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Braj Bhasha Soor-Kosh (Vol-X)

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स्पंर्द्धा, स्पर्धा
सामर्थ्य या योग्यता से अधिक करने या पाने की इच्छा, हौंसला या साहस।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. स्पर्द्धा)

स्पंर्द्धा, स्पर्धा
सद्भावपूर्वक किसी के समक्ष होने की कामना या चेष्टा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. स्पर्द्धा)

स्पंर्द्धा, स्पर्धा
ईर्ष्या, द्वेष।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. स्पर्द्धा)

स्पंर्द्धी, स्पर्धी
स्पर्द्धा करनेवाला, जिसमें स्पर्द्धा का भाव हो।
वि.
(सं. स्पर्दिन्. हिं. स्पर्द्धी)

स्पर्श
दो या अधिक वस्तुओं के परस्पर सटने, लगने या छूने का भाव।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्पर्श
त्वचा का वह गुण जिससे छूने, दबने आदि का बोझ या अनुभव हो।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्पर्श
व्याकरण में उच्चारण के आभ्यंतर प्रयत्‍नों केचार भेदों में से एक जिसमें उच्‍चारण करते समय यागिंद्रिय का द्वार बंद-सा हो जाता है (देवनागरी वर्णमाला के क' से 'म' तक के व्यंजनों का उच्चारण इसी प्रयत्न से होता है)।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्पर्श
ग्रहण' के समय सूर्य या चंद्रमा पर छाया पड़ने का आरंभ।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्पर्श-जन्य
जो स्पर्श से या उसके कारण उत्पन्न हो, संक्रामक।
वि.
(सं.)

स्पर्शता
स्पर्श' का भाव या धर्म।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)


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