चैत्र मास की तृतीया, चतुर्थी अथवा पञ्चमी को इस व्रत का अनुष्ठान करना चाहिए। शिव तथा गौरी की सुवर्ण, रजत, नीलम की प्रतिमाएँ धनी लोग बनवाकर उनका विवाह करें। सामान्य लोग चन्दन, अर्क पौधे की, अशोक अथवा मधूक नामक वृक्ष की प्रतिमाएँ बनाकर उनका विवाह करायें। दे० कृत्यरत्नाकर, 108-110 (देवी पुराण से)।
गौरीव्रत
(1) आश्विन मास से चार मास तक इस व्रत का आचरण होता है। व्रती को दुग्ध अथवा दुग्ध की बनी वस्तुओं, दधि, घृत, तथा गन्ने का रस नहीं ग्रहण करना चाहिए, अपितु इन्हीं वस्तुओं को पात्रों में रखकर दान करना चाहिए। दान देते समय निम्न शब्दों का उच्चारण करना चाहिए, `गौरि, प्रसीदतु माम्।`
(2) केवल महिलाओं के लिए शुक्ल पक्ष में तृतीया से तथा चैत्र मास में कृष्ण पक्ष से एक वर्षपर्यन्त गौरी के भिन्न-भिन्न नामों से पूजन का विधान है। प्रत्येक तृतीया को भिन्न-भिन्न प्रकार का भोग भी विहित है।
(3) तृतीया के दिन केवल महिलाओं के लिए भविष्यत् पुराण (1.21.1) में इस व्रत का विधान है। लवणविहीन भोजन का उस दिन आहार करना चाहिए। विशेष रूप से वैशाख, भाद्रपद तथा माघ की तृतीया पवित्र है।
(4) ज्येष्ठ की चतुर्थी को उमा का पूजन करना चाहिए, क्योंकि उसी दिन उनका जन्म हुआ था।
ग्रन्थ साहब
गुरु नानक, अन्य सिक्ख-गुरुओं तथा सन्त कवियों के वचनों का इसमें संग्रह है। पाँचवे गुरु अर्जुन देव स्वयं कवि थे एवं व्यावहारिक भी। उन्होंने अमृतसर का स्वर्णमन्दिर बनवाया और 'ग्रन्थ साहब' को पूर्ण किया।
ग्रह
यज्ञकर्म का सोमपानपात्र (प्याला)। ग्रह का उल्लेख शतपथ ब्राह्मण (4.6.5.1) में परवर्ती ग्रह के अर्थ में न होकर ऐन्द्रजाजिक शक्ति के अर्थ में हुआ है। परवर्ती साहित्य में ही प्रथम बार इसका प्रयोग खेचर पिण्डों के अर्थ में हुआ है, जैसा कि मैत्रायणी उनिषद् (6.16) से ज्ञात है। वैदिक भारतीयों को ग्रहों का ज्ञान था। ओल्डेनवर्ग ग्रहों को आदित्यों की संज्ञा देते हैं जो सात हैं--सूर्य, चन्द्र एवं पाँच अन्य ग्रह। दूसरे पाश्चात्य विद्वानों ने इसका विरोध किया है। हिलब्राण्ट ने पाँच अध्वर्युओं (ऋग्वेद 3.7.7) को ग्रह कहा है। यह भी केवल अनुमान ही है। 'पञ्च उक्षाणः' को ऋग्वेद के एक दूसरे मन्त्र में उसी अनिश्चिततापूर्वक ग्रह कहा गया है। निरुक्त के भाष्य में दुर्गाचार्य ने 'भूमिज' को मङ्गल ग्रह कहा है। परवर्त्ती तैत्तिरीय आरण्यक (1.7) में वर्णित सप्तसूर्यों को ग्रहों के अर्थ में लिया जा सकता है। लुड्विग ने सूर्य व चन्द्र के साथ पाँच ग्रहों एवं सत्ताईस नक्षत्रों को ऋग्वेदोक्त चौंतीस ज्योतियों एवं यज्ञरूपी घोड़े की पसलियों का सूचक बताया है।
ग्रह-नक्षत्रों और हिन्दुओं के धार्मिक कृत्यों का घनिष्ठ सम्बन्ध है। प्रत्येक धार्मिक कार्य के लिए शुभ मुहूर्त की आवश्यकता होती है। इसीलिए प्राचीन काल में वेद के षडङ्गों में 'ज्योतिष' का विकास हुआ था। यज्ञों का समय ज्योतिष्पिण्डों की गतिविधि के अनुसार निश्चित् होता था। सूर्य-उपासना में सौरमण्डल के नव ग्रहों का विशिष्ट स्थान है। नव ग्रहों में शुभ और दुष्ट दोनों प्रकार के ग्रह होते हैं। प्रत्येक माङ्गलिक कार्य के पूर्व नवग्रह-पूजन होता है। दुष्ट ग्रहों की शान्ति की विधि भी कर्मकाण्डीय पद्धतियों में विस्तार से वर्णित है।
ग्रहयाग
निबन्धों और पद्धतियों के शान्ति वाले विभाग में नवग्रह याग प्रकरण मिलता है। हेमाद्रि (2.80.592) जहाँ तिथि तथा नक्षत्रों के सन्दर्भानुसार भिन्न-भिन्न ग्रहों के संयोगों का निर्देश करते हैं, वहाँ ग्रहों तथा अन्य देवों के सम्मानसूचक कुछ विशेष यागों का भी संकेत करते हैं। इन यज्ञ-यागों द्वारा थोड़े से व्यय में ही अनन्त पुण्य की उपलब्धि होती है। इस विषय में एक उदारण पर्याप्त होगा। यदि किसी रविवार को षष्ठी तिथि हो और संयोग से उसी दिन पुष्य नक्षत्र भी हो, तो स्कन्दयाग का आयोजन किया जाना चाहिए। इस व्रत के आयोजन से मनुष्य की समस्त मनोवांछाएँ पूर्ण होती हैं। लगभग एक दर्जन 'याग' हेमाद्रिकृतव्रतखण्ड में बतलाये गये हैं। तीन प्रकार के ग्रहयज्ञों के लिए देखिए : स्मृतिकौस्तुभ, 455-479 जो हेमाद्रि 2.590-592 से नित्तान्त भिन्न है।
ग्रहयामलतन्त्र
वामकेश्वरतन्त्र' में चौसठ तन्त्रों की सूची दी हुई है, इसमें आठ यामलतन्त्र हैं। ये यामल (जोड़े) विशेष देवता एवं उसकी शक्ति के युग्मीय एकत्व के प्रतीक का वर्णन करते हैं। ग्रहयामलतन्त्र भी उनमें से एक है।
ग्रामगेयगान
आर्चिक (सामवेदसम्बन्धी ग्रन्थ) में दो प्रकार के गान हैं, प्रथम ग्रामगेयगान, द्वितीय अरण्यगान। अरण्यगान अपने रहस्यात्मक स्वरूप के कारण वन में गाये जाते हैं। ग्रामगेयमान नित्य स्वाध्याय, यज्ञ आदि के समय ग्राम में गाये जाते हैं।
घ---घट
धार्मिक साधनाओं में 'घट' का कई प्रकार से उपयोग होता है। शुभ कृत्यों में वरुण (जल तथा नीति के देवता) के अधिष्ठान के रूप में घट की स्थापना होती है। घट घटिकायन्त्र अथवा काल का भी प्रतीक है जो सभी कृत्यों का साक्षी माना जाता है। नवरात्र के दुर्गापूजनारम्भ में घट की स्थापना कर उसमें देवी को विराजमान किया जाता है।
शाक्त लोग रहस्यमय रेखाचित्रों का 'यन्त्र' एवं 'मण्डल' के रूप में प्रचुरता से प्रयोग करते हैं। इन यन्त्रों एवं मण्डलों को वे धातु की स्थालियों, पात्रों एवं पवित्र घटों पर अंकित करते हैं। मद्यपूर्ण घट की पूजा और उसका प्रसाद लिया जाता है।
घटपर्यसन (घटस्फोट)
किसी पतित अथवा जातिच्युत व्यक्ति का जो श्राद्ध (अन्त्येष्टि) उसके जीवनकाल में ही कुटुम्बियों द्वारा किया जाता है, उसे 'घटपर्यसन' कहते हैं।
घटयोनि
अगस्त्य या कुम्भज ऋषि। पुरा कथा के अनुसार अगस्त्य का जन्म कुम्भ अथवा घट से हुआ था। इसलिए उनको कुम्भज अथवा घटयोनि कहते हैं। दे० 'अगस्त्य'।