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Braj Bhasha Soor-Kosh (Vol-VI)

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नेति
इति (अंत) नहीं है'। यह वाक्य ब्रह्म की अनंतता सूचित करने के लिए लिखा जाता है।
उ.-सोई जस सनकादिक गावत नेति नेति कहि मानि-२-३७।
वाक्य
[सं. न इति]

नेति
वह रस्सी जिसे मथानी में लपेट कर दूध-दही मथा जाता है।
उ.-कह्यौ भगवान अब बासुकी ल्याइयै, जाइ तिन बासुकी सौं सुनायौ। मानि भगवंत-आज्ञा सो आयौ तहाँ, नेति करि अचल कौं सिंधु नायौ-८-८।
संज्ञा
[सं. नेत्र]

नेती
मथानी की रस्सी।
संज्ञा
[सं. नेत्र, हिं. नेता]

नेती धोती
हठयोग की क्रिया जिसमें कपड़े की धज़्जी पेट मे पहुँचाकर आँते साफ करते हैं।
संज्ञा
[हिं. नेती + धोती]

नेतृत्व
नेता होने का भाव, कार्य या पद, सरदारी, नेतागीरी।
संज्ञा
[सं.]

नेत्र
आँख।
संज्ञा
[सं.]

नेत्र
मथानी की रस्सी।
संज्ञा
[सं.]

नेत्र
दो की संख्या सूचक शब्द।
संज्ञा
[सं.]

नेत्रकनीनिका
आँख का सारा।
संज्ञा
[सं.]

नेत्रज, नेत्रजल
आँसू।
संज्ञा
[सं.]


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