्डसंहिता' में हुआ है।
घेरण्डसंहिता
दे० 'घेरण्ड ऋषि'।
घोटकपञ्चमी
आश्विन कृष्ण पञ्चमी को इस व्रत का अनुष्ठान करना चाहिए। यह व्रत राजाओं के लिए निर्धारित है जो अश्वों की अभिवृद्धि अथवा सुस्वास्थ्य के लिए अनुष्ठित होता है। यह एक प्रकार का शान्तिकर्म है।