अनुराधा नक्षत्र युक्त गुरुवार को इस व्रत का अनुष्ठान होता है। सुवर्ण पात्र में रखी हुई बृहस्पति ग्रह की सुवर्णमूर्ति के पूजन का विधान है। इसमें सात नक्तों का आचरण किया जाता है। दे० देमाद्रि, 2.509।
गुरुस्थल जङ्गम
जङ्गम' शब्द का प्रयोग दो अर्थों में होता है-- पहला प्रयोग जाति के सदस्य के लिए एवं दूसरा अभ्यासी के अर्थ में। अभ्यासी अर्थवाचक जङ्गम पूज्य होता है। ऐसे जङ्गम लिङ्गायतों के गुरु होते हैं तथा किसी न किसी मठ से सम्प्रदाय की शिक्षा व दीक्षा ग्रहण करते हैं। इन्हें आजीवन ब्रह्मचारी रहना चाहिए। ये दो प्रकार के होते हैं-- गुरुस्थल जङ्गम और विरक्त जङ्गम। गुरुस्थलों को सभी पारिवारिक संस्कारों (उत्सवों) एवं गुरु का कार्य करने की शिक्षा दी जाती है।
गुर्वष्टमी व्रत
गुरुवारयुक्त भाद्रपद मास की अष्टमी को इस व्रत का अनुष्ठान होता है। सुवर्ण अथवा रजत की गुरु अर्थात् बृहस्पति देवता की प्रतिमा की पूजा का विधान है।
गृह
(1) कार्तिकेय का एक पर्याय। महाभारत (3.228) मे शिव (रुद्र) के पुत्र को गुह कहा गया है :
[रुद्र के पुत्र का नाम गुह हुआ और देवताओं की समस्त सेना ने इनको अपना नाथक मान लिया।]
(2) वाल्मीकि रामायण के अनुसार भगवान् राम के सखा निषादराज का नाम गुह था। यह श्रृङ्गवेरपुर के मुख्य गंगातट का शासक था। राम और भरत का इसने बड़ा आतिथ्य किया था।
(3) कहीं-कहीं विष्णु को भी गुह कहा गया है : 'करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः।' (महा० 13. 149-54) इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार की गयी है : 'गुहते संवृणोति स्वरूपादिनि मायया' [जो अपनी माया से स्वरूप आदि का संवरण करता है।]
गुरुदेव
वेदान्त के एक आचार्य। निघण्टु के टीकाकार देवराज और भट्ट भास्कर ने माधवदेव, भवस्वामी, गुहदेव, श्रीनिवास, उब्वट आदि भाष्यकारों के नाम लिखे हैं। ब्रह्मसूत्र रचना के बाद और स्वामी शङ्कराचार्य के पूर्व भी वेदान्त के आचार्यों की परम्परा अक्षुण्ण रही है। इन आचार्यों का उल्लेख दार्शनिक साहित्य एवं शङ्कर के भाष्य में हुआ है। रामानुजकृत वेदार्थसंग्रह (पृ० 154) में प्राचीन काल के छः वेदान्ताचार्यों का उल्लेख मिलता है, इनमें गुहदेव भी हैं।
गुह्य
गम्भीर आध्यात्मिक तत्व को गुह्य कहते हैं। गीता (9.1) में भगवान् ने ज्ञान को गुह्यतम कहा है :
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे। ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।।
[तुमको श्रद्धालु समझकर मैं इस अति गुह्य ज्ञान का उपदेश करूँगा, विज्ञान के साथ इसको समझकर तुम कष्ट से छूट जाओगे।]
बुद्धि अथवा हृदयाकाश रूपी गहरी गुहा में स्थित होने कारण इस तत्त्व को गुह्य कहा गया है। कहीं-कहीं विष्णु और शिव को भी गुह्य कहा गया है। विष्णु-सहस्रनाम (महाभारत, 13.149.71) में गुह्य विष्णु का एक नाम है :
गुह्यो गंभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः।
इसी प्रकार महाभारत (13.17.91) में शिव (महादेव) गुह्य कहे गये हैं :
यजुः पादभुजो गुह्यः प्रकाशो जंगमस्तथा।
गुह्यक
अर्थ देवयोनियों में गुह्यक भी है। कुबेर के अनुचरों का यह एक भेद है। धार्मिक तक्षणकला के अलङ्करण में इसका प्रतीकात्मक उपयोग किया गया है।
निधिं रक्षन्ति ये यक्षास्ते स्युर्गह्यकसंज्ञकाः।
[देवताओं की निधि के रक्षक यक्षगण गुह्यक कहलाते हैं।]
अजन्ता की भित्ति-चित्रकला में जहाँ पर्वतीय दृश्य चित्रित, उनमें पक्षी, वानर एवं काल्पनिक जङ्गली जातियों-गुह्यक, किरात एवं किन्नरों के चित्र पाये जाते हैं। यक्षों के बहुत कुछ सदृश ही गुह्यक भी होते हैं। भरहुत और साँची की मूर्तिकला में इनका अङ्कन बौने के रूप में शालभञ्जिकाओं के पैरों के नीचे हुआ है। अनङ्गपरवश व्यक्ति कामिनियों के चरणतल में कैसे दब जाता है, इसका यह प्रतीक है।
गुह्यकद्वादशी
द्वादशी को इस व्रत का अनुष्ठान होता है। व्रती को इस दिन उपवास करना चाहिए तथा गुह्यकों (यक्षों) की तिल और अक्षतों से पूजा करनी चाहिए। इस व्रत में किसी ब्राह्मण को सुवर्ण दान करने से समस्त पापों का क्षय हो जाता है।
गुह्यसमाज
एक धार्मिक संघटन, जो वामाचारी तान्त्रिक साधकों का वह समाज है जिसमें बहुत सी गुह्य (गोपनीय) क्रियाएँ होती हैं। इसमें वे ही साधक प्रवेश पाते हैं जो इस साधना में विधिवत् दीक्षित होते हैं। कन्दराओं, गुहाओं और गुप्त स्थानों में इस समाज द्वारा साधना की जाती है।
गूढ़ज (गूढ़ोत्पन्न)
धर्मशास्त्र के अनुसार बारह प्रकार के पुत्रों में से एक। पत्नी अपने पति के अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष से प्रच्छन्न रूप में जो पुत्र उत्पन्न करती है उसे गूढ़ज कहा जाता है। मनुस्मृति (9,170) में इसकी परिभाषा इस प्रकार की गयी है :
उत्पद्यते गृहे यस्य न च ज्ञायेत कस्य सः। स गृहे गूढ़ उत्पन्नस्तस्य स्याद् यस्य तल्पजः।। यह दायभागी बन्धु माना गया है (मनु. 9,151)।
याज्ञवल्क्यस्मृति (2.32) में इसकी यही परिभाषा मिलती है :
गृहे प्रच्छन्न उत्पन्नो गूढजस्तु सुतो मतः।'
वर्तमान हिन्दू-विधि में गूढ़ज पुत्र की स्वीकृति नहीं है।