इन्द्रियों से प्रत्यक्ष होनेवाला विषय। जितना दृश्य जगत् है अथवा जहाँ तक मन की गति है वह सब गोचर माया का साम्राज्य है। परमतत्त्व इससे परे है। वेदान्तसार में कथन है 'अखण्डे सच्चिदानन्दमवाङ्मनसगोचरम्।'
गोचर्म
(1) गौ का चमड़ा। कई धार्मिक कृत्यों में गोचर्म के आसन का विधान है। समयाचारतन्त्र (पटल 2) में विविध कर्मों में विविध आसन निम्नांकित प्रकार से बतलाये गये हैं :
इसके अनुसार स्तम्भन क्रिया (शत्रु के जड़ीकरण) में गोचर्म काम आता है। पारस्कर आदि गृह्यसूत्रों के अनुसार विवाह संस्कार की एक क्रिया में वर को वृषभचर्म पर बैठने का विधान है। यहाँ पर वृषभचर्म वृष्यता अथवा सर्जनशक्ति का प्रतीक है।
[दस हाथ लम्बे बाँस द्वारा पंद्रह-पंद्रह वर्गाकार में नापी गयी भूमि गोचर्म कहलाती हैं।]
गोतम
गोतम का उल्लेख ऋग्वेद में अनेक बार हुआ है, किन्तु किसी ऋचा के रचयिता के रूप में नहीं। यह स्पष्ट है कि उनका सम्बन्ध आङ्गिरसों से था, क्योंकि गोतम प्रायः उनका उल्लेख करते हैं। ऋग्वेद की एक ऋचा में इनका पितृवाचक 'रहुगण' (1.78.5) शब्द आया है। शतपथ ब्राह्मण में इन्हें 'माथ्व विदेस' का पारिवारिक पुरोहित तथा वैदिक सभ्यता के वाहक समझा गया है (1.14.1.10)। उसी ब्राह्मण में इन्हें विदेह जनक एवं याज्ञवल्क्य का समकालीन एवं एक सूक्त का रचयिता कहा गया है। अथर्ववेद के दो परिच्छेदों में भी इनका उल्लेख है। वामदेव तथा नोधस इनके पुत्र थे। उनमें वाजश्रवस् भी सम्मिलित हैं।
गोत्र
इसकी व्युत्पत्ति कई प्रकार से बतायी गयी है। पूर्व पुरुषों का यह उद्घोष करता है, इसलिए गोत्र कहलाता है। इसके पर्याय हैं सन्तति, कुल, जनन, अभिजन, अन्वय, वंश, सन्तान आदि। कुछ विद्वानों के अनुसार 'गोत्र' शब्द का अर्थ 'गोष्ठ' है। आदिम काल में जितने कुटुम्बों की गायें एक गोष्ठ में रहती थीं उनका एक गोत्र होता था। परन्तु इसका सम्बन्ध प्रायः वंशपरम्परा से ही है। वास्तविक अथवा कल्पित आदि पुरुष से वंशपरम्परा प्रारम्भ होती है। मनु के अनुसार निम्नांकित मूल गोत्र ऋषि थे :
गोत्रों के आदि पुरुष ब्राह्मण ऋषि थे। इसलिए ब्राह्मणों के जो गोत्र हैं वे ही पौरोहित्य परम्परा से क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के भी गोत्र हैं। अग्निपुराण के वर्णसङ्करो पाख्यान में इस मत का उल्लेख किया गया है :
क्षत्रिय-वैश्य-शूद्राणां गोत्रं च प्रवरादिकम्। तथान्यवर्णसङ्कराणां येषां विप्राश्च याजकाः।।
जिनकी पौरोहित्य परम्परा छिन्न हो गयी है और जिनके गोत्र का पता नहीं लगता उनकी गणना काश्यप गोत्र में की जाती है, क्योंकि कश्यप सबके पूर्वज माने जाते हैं। दे० गोत्रप्रवरमञ्जरी।
गोत्रिरात्र व्रत
(1) यह व्रत आश्विन कृष्ण त्रयोदशी को आरम्भ होता है। तीन दिन तक इसका आचरण किया जाता है। इसके गोविन्द देवता हैं। गोशाला अथवा पर्णशाला में वेदिका का निर्माण कर उस पर मण्डल बनाकर भगवान कृष्ण की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए, जिसकी दाहिनी और बायीं ओर चार-चार पटरानियाँ हों। चौथे दिन होम, गौओं को अर्घ्यदान तथा उनका पूजन होना चाहिए। इस व्रत के आचरण से सन्तान की वृद्धि होती है।
(2) भाद्र शुक्ल द्वादशी अथवा कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी को इस व्रत का प्रारम्भ करना चाहिए। तीन दिन तक उपवास, लक्ष्मी, नारायण तथा कामधेनु का पूजन होना चाहिए। इसके अनुष्ठान से सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
(3) यह व्रत भाद्र शुक्ल त्रयोदशी को आरम्भ करना चाहिए। तीन दिन पर्यन्त इसका आचरण होना चाहिए। कामधेनु तथा लक्ष्मीनारायण की पूजा का इसमें विधान है। दे० हेमाद्रि, व्रतखंड, 303-308 (भविष्योत्तर पुराण से); व्रतप्रकाश (पत्रात्मक 161)।
गोदा
दक्षिण भारत की प्रेमानुरागवती एक विष्णुभक्त महिला। आलवार भक्तों में पेरिया आलवार अर्थात् 'सर्वश्रेष्ठ भक्त' का जन्म परम्परा के अनुसार कलिसंवत्सर 45 में हुआ था। उनकी पुत्री अण्डाल, जो कलिसंवत् 96 में उत्पन्न हुई थी, बहुत बड़ी भक्त थी। बहुत ही मधुरभाषिणी होने के कारण उसे गोदा कहते थे। उसने तमिल भाषा में 'स्तोत्र रत्नावली' पुस्तक की रचना की है, जिसमें तीन सौ स्तोत्र हैं। तमिल भक्तों में इनका बड़ा आदर है। (इनकी जन्मतिथि आदरार्थ अत्यन्त प्राचीन काल में मानी गयी है।)
गोदान
गो= केशों का दान= खण्डन करने वाला संस्कार, जो दाढ़ी-मूछों के मुण्डन रूप में होता है। इसीलिए शतपथ ब्राह्मण में इसका अर्थ 'क्षौरकर्म' है। गोदान विधि (सिर का मुण्डन) पूर्ण युवावस्था की प्राप्ति पर तथा विवाह के अवसर पर होती है। अथर्ववेद में इस विधि का उल्लेख है, किन्तु यह नाम नहीं है। बाद में केशान्त संस्कार का यह पर्याय हो गया, क्योंकि प्रथम बार दाढ़ी-मूछ साफ करने के समय गोदान किया जाता था। दे० 'केशान्त'।
गोदावरी
दक्षिण भारत की गङ्गा। भारत की पवित्र नदियों में इसका तीसरा स्थान है। स्नान करने के समय इसका ध्यान और आवाहन किया जाता है:
वैदिक साहित्य में गोदावरी का उल्लेख नहीं मिलता, किन्तु रामायण के समय से इसकी चर्चा प्रारम्भ हो जाती है। अरण्यकाण्ड (13.13.21) में कथन है कि पञ्चवटी नामक प्रदेश गोदावरी के निकट और अगस्त्य आश्रम से दो योजन की दूरी पर स्थित है।
महाभारत के वनपर्व (88.2) में गोदावरी का निम्नांकित वर्णन पाया जाता है :
कई पुराणों में गोदावरी घाटी के ऊपरी अञ्चल की बड़ी प्रशंसा की गयी है :
स्यस्यान्तरे चैते तत्र गोदावरी नदी। पृथिव्यामपि कृत्स्नायां स प्रदेशो मनोरमः।। यत्र गोवर्धनो नाम मन्दरो गन्धमादनः।। (मत्स्यपुराण 114.37-38)
गोदावरी की उत्पत्ति के विषय में पुराणों में कई कथाएँ दी हुई हैं। ब्रह्मपुराण (74.76) के अनुसार गौतम ऋषि शिव की जटा से गङ्गा को ब्रह्मगिरि में अपने आश्रम के पास ले आये थे। कुछ परिवर्तन के साथ यही कथा नारदपुराण (उत्तरार्द्ध, 72) तथा वराहपुराण (71.37.44) में पायी जाती है। ब्रह्मगिरि में आकर गङ्गा ही गोदावरी बन गयी। कूर्मपुराण (2.20.29-35) के अनुसार गोदावरी के तट पर किया हुआ श्राद्ध बहुत ही पुण्यकारक होता है।
गोदावरी के किनारे स्थित तीर्थों की संख्या बहुत बड़ी है। ब्रह्मपुराण में लगभग एक सौ तीर्थों का वर्णन पाया जाता है, जिनमें त्र्यम्बक, कुशावर्त, जनस्थान, गोवर्धन, पञ्चवटी और जनस्थान। प्राचीन काल में इन तीर्थों में बहुत बड़ी संख्या में मन्दिर थे। परन्तु मुसलमानी काल में उनमें से अधिकांश ध्वस्त हो गये। फिर मराठों के उत्थान के पश्चात् पेशवाओं के शासनकाल में अनेक मन्दिरों का निर्माण हुआ। पञ्चवटी में रामजीमन्दिर एवं गोदावरी के बायें किनारे पर नासिक में नारोशङ्कर मन्दिर प्रसिद्ध है। पञ्चवटी में सीतागुफा यात्रियों के विशेष आकर्षण का स्थान है। सीतागुफा के ही पास कालाराम का मन्दिर है, जिसकी गणना दक्षिण-पश्चिम भारत के सर्वोत्तम मन्दिरों में की जा सकती है। गोवर्धन औऱ तपोवन के बीच कई पवित्र घाट और कुण्ड हैं। नासिक में सबसे पवित्र स्थान रामकुण्ड और सबसे प्रसिद्ध धार्मिक पर्व रामनवमी है। बृहस्पति के सिंहस्थ होने के अवसर पर गोदावरी का स्नान अत्यन्त पुण्यकारक माना जाता है जिसका बारह वर्ष में एक बार यहाँ विशाल धार्मिक समारोहपूर्वक मेला लगता है।
गोधूमव्रत
सत्ययुग में नवमी के दिन भगवान् जनार्दन (विष्णु) द्वारा दुर्गा, कुबेर, वरुण तथा वनस्पतियों का निर्माण किया गया। वनस्पति भी एक चेतन देवता है, जिसमें गोधूम प्रमुख है। इस व्रत में गेहूँ के आटे के बने पदार्थों से उपर्युक्त पाँच देवताओं का पूजन करना चाहिए। दे० कृत्य रत्नाकर, 285-286।
गोपथ ब्राह्मण
अथर्ववेद से सम्बन्धित एक ब्राह्मणग्रन्थ। इसके विषयों में विविधता है। यह ग्रन्थ 'वैतानसूत्र' पर आधारित है। इसमें दो काण्ड हैं, जिनका 11 अध्यायों में विभाजन हुआ है। पहले काण्ड में पाँच तथा दूसरे में छः अध्याय हैं। अध्याय प्रपाठक भी कहलाते हैं। इस ब्राह्मण का मुख्यतः सम्बन्ध ब्रह्मविद्या से है। इसके कुछ अंश शतपथ और ताण्ड्य ब्राह्मण से लिये गये हैं और कुछ स्पष्टतः परवर्ती प्रक्षेप जान पड़ते हैं।