गुरु उसको कहते हैं जो वेद-शास्त्रों का गुणन (उपदेश) करता है अथवा स्तुत होता है (गृणाति उपदिशति वेद शास्त्राणि यद्वा गीर्यते स्तूयते शिष्यवर्गैः)। मनुस्मृति (2.142) में गुरु की परिभाषा निम्नांकित है :
निषेकादीनि कर्माणि यः करोति यथाविधि। सम्भावयति चान्नेन स विप्रो गुरुरुच्यते।
[जो विप्र निषेक (गर्भाधान) आदि संस्कारों को यथा विधि करता है औऱ अन्न से पोषण करता है वह गुरु कहलाता है।] इस परिभाषा से पिता प्रथम गुरु है, तत्पश्चात् पुरोहित, शिक्षक आदि। मन्त्रदाता को भी गुरु कहते हैं। गुरुत्व के लिए वर्जित पुरुषों की सूची कालिकापुराण (अध्याय 54) में इस पकार दी हुई है :
अभिशप्तमपुत्रञ्च सन्नद्धं कितवं तथा। क्रियाहीनं कल्पाङ्गं वामनं गुरुनिन्दकम्।। सदा मत्सरसंयुक्तं गुरुमन्त्रेषु वर्जयेत्। गुरुर्मन्त्रस्य मूलं स्यात् मूलशद्धौ सदा शुभम्।।
कूर्मपुराण (उपविभाग, अध्याय 11) में गुरुवर्ग की एक लम्बी सूची मिलती है :
उपाध्यायः पिता ज्येष्ठभ्राता चैव महीपतिः। मातुलः श्वशुरस्त्राता मातामहपितामहौ।। बन्धुर्ज्येष्ठः पितृव्यश्च पुंस्येते गुरवः स्मृतः। मातामही मातुलानी तथा मातुश्च सोदरा।। स्वश्रूः पितामही ज्येष्ठा धात्री च गुरवः स्त्रीषु। इत्युक्तो गुरुवर्गोऽयं मातृतः पितृतो द्विजाः।।
इनका शिष्टाचार, आदर और सेवा करने का विधान है। युक्तिकल्पतरु में अच्छे गुरु के लक्षण निम्नांकित कहे गये हैं :
शान्तो दान्तः विनीतः शुद्धवेशवान्। शुद्धाचारः सुप्रतिष्ठः शुचिर्दक्षः सुबुद्धिमान्।। आश्रमी घ्याननिष्ठश्च मन्त्र-तन्त्र-विशारदः। निग्रहानुग्रहे शक्तो गुरुरित्यभिधीयते।। उद्धर्तुञ्चैव संहतुँ समर्थों ब्राह्मणोत्तमः। सामान्यतः द्विजाति का गुरु अग्नि, वर्णों का गुरु ब्राह्मण, स्त्रियों का गुरु पति और सबका गुरु अतिथि होता है :
उपनयनपूर्वक आचार सिखाने वाला तथा वेदाध्ययन कराने वाला आचार्य ही यथार्थतः गुरु है :
उपनीय गुरुः शिष्यं शिक्षयेच्छौचमादितः। आचारमग्निकार्यञ्चसन्ध्योपासनमेब च।। अल्पं वा बहु वा यस्य श्रुतस्योपकरोति यः। तमपीह गुरुं विद्याच्छ्रुचोपक्रिययातया।। षट्त्रिशदाब्दिकं चर्य्यं गुरौ त्रैवेदिकं व्रतम्। तदर्द्धिकं पादिकं वा ग्रहणान्तिकमेव वा।। (मनु० 2.69;2.149;3.1)
वीर शैवों में यह प्रथा है कि प्रत्येक लिङ्गायत गाँव में एक मठ होता है जो प्रत्येक पाँच प्रारम्भिक मठों से सम्बन्धित रहता है। प्रत्येक लिङ्गायत किसी न किसी मठ से सम्बन्धित होता है। प्रत्येक का एक गुरु होता है। जङ्गम इनकी एक जाति है जिसके सदस्य लिङ्गायतों के गुरु होते हैं।
जब लिङ्गायत अपने गुरु का चुनाव करता है तब एक उत्सव होता है, जिसमें पाँच पात्र, पाँच मठों के महन्तों के प्रतिनिधि के रूप में, रखे जाते हैं। चार पात्र वर्गाकार आकृति में एवं एक केन्द्र में रखा जाता है। यह केन्द्र का पात्र उस लिङ्गायत के गुरु के मठ का प्रतीक होता है। जब गुरु किसी लिङ्गायत के घर जाता है, उस अवसर पर 'पादोदक' संस्कार (गुरु का चरण धोना) होता है, जिसमें सारा परिवार तथा मित्रमण्डली उपस्थित रहती है। गृहस्वामी द्वारा गुरु की षोडशोपचार पूर्वक पूजा की जाती है।
धार्मिक गुरु के प्रति भक्ति की परम्परा भारत में अति प्राचीन है। प्राचीन काल में गुरु आज्ञापालन शिष्य का परम धर्म होता था। गुरु शिष्य का दूसरा पिता माना जाता था एवं प्राकृतिक पिता से भी अधिक आदरणीय था। आधुनिक काल में गुरुसंमान और भी बढ़ा चढ़ा है। नानक, दादू, राधास्वामी आदि संतों के अनुयायी जिसे एक बार गुरु ग्रहण करते हैं, उसकी बातों को ईश्वरवचन मानते हैं।
बिना गुरु की आज्ञा के कोई हिन्दू किसी सम्प्रदाय का सदस्य नहीं हो सकता। प्रथम वह एक जिज्ञासु बनता है। बाद में गुरु उसके कान में एक शुभ बेला में दीक्षा मन्त्र पढ़ता है और फिर वह सदस्य बन जाता है।
गुरु (प्रभाकर)
छठी शती से आठवीं शती के बीच कर्ममीमांसा के दो प्रसिद्ध विद्वान् हुए; एक प्रभाकर जिन्हें गुरु भी कहते हैं एवं दूसरे कुमारिल, जिन्हें भट्ट कहा जाता है। इन दोनों से मीमांसा के दो सम्प्रदाय चले।
गुरुकुलजीवन
द्विज या ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यों को जीवन की पहली अवस्था में अच्छे गृहस्थजीवन की शिक्षा लेना अनिवार्य था। यह शिक्षा गुरुकुलों में जाकर प्राप्त की जाती थी, जहाँ वेदादि शास्त्रों के अतिरिक्त क्षत्रिय शस्त्रास्त्र विद्या और वैश्य कारीगरी, पशुपालन एवं कृषि का कार्य भी सीखता था। गुरुकुल का जीवन अति त्यागपूर्ण एवं तपस्या का जीवन था। गुरु की सेवा, भिक्षाटन पर जीविका, गुरु के पशुओं का चारण, कृषिकर्म करना, समिधा जुटाना आदि कर्म करने के पश्चात् अध्ययन में मन लगाना पड़ता था। धनी, निर्धन सभी विद्यार्थियों का एक ही प्रकार का जीवन होता था। इस तपस्थलों से निकलने पर स्नातक समाज का सम्माननीय सदस्य के रूप में आदृत होता एवं विवाह कर गृहस्थाश्रम का अधिकारी बनता था।
गुरुग्रन्थसाहब
(1) सिक्ख संप्रदाय का सर्वोत्तम धार्मिक ग्रन्थ, जिसकी पूजा गुरुमूर्ति के रूप में की जाती है। इस पवित्र ग्रन्थ का अखण्ड पाठ करने की रीति सिक्खों ने ही प्रचलित की। इसमें सिक्खों के दस गुरुओं की वाणी के साथ ही कबीर, नामदेव, रविदास, मीरा, तुलसी आदि भक्तों की चुनी हुई वाणियाँ भी संकलित हैं और यह गुरुमुखी लिपि में लिखा गया है।
(2) इसी नाम का गरीबदासी सम्प्रदाय का भी एक धार्मिक ग्रन्थ है, जिसे संत गरीबदास (1717-82 ई०) ने में रचा। इसमें 24,000 पद हैं। दे० 'गरीबदास'।
गुरुदेव
पन्द्रहवी शती के वीरशैव सम्प्रदाय के एक आचार्य, जिन्होंने 'वीरशैव आचार प्रदीपिका' की रचना की।
गुरुदेव स्वामी
ये 'आपस्तम्ब सूत्र' के एक भाष्यकार थे।
गुरुद्वारा
सिक्खों का पूजास्थान गुरुद्वारा कहलाता है। पूजा में 'ग्रन्थ साहब' के कुछ निश्चित भागों का पाठ तथा ग्रन्थ की पूजा होती है। सिक्ख गुरुद्वारों में अमृतसर का स्वर्णमन्दिर प्रमुख और दर्शनीय है। गुरु नानक तथा अन्य गुरुओं के जीवन से सम्बन्ध रखने वाले प्रमुख स्थानों पर गुरुद्वारे बने हुए हैं, जो सिक्खों के तीर्थस्थान हैं।
गुरुप्रदीप
वेदान्ताचार्य अद्वैतानन्द स्वामी (सं० 1206 से 1255) के तीन ग्रन्थों में एक ग्रन्थ का नाम 'गुरुप्रदीप' है।
गुरुमुखी
उस लिपि का नाम जिसमें सिक्खों का धर्मग्रन्थ 'ग्रन्थ साहब' लिखा हुआ है। गुरु नानक के उत्तराधिकारी गुरु अङ्गद ने नानक के पदों के लिए उस लिपि को स्वीकार किया जो ब्राह्मी से निकली थी औऱ पंजाब में उनके समय में प्रचलित थी। गुरुवाणी उसमें लिखी गयी, इसलिए इसका नाम 'गुरुमुखी' पड़ा। गया। वास्तव में 'गुरुमुखी' लिपि का नाम है, परन्तु भूल से लोग इसे भाषा भी समझ लेते हैं। इसकी वही वर्णमाला है जो संस्कृत और भारत की अन्य प्रादेशिक भाषाओं की। इस समय पंजाबी भाषा को सिक्ख लोग इसी लिपि में लिखते हैं।