आगमतत्त्वविलास' में उल्लिखित चौसठ तन्त्रों की सूची में 'गौतमीय तन्त्र' एवं 'बृहत्-गौतमीय तन्त्र' नामक दो तन्त्रों का उल्लेख है।
गौरचन्द्र
अधिक सुन्दर एवं शुभ्र वर्ण होने के कारण चैतन्य को अनेक भक्त गौरवचन्द्र कहा करते थे। उनकी प्रशंसा में 'गौरचन्द्रिका' नामक पुस्तक भी लिखी गयी है।
गौर चन्द्रिका
चैतन्य के रूपगुणों की प्रशंसा में उनके शिष्यों ने यह ग्रन्थ रचा। दे० 'गौरचन्द्र'।
गौराङ्गाष्टक
चैतन्य साहित्य में गौराङ्गाष्टक नामक सांस्कृत ग्रन्थ का भी नाम आता है। इसका उस सम्प्रदाय में नित्य पाठ किया जाता है।
गौरीकुण्ड
केदारनाथ मन्दिर से आठ मील नीचे यह एक पवित्र कुण्ड (जलाशय) है। यहाँ दो कुण्ड हैं-- एक गरम पानी का और दूसरा ठंडे पानी का। शीतल जल का कुण्ड अमृतकुण्ड कहा जाता है। कहते हैं, भगवती पार्वती ने इसी में प्रथम स्नान किया था। गौरीकुण्ड का जल काफी उष्ण है। जनविश्वास के अनुसार माता पार्वती का जन्म यहाँ हुआ था। यहाँ पार्वती का मन्दिर भी है।
गौरीगणेशचतुर्थी
किसी भी चतुर्थी के दिन इस व्रत का अनुष्ठान हो सकता है। इसमें गौरी तथा गणेश के पूजन का विधान है। इससे सफलता तथा सौभाग्य सुरक्षित रहते हैं।
गौरीगणेशपूजा
सभी सम्प्रदायों के हिन्दुओं में मङ्गल कार्यों के आरम्भ में गौरी-गणेश की पूजा सबसे पहले होती है। यात्रा के आरम्भ में गौरी-गणेश का स्मरण किया जाता है।
गौरीचतुर्थी
माघ शुक्ल चतुर्थी को गौरीपूजन का विधान सर्वसाधारण के लिए है। किन्तु विशेष रूप से महिलाओं द्वारा कुछ पुष्पों से विदुषी ब्राह्मणस्त्रियों तथा विधवाओं की प्रतिष्ठा करनी चाहिए।
गौरीतपोव्रत
इस व्रत का विधान केवल महिलाओं के लिए है। मार्गशीर्ष अमावस्या को अनुष्ठान होता है। अर्द्धरात्रि के समय शिव तथा पार्वती की किसी शिवमन्दिर में पूजा करनी चाहिए। सोलह वर्षपर्यन्त इसका आचरण करना चाहिए। तदनन्तर मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा को इसका उद्यापन होना चाहिए। यह 'महाव्रत' भी कहा जाता है।
गौरीतृतीयाव्रत
चैत्र शुक्ल, भाद्र शुक्ल अथवा माघ शुक्ल तृतीया को इस व्रत का अनुष्ठान होता है। गौरी की पूजा उनके विभिन्न नामों से होती है। महादेव तथा गौरी की पूजा का इसमें विधान है। पार्वती के ये आठ नाम है : पार्वती, ललिता, गौरी, गायत्री, शाङ्करी, शिवा, उमा तथा सती।