अठारहवीं शती में बलदेव विद्याभूषण ने चैतन्य सम्प्रदाय के लिए 'वेदान्तसूत्र' पर एक व्याख्या लिखी, जिसे 'गोविन्दभाष्य' कहते हैं। इस ग्रन्थ में 'अचिन्त्य भेदाभेद' का दार्शनिक मत दर्शाया गया है कि ब्रह्म एवं आत्मा का सम्बन्ध अन्तिम विश्लेषण में भी अचिन्त्य है।
गोविन्दराज
तैत्तिरीयोपनिषद् के एक वृत्तिकार। मनुस्मृति की टीका करनेवाले भी एक गोविन्दराज हुए हैं।
गोविन्दविरुदावली
महाप्रभु चैतन्य के शिष्य रूप गोस्वामी द्वारा रचित एक ग्रन्थ।
गोविन्दशयनव्रत
आषाढ़ शुक्ल एकादशी को इस व्रत का अनुष्ठान होता है। किसी शय्या पर अथवा क्यारी में विष्णु भगवान् की प्रतिमा स्थापित की जानी चाहिए। चार मास तक व्रत के नियमों का आचरण किया जाना चाहिए। चातुर्मास्यव्रत भी इसी तिथि को आरम्भ होता है। गोविन्दशयन के बाद समस्त शुभ कर्म, जैसे उपनयन, विवाह, चूडाकर्म, प्रथम गृहप्रवेश इत्यादि चार मास तक निषिद्ध हैं।
गोविन्दसिंह
सिक्खों के दसवें गुरु। ये गुरु तेगबहादुर के पुत्र थे। इन्होंने ही 'खालसा' दल की स्थापना (1690 ई० में) की तथा पञ्च 'ककार' (केश, कंघा, कड़ा, कच्छ तथा कृपाण) धारण करने की प्रथा चलायी। इनके समय में सिक्ख सम्प्रदाय सैनिक जत्थे के रूप में संगठित हो गया। गोविन्दसिंह ने गुरुप्रथा को समाप्त कर दिया, जो नानक के काल से चली आ रही थी। दे० 'ग्रंथ साहब'।
हिन्दू धर्म की रक्षा, प्रतिष्ठा और उद्धार के लिए विगत गुरुओं के समान ही दृढ़ संगठन बनाकर ये आजीवन मुगलों से मोर्चा लेते रहे। अन्त तक इन्होंने भारी त्याग, बलिदान और संघर्ष झेलते हुए अध्यात्म वृत्ति को भी परिनिष्ठित किया। इनकी काव्यरचना ओजस्वी और कोमल, दोनों रूपों में मिलती है।
गोविन्दार्णव
एक धर्मशास्त्रीय निबन्धग्रन्थ। इसकी रचना काशी के राजा गोविन्दचन्द्र गहडवाल के प्रश्रय में रामचन्द्र के पुत्र शेष नृसिंह ने की थी। इसका दूसरा नाम 'धर्मसागर' अथवा 'धर्मतत्त्वालोक' भी है। इसमें छः वीचियाँ हैं--1.संस्कार 2. आह्निक 3. श्राद्ध 4. शुद्धि 5. काल और 6. प्रायश्चित्त। इसका उल्लेख 'निर्णयसिन्धु' और लक्ष्मण भट्ट के 'आचाररत्न' में हुआ है। दे० अलवर संस्कृत ग्रन्थसूची।
गोलतिका व्रत
इस व्रत में ग्रीष्म ऋतु में कलश से पवित्र जल की धारा भगवान शिव की प्रतिमा पर डाली जाती है। विश्वास किया जाता है कि इससे ब्रह्मपद की प्राप्ति होती है। दे० हेमाद्रि, 2.861 (केवल एक श्लोक)।
गोविन्द स्वामी
गोविन्द स्वामी 'ऐतरेय ब्राह्मण' के एक प्रसिद्ध भाष्यकार हुए हैं।
अष्टछाप' के एक भक्त कवि भी इस नाम से प्रसिद्ध हैं, जो संगीताचार्य भी थे।
गोविन्दानन्द
आचार्य गोविन्दानन्द शङ्कराचार्य द्वारा प्रणीत 'शारीरक भाष्य' के टीकाकार हैं। उनकी लिखी हुई 'रत्नप्रभा' सम्भवतः शाङ्करभाष्य की टीकाओं में सबसे सरल है। इसमें भाष्य के प्रायः प्रत्येक पद की व्याख्या है। सर्वसाधारण के लिए भाष्य को हृदयंगम कराने में यह बहुत ही उपयोगी है। जो लोग विस्तृत और गंभीर टीकाओं को समझने में असमर्थ हैं उन्हीं के लिए यह व्याख्या लिखी गयी है।
गोविन्दानन्दजी ने 'रत्नाप्रभा' में अपने गुरु के सम्बन्ध में जो श्लोक लिखा है उसके एक पद के साथ ब्रह्मानन्द सरस्वती कृत 'लघुचन्द्रिका' की समाप्ति के एक श्लोक का कुछ सादृश्य देखा जाता है। इन दोनों से सिद्ध होता है कि कि गोविन्दानन्द तथा ब्रह्मानन्द के विद्यागुरु श्री शिवराम थे। इससे इन दोनों का समकालीन होना भी सिद्ध होता है। ब्रह्मानन्द मधुसूदन सरस्वती के समकालीन थे। अतः गोविन्दानन्द का स्थितिकाल भी सत्रहवीं शताब्दी होना चाहिए।
गोविन्दानन्द सरस्वती
योगदर्शन के एक आचार्य। इनके शिष्य रामानन्द सरस्वती (16वीं शती के अंत) ने पतञ्जलि के योगसूत्र पर 'मणिप्रभा' नामक टीका लिखी। नारायण सरस्वती इनके दूसरे शिष्य थे, जिन्होंने 1592 ई० में एक ग्रन्थ (योग विषयक) लिखा। इनके शिष्यों के काल को देखते हुए अनुमान किया जा सकता है कि ये अवश्य 16वीं शती के प्रारम्भ में हुए होंगे।